मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, December 10, 2015

विद्रोही

कौन मर गया
जरा मैं भी तो सुनु
किसकी अर्थी उठ रही
जरा मैं भी तो देखु

विद्रोही मर गया?
कुछ लोग कह रहे
शायद वो कुछ लोग नही जानते की
विद्रोही मर ही नही सकता
विद्रोहीपन जीवन है
फिर जो जीवन ही है
वह मृत्यु कैसे

विद्रोही का विद्रोही होना
हाड़ मांस का वजह नही था
विद्रोही का विद्रोही होना
उसके आत्मा से था
और आत्मा मरती कहाँ है?

विद्रोही ने शायद कविताये लिखी नही
उसके जेहन में मची उथल पुथल
धधकती आत्मा
उसे श्ब्दों का पुलिंदा बनाने में मदद किया

विद्रोही कविता लिख ही नही सकता
कविता तो फुरसत के पल
बयां होने वाले सब्द होते है
और विद्रोही के दिमाग में इतनी फुरसत कहा
वह तो बम था
जिसके अंदर रासायनिक परिवर्तन हर क्षण हो रहे थे
जिसे कभी भी फट जाना था।
फट जाना मर जाना नही होता
विखर जाना होता है
और विखरना भी ख़त्म हो जाना नही होता।
विखरना , फ़ैल जाना होता है
और विद्रोही का विद्रोही होना
भी कुछ ऐसा ही था

मैं दावे के साथ कह सकता
विद्रोही मरा नही

विद्रोही
विश्विधालय के
चाय की चुस्कियो में है
उचे निचे पगडंडियों में है
हर सुबह खिलते फूलो में है
हर ढलती शाम में है
हर जलती मशाल में है
हर क्रांति स्वर में है

विद्रोही वही था और वही रहेगा।

Monday, November 16, 2015

शिक्षा और चाटुकारिता

एक छोटे शहर से  जब एक छात्र आता है तो खुद के सपनो के साथ घरवालो की उम्मीदों का बोझ भी ढो रहा होता है, जल्दी नौकरी की उपापोह में आपने आपको हर वक़्त पाता है। यह यथार्थ है, आपको भाउक करने की उम्मीद से लिखे जाने का कारन नही । उच्च शिक्षा और छोटे शहर  का तालमेल बहुत कम देखने को मिलता है।छोटे शहरो के छात्रो के साथ समस्या यह होती है की वह उच्च शिक्षा को महत्व बहुत कम देते है, क्योकि घर की जरूरत उन्हें जल्दीसे जल्दी नौकरी लेने को बाध्य करती रहती है। अगर कोई छात्र उच्च शिक्षा की और अपना कदम बढ़ाता  है तो उनकी उनके विषय के पीछे की रूचि होती है। अपने विषय में कुछ अच्छा , कुछ नया करने की उम्मीद। पर हमारी खोखली शिक्षा प्रणाली क्या उनके सपनो और उम्मीदों को पंख दे पाती है। उनकी मेहनत , उनके सपने क्या चाटुकारी व्यवस्था के पैरो तले कुचले हुए  नही पाये जाते है।
इस ब्लॉग को लिखने के पीछे का मकसद यही रहा की बिख्यात विश्वविधालय में पढ़ रहे छात्र की मनोदशा से वाकिफ कराउ आपको।

जब मैं देखता हु दिल्ली विश्वविद्यालय ,राजनीतिशास्त्र के मास्टर्स में नामांकित 600 बच्चों का अंधकारमय भविस्य।हर साल यहाँ तकरीबन 600 बच्चे नामंकित होते है मास्टर्स में। जिसमे मास्टर्स कम्प्लीट करते करते तकरीबन 400 बचते है,200 बच्चे फेल होते है हर साल। अब बचे हुए छात्र अपनी आगे की किस्मत कहा देखते है,जब इसपर गौर करे तो हम पाते है। 400 में से तकरीबन 20 छात्र बिभाग के एमफिल  की  पढ़ाई में चयनित होते है।बाकि के 380 छात्रो को नौकरी दिलवाने में बिभाग असक्षम है, अब यह छात्र आई ए इस, ssc , या अलग प्रतियोगी परीक्षाओ में किश्मत आजमाते है जिसमे अनुमानत: 50 बच्चे नोकरी पाते है बचे तकरीबन 330 बच्चों का भविस्य एक  विषय के मास्टर्स होने पर भी क्या होता है, किसी को पता नही। उनका एक विषय में मास्टर्स होना कितना सफल और कितना सहायक होता है, यह सिर्फ वही जानते है।हमारी शिक्षा की इस व्यवस्था का एक पहलु आपने पढ़ा। दूसरा पहलु शायद एक शिक्षाव्यवस्था, हमारे तथाकथित विद्वानों के मुह पर तमाचा है। समस्या छात्र सिर्फ इन्ही लेवल पर नही झेलता। छात्र अपने पढाई पर मेहनत से ज्यादा वह प्रोफेसर के केबिन के चक्कर लगाने में ज्यादा मेहनत करता हुआ पाया जाता है। अच्छे अंक का पैमाना आपकी मेहनत, आपके द्वारा लिखे गए उत्तर निर्धारित नही कर रहे होते है, यह निर्धारण आपके और प्रोफेसर के बिच के व्यक्तिगत सम्बन्ध निर्धारित करते है।चाटुकारिता के लिए आप अपने आप को किट फिट मानते है उस हिसाब से आप अंक लेने के लिए तैयार रहे। आपकी मेहनत को देखने के लिए प्रोफेसर के पास समय नही है। वो बस आपके चाटुकारिता का लेवल सिर्फ जानना चाहते है। क्लासरूम की परफॉरमेंस से ज्यादा जरुरी होता है आपका उनके केबिन में जाकर हाजिरी का परफॉरमेंस।छात्र कई बार सवाल का उत्तर ढूंढने में मेहनत नही करता है, जितना वह सवाल बनाने में मेहनत करता है ताकि वह प्रोफेसर से इस सवाल के जरिये अपने सम्बन्ध की शुरुवात कर सके। आप प्रोफेसर के पसंदीदा छात्र इसलिये कतई नही है की आप एक मेहनती, जरूरतमंद, मेधावी है, आप इसलिए उनके चहेते है, क्योकि आप कुछ विशिष्ट गुण लेकर पैदा हुए है, जेसे की आप उनके स्वजाति के है, जिससे आप चाचा , ताऊ के रिश्ते बहुत ही आसानी से बना सके, आप उनके विचारधारा से जुड़े हुए है,या उनके पार्टी विचारधारा (बीजेपी, कांग्रेस, लेफ्ट)के लिए काम करते है, यानी आप झंडा ढोने में बिश्वाश रखते है, आप बहुत ही अच्छे चाटुकार है, केबिन में हर दिन की आप उपस्थित होने के लिए तैयार है। यह सब विशिष्ट लक्षण आपको अच्छे अंक ही दिलाने में नही सहायक है, वरन्  आपको आगे की पढ़ाई और नौकरी दिलवाने में भी सहायक हो सकती है। एक  छात्र जो एक उम्मीद, एक अच्छे भविस्य की सोच के साथ अपना कदम उच्च शिक्षा की ओर बढ़ाता है क्या वह यह करने के लिए मजबूर नही होता। क्या वह खुद की बुद्धिमता को गिरवी नही रखता, क्या जो इस चाटुकारिता की जाल से दूर रहता है, क्या वह अपने सपनो का गला नही घोट रहा होता है।  बार बार जेहन में यह सवाल आता है, की पढाई जरुरी है या चाटुकारिता। अगर सफल होना है तो किसका कितना प्रतिशत लेकर आगे बढ़े, ज्यादा पढ़े या ज्यादा चाटुकारिता करे। कुछ कहते है दोनों को साथ लेकर चलना ही यथार्थ है। तब हँसी आती है और जबाब यही निकलता  है की आप अपने आप को कितना फिट मानते है इन सब चीजो में इस यथार्थ के साथ कदम बढ़ाये।

Thursday, November 5, 2015

नाम क्या है तुम्हारा?

नारेबाजी की बढ़ती आवाज में उसने चिल्ला कर पूछ लिया ,नाम क्या है तुम्हारा?
क्या ?नाम नाम !
मैं नाम बताने जा ही रहा था तबतक पीछे से भीड़ की धक्कामुकि में उसने मेरी पांच उंगलियो के बिच में अपनी उंगलियो को फसा कर नारेबाजी शुरू कर दी।
छात्रो की भीड़ ITO से शास्त्री भवन की ओर बढ़ रही थी। सफ़र लंबा था, भीड़ जितनी धक्का देती उसकी पकड़ मेरी उंगलियो के बिच उतनी ही तेज हो जाती। एक हाथ को हवा में उठा कर चीखती हुई ललकार रही थी, सरकार के बिरुद्ध रौद्र रूप था उसका।पर ऊपर से सख्त उतनी ही अंदर से कोमल सी लगी।
कौन सी पार्टी से हो?
किसी से भी नही!
कौन से यूनिवर्सिटी से हो?
दिल्ली, दिल्ली यूनिवर्सिटी
ह्म्म्म्म्म्म फिर नारेबाजी
मै भी हाथ को पकड़े उसके आवाज में आवाज मिला रहा था।
बिच रास्ते में बैरिकेड था।छात्रो की भीड़  उसे तोड़ने की कोशिश कर रही थी।चन्द पल के लिए मैं अपने आप को हीरो, उसे हीरोइन और पुलिस को उसका पिता समझने लगा।पुलिस की भीड़ छात्रो को पकड़ पकड़ बस में ठूसने लगी।अफरा तफरी मचने लगा। मेरे हाथ से उसका हाथ छुटने चूका था।तबतक भीड़ में गुम हो गयी वो,अपने नाम के साथ।
, पर कुछ छोड़ गयी थी मेरे पास अपनी आवाज।बार बार भीड़ में सुनने की कोशिश करता रहा पर नाकामयाब था। बार बार अफ़सोस सता रहा था की मैं हिम्मत कर क्यों न पूछ पाया, नाम क्या है तुम्हारा? शायद अधूरी शुरुवात को फेसबुक पर तो पूरी करता। हम सरकार से जित चुके थे, पर मैं फिर भी हारे मन से वापस लौट रहा था। बार बार गूंज रहे थे उसके पहले शब्द, नाम क्या है तुम्हारा?

Tuesday, November 3, 2015

नवम्बर की डायरी

नवम्बर की डायरी से।

#लप्रेक

नवम्बर का महीना शुरू होते ही प्रेमी प्रेमिका की घनिष्टता बढ़ जाती है,वजह ठण्ड से ज्यादा एग्जाम  होता है। सिंगल इंटेलीजेंट छात्र के लिए भी यह महीना लाटरी की तरह होता है।
कई कदम साथ चलते चलते उसने पूछा ,सिगरेट पीते हो?
पूछ रही हो या ऑफर कर रही हो, अगर पूछ रही हो तो ना, अगर ऑफर है तो हां(डॉयलॉग जल्दबाजी में बोल गया, सोचा पसन्द आएगा)
लेकिन कुछ खास असर नही किया, तबतक वह सिगरेट जला कर बढ़ा चुकी थी।
सिगरेट की धुएं के साथ , पढ़ाई धुँऑ धुँआ और प्यार राख़ की तरह निकल कर आने लगा।
रिक्शा वाले ने पटेलचेस्ट से विस्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन  तक की दुरी को ज्यादा कर दिया था। ठण्ड का मौसम, शाम का समय और लोगो का अंदेखापन भरपूर साथ दे रहा था।
रात भर जग जग कर पढ़ना और पढ़ाने का सिलसिला शूरू हो चला था। उसने बेस्ट फ्रेण्ड का दर्जा दे दिया था। मैं भी शब्दों से ज्यादा भाव में बिस्वास की गुंजाइस समझी। नवम्बर की डायरी में कहानी वहा जाकर रुकी जब मैं उसे 4 दिन के प्यार की तरह याद करने लगा और वह मुझे 4 नम्बर वाला।

(सर्द की धुप , चाय, और लप्रेक)

Sunday, November 1, 2015

पासवर्ड इन लव

नवम्बर की डायरी से एक और,
जिस फेसबुक के जरिये फ्रेंड रिक्वेस्ट से लेकर लव एक्सेप्ट तक का सफ़र तय किया था, जब रोमिंग में फ़ेसबुक के जरिये ही पास होने का एहसास बरकरार रहता था, तब उसी फेसबुक के एक पासवर्ड मांगने की वजह से रिश्ते सीसे की तरह टूटते नजर आये।
दिल पर पत्थर रख कर कहा था मैंने ,भूल सा गया हु,पर जब उसने कहा,
मुझे भी भूल जाओ और जाने को पलटी तो सिद्धान्तों, जज्बातों से समझौता करना पड़ गया|
फिर उसने अपने आप से समझौता कर ब्लाक का बटन दबा ही दिया था, वह जल्दी निर्णय लेती थी,यही बात पसंद भी आती थी। पर कभी पसंद आती चीज नापसंद भी आ सकती है।
सोचता हु काश प्यार चिट्ठी से शुरू किया होता|
(सर्द, चाय और लप्रेक तीनो का आनंद ले)

Friday, October 30, 2015

आज पूरी रात जागता रहा,मन बेचैन था , नींद ने आँखों से गुस्ताखी कर रखी थी । तरह तरह के उटपटांग सवालो जबाबो में मन उलझ रहा था । कई  बार सोचा लिखू , कलम को पकड़ा ,छोड़ा। कुछ लिखा फिर पन्नो को फाड़कर डस्टबिन में दाल दिया । उलझने परेशान कर रही थी । उठते विचारो को शब्द देने के अलावा और कोई चारा नही बचा तो लैपटॉप के कीपैड पर उंगलिया घूमने लगा । हिन्दू  मुस्लमान यही दो सब्द है न। काश यह शब्द भर होते। नाम खींचता है एक लकीर , अलग करता है  मुझको तुमको समाज मे. मै अलग पहचाना जाता हु ,तुम अलग पहचाने जाते हो। क्या तुममे मुझमे बुनियादी  फर्क है , हां है तो मेरा रंग अलग है तुमसे, मेरी  शक्ल अलग है तुमसे , मेरी आवाज अलग है तुमसे , मेरे रहने, चलने, बोलने का ढंग अलग है तुमसे। यही फर्क है न। लेकिन जब भीड़ किसी का क़त्ल करती है तो क्या वह इस भिन्नता पर क़त्ल करती है। क्या वह मेरे कपड़ो के रंग को अलग मान कर मुझे या तुम्हे घसीटती है।  नही न , फिर क्या है अलग जो मुझे या तुम्हे मरने पर विवश करती है। चुप्प्प एक घोर सन्नाटा है।  मै  कई  बार सोचता हु शब्दों का होना गुनाह है. किसी का नाम होना गुनाह है. कल्पना करो मेरा नाम अख्लाख़ होता तो क्या मुझसे मिलने वाला मेरा नाम सुनकर यह सोचता की मै हिन्दू हो सकता हु , कल्पना करो अगर तुम्हारा नाम गौरव होता तो क्या तुम मारे जाते । नाम नाम नाम , उफ्फ्फ्फ्फ़ कमबख्त शब्द भी अलग अलग धर्म के हो जाते है। कल्पना करो एक परिवार में पिता हिन्दू ,माँ मुस्लिम , भाई सिख , बहन ईसाई , बेटा जैन ,पत्नी बौद्ध , फिर क्या उस परिवार का कोई सदस्य किसी हिन्दू के भड़काऊ भासण पर माँ की हत्या करने जायेगा , क्या कोई मौलवी के कहने पर पिता का सर कलम करने जाएगा। तुम कहते हो यह सब आदर्श वादी बाते है , तो मई बस इतना कहता हु तुम्हारी यथार्थवादी दमघोटू विचार से कहि बेहतर है। कम से कम पागलो की जमात तो नही पैदा होगी जिसे बस लाल खून की प्यास होगी।
चलो एक रात भूल जाओ की तुम हिन्दू हो या मुस्लमान ,चलो भूल जाओ की ऐसे कोई सब्द होते भी है समाज में।  नींद , इन सब को भूलने का जरिया है जहाँ  हमे याद नही रहता की हम हिन्दू है मुस्लमान। भूल जाते है की कल जान लेने किस का दरवाजा खट  खटाना है। शायद कल हमे इन बातो पर गौर करना पड़ेगा ज़िस दिन हमने अपने आप को ऐसी व्यवस्था में ढाल लिया तो शायद बेखौफ नींद आने लगेगी। इसी कल्पना में आज अपने बेचैन मन को शांत करने की कोशिश कर रहा। 

Wednesday, October 28, 2015

कविता: महंगाई में दाल

डाल डाल, दाल दाल
अरहर, मुंग मसूर दाल
राजनीती में झोल झाल
जनता सारी हाल बेहाल
दिल्ली दिल्ली दाल दाल
महंगाई की मकड़ जाल
नेता पकड़े नब्ज नाल
मरती जनता बदहाल
डाल डाल दाल दाल
किसान मरते सालो साल
कोई नही है देख पाल
सब पूछते एक सवाल
कब आएंगे अच्छे काल
डाल डाल दाल दाल
कम दाल तो पानी डाल
जेसे तैसे पेट पाल
कोई चारा नही अब पांच साल
बस चिल्लाओ अब भइया
दाल दाल दाल दाल
अरहर मोठ मसूर दाल
            ~गौरव

Monday, October 26, 2015

कशमकश

चुप क्यों हो,  मै यहाँ तुमसे बात  करने  आती हु।
कभी मौन रह कर भी बाते किया करो
ओह्ह प्लीज़ तुम और तुम्हारी पोएट्री , इतना प्यार करोगे पोएट्री से तो मेरी जरुरत नही रहेगी
 मै  जरुरत के लिए थोरे ही प्यार किया तुमसे
तो फिर किसलिए किया
क्यों इन  सवालो में वक़्त जाया करती हो प्यार को प्यार ही  रहने दो , इसे वकील और मुवक्किल  की बहश क्यों बनाती हो
तुम मुझसे प्यार करते हो या अपनी पोएट्री से,आखिरी सवाल करती हुँ ।
पोएट्री से , क्योकि मेरी पोएट्री में  तुम ही तो होती हो ।
बाते बनाना कोई तुमसे सीखे,
और प्यार का चीड़ फाड़ कोई  तुमसे ।

Sunday, October 25, 2015

बालकनी का प्यार

रोज सुबह 10 बजे उठने वाला आज 6 बजे की अलार्म पर उठ गया था। क्योकि रोज इसी समय वह सामने वाली बालकनी में आकर चाय पिया करती थी।उसने अपना समय नही बदला, तो लगा भविष्य देखा जा सकता है। रोज रात पिता जी भविष्य की याद दिलाते तो 6 बजे चाय की कप पकडे वह दिलो दिमाग में खटकने लगती।
दिल्ली दिल वालो का होता है इसी चक्कर में किस्मत आजमा रहा था वो। इस बार घर से एक्स्ट्रा पैसे भी मंगवाया था , नया जैकेट और जीन्स लेना था। घर से जो पिता जी ने खरीद कर भेजा था वह सोते वक़्त पहन कर पिता के प्रेम का कर्ज चूका रहा था। आज भी 6 बजे उठा जैकेट पहना और अंग्रेजी का अखवार लिए सोचा दिल्ली और बिहार का रिश्ता जोर ही लेगा।
वह मुस्कराई थी। पर दिमाग में अचानक दोस्तों की बाते याद आई, की मुस्कुरा कर देखी थी या देख कर मुस्कुराई थी। कुछ भी हो, मुस्कराहट थी इस बात का संतोष था इसे।
जितने धीरे से गुड़ मॉर्निंग कहा था उतने ही जोर से दिल भी धड़क रहा था। जबाब का इंतजार करते करते घंटो बिता दिए। और वह चाय ख़त्म कर के कब का जा चुकी थी।
मेहनती था, लगन शील भी, थोड़ा उदास मन से अलार्म की  घंटी पर उठ गया।आज कुहासा ज्यादा था। साफ साफ दिख नही रहा था। सामने देखा खड़ी है।  गुस्सा और सदियो का प्यार जताते हुए इसने कहा, गुड़ मार्निंग का जबाब क्यों नही देती आप।मै देर तक इन्तजार करता रहा। डर भी रहा था इसलिए याद किया हुआ कुछ डायलॉग्स भूल गया था। पर बोल दिया। फिर भी बिना किसी जबाब के वही खड़ा रहा। कुछ गौर से देखा था तो चाय का प्याला हाथ में नही था, और वह थोड़ी अलग भी दिख रही थी। प्यार में इंसान अँधा हो जाता है, उसे तब पता चला जब वह अपने प्यार का हक़ ,उसके बजाए उसकी मम्मी पर जता गया था। अगले सुबह मुनिरका से वह निकल पड़ा था किशनगढ़ को नया कमरा देखने।

Tuesday, October 20, 2015

अन्ना

#लप्रेक
रामलीला मैदान चले उसने बड़ी तेज आवाज में बोला था।
तुम कब से इतनी क्रन्तिकारी हो गयी हो।
जब से अन्ना ने हमे प्यार करने का नया तरीका दिया है।
नारो के बिच में जब तुमने चिल्ला कर आई लव यू बोला था, और मैंने क्रन्तिकारी मुस्कान में हामी भर दी थी। तुम खादी के कुर्ते और गांधी टोपी में स्मार्ट लगते थे|
अन्ना को मै थैंक्स कहती हु, वो न होते तो आज हम दोनों न होते।
अन्ना को ख़त लिखो न राजनीती के बदलते नए मिजाज को लेकर, शायद पुराने दिनों को हम फिर जी सके।
लिखती हु.....
dear anna....

Friday, October 9, 2015

कैंटीन की चार नंबर वाली टेबल

सर्द की धुप, मीठी चाय और तुम, तीनो अगर एक साथ होते है तो ऐसा लगता  है  समय को  जिंदगी की कैमरे  में  कैद कर लु । शायद कैद भी करना ठीक नही होगा , हा उस क्षण को पूरी तरह जीना जरूर चाहता हु । इस बार भी सर्द आ रहा है , और तुम्हे पता है, मुझे चाय कितना पसंद है, सीसे के कप में जब मीठी गरम चाय हलक से उतरती है तो कलेजे को ठंडक मिलती है,।  अब देखो तुम भी कहोगी कलेजे के ठंडक और गरम चाय की चुस्की का क्या  सम्बन्ध है । हां  बेमेल है, और मुझमे सायद यही बात  तुम्हे अच्छी  भी लगती है, और ताने  मारना भी नही भूलती , की बाते बनाना कोई तुमसे सीखे । हां सही भी है ,वरना मुझमे चाहने वाला है भी क्या ?  सीधा साधा , माध्यम  घर का लड़का , जो  हर वक़्त अपने सपनो को साथ लिए  चलता है। यही तो  है, जो हर वक़्त साथ निभाती है,  गहरी  नींद भी  साथ  होने का  एहसास होता है ।
समय को नापा  तो देखा हम दोनों  दो किनारो पर खड़े है, बीच में शांत , सुन्दर नदी बह  रही है, जिसे तुम चुपचाप देख रही और मै अपलक निहार रहा । शायद मौन संवाद घट  रहा ।
आज मै  कैंटीन के उसी चार नंबर वाले टेबल पर बैठा हु , हलकी सर्द भी है , धुप भी बादलो से छन के आ रहे, चाय के कप को भी दोनों हथेलिओं के बीच में पकड़ रखा है, हर २ सेकंड पर चाय की चुस्की से आत्म तृप्ति कर रहा , बस कमी है तो मुझे इस हालत  में देख कर हसने वाली की, जो अक्सर खिल खिला कर कहती थी, गँवार ।  और मै  चाय की चुस्कीओ में फिर अपने आप को व्यस्त कर लेता था। कितना अच्छा होता है न, बीते कल को याद  करना , हर पन्ने  को उलटना , मुस्कुराना, फिर डूब जाना । समय की खूबसूरती भी  यही है , वह रूकती नही है, ठहरती नही है, हर पल गुजरती है , ताकि आप बोर न हो समय से। जब दिल चाहे ,पुराने पन्ने पलटे , और एक उदासी भरी चेहरों पर मुस्कराहट की हल्की  रेखा  खींच  डालें ।
आज तुम नही हो तो उसी टेबल पर बैठा बैठा ३ कप चाय भी पी गया , तुम होती तो डोसा जरूर मंगा ळेटा। हां कैंटीन में इसके अलावा पसंद भी क्या था तुम्हे, और मुझे पसंद आता था , साथ  मिलने वाला बादाम की चटनी ।आज सोचा चटनी ही माँगा लू , पर  मन नही हुआ क्योकि तुम भी तो नही  थी जिसे देखकर बादाम की चटनी खाना  और भी अच्छा लगता था । भीड़ बढ़ने लगी है, बच्चे  हुड़दंग  करके कैंटीन में मेरी तरह चाय  की चुस्की लेने आ रहे । तुम्हे  तो पता है मुझे भीड़ से उतनी ही नफरत है जितना तुम्हे मेरे इस गंवारपन से प्यार । सर्द की धुप , चाय की चुस्की और तुम्हारी याद को अपने डायरी में समेटे  इस चार नंबर की कैंटीन की टेबल को छोर जा रहा । आगे की कहानी वही लिखूंगा  जहाँ  तुम और मै अक्सर चुपचाप बाते किया करते थे, निशब्द हो कर, बिलकुल मौन।

Sunday, October 4, 2015

पटेलचेस्ट

लेक्चर समाप्त हो चूका है, क्लास के आखिरी बेंच पर सिर्फ तुम और मैं।
देखो ना क्लास के सन्नाटे में ए सी की हवा भी ज्यादा शोर कर रही है, लड़का कहता है।
लड़की, हां कह कर फिर बेंच पर सर टीका देती है।
तुम कब तक पूंजीवाद, समाजवाद की लड़ाई लड़ते रहोगे, प्रेम का कोई वाद नही होता, लड़की कहती है।

क्यों तुम्हे भी तो ये सब बाते अच्छी लगती थी,जब मैं प्रोफेसर से इन्ही बात पर लड़ता था।आज अगर वाद की लड़ाई न लड़ता तो शायद इस सन्नाटे में हमदोनों नही होते।

पर अपने लिए भी वक़्त निकलना किसी वाद ने नही सिखाया तुम्हे।

लड़का कहता है, नही।

दिल्ली की भागदौड़ तुम्हे शायद कभी पसंद नही आएगी, लड़की मायूस  होकर कहती है।
तुम्हे भी तो मैं हमेशा पसंद नही आता।लड़का मुस्कुरा देता है।

लड़की मोबाइल , कार की चाभी समेटती है, और चलने के लिए उठ पड़ती है।

लड़का मार्क्स का किताब झोले में डालता है, और साथ हो लेता है।

समय एक सा नही रहता, कल तक कोल्डड्रिंक्स अच्छी लग रही थी, अब तो कॉफी पीने को जी चाहता है।

लड़का कहता है, मुझे कल भी चाय अच्छी लगती थी,और आज भी चाय ही पीता हु।
शाम होने को होता है, लड़की कार स्टार्ट करती है, बन्द शीशे से बाय कहती है।
लड़का मुस्कुराकर  कार को जाते हुए देखता रहता है।
सचमुच मुझे दिल्ली में कुछ भी पसंद नही आता तुम्हारे सिवा। लड़का बुदबुदाता है, और चल पड़ता है पटेलचेस्ट की ओर , जहाँ छोटे से कमरे में इंतजार कर रहा होता है, घर की उम्मीद, नए सपने, सिद्धान्त, और एक विचारधारा।

Thursday, October 1, 2015

हिन्दू और मुसलमान

मैं , मैं नही हूँ।
तुम , तुम नही हो
मैं बस हिन्दू हूँ, और तुम बस मुस्लमान
क्योकि मैं भगवान को मानता हु
और तुम पैगम्बर को
मैं दीवाली मनाता हु और तुम ईद
मैं मन्दिर जाता हु तुम मस्जिद
मैं भजन करता हु तुम आजान पढ़ते हो
सब झूठ की बाते है जो कहते है
हम सब एक है
मुझे तो नही दिखता
जहाँ तुम ज्यादा हो
वहां मैं काँपता हूँ
जहाँ मैं ज्यादा हु
वहा तुम रात भर नही सोते
मन्दिरो पर फेके जाने वाले मांस
मस्जिदों पर फेके जाने वाले मांस
दोनों ही अलग होते है
इसलिए तो कभी तुम जलते हो
और कभी हम जलाये जाते है
पर एक समानता है
हम दोनों ही है हैवान
(पीछे से आवाज आती है)
नाह फिर भी अलग है
मैं हिन्दू हैवान
तुम मुसलमान हैवान

~गौरव

वो मांस का टुकड़ा ही था।

देश विकलांगता के दौर से गुजर रहा। जहाँ हम और आप अंधेपन, और गुँगेपन के बीमारी से ग्रसित होते चले जा रहे। अंधे होकर ही भीड़ का हिस्सा बनते है, क़त्ल करते है, हिंसक होते है, और फिर अंधे होकर घटना से अनजान होते है। हिंसा से पहले मूक रहते है, हिंसा के बाद भी गूंगा रहना ही पसंद करते है। श्री मान डर लगता है, की कब हम और आप इस भीड़ का शिकार हो| कब हम और आप कुचले जाये उस भीड़ से, ईंटो से अपने सर को कुचलते हुए पाये, गर्दन से खून का फवारा जमींन पर फ़ैल रहा हो, और रक्त पान कर रहा हो हजारो की संख्या में आया कोई दरिंदा। मेरी आँखे पड़ी हो दूर ,देख रहा हो हाथो को कटते हुए,लादो को फटते हुए। डरिये,डरना चाहिए। कब तक लाउडस्पीकर की  आवाज और व्हाट्सऐप पर खड़ी होती रहेगी भीड़【】कब तक दिए जाते रहेंगे मंदिरो और मस्जिदों से आदेश?सवाल खुद से पूछे एक बार।
कब तक धर्म बनाता रहेगा हमे अँधा। एक मांस के टुकड़े के लिए हम जीवित शरीर को मांस का टुकड़ा बना देते है। हाय रे विडंबना, हम कल भी मौन थे और आज भी मौन हो जाते है, और उसी मौन से साबित कर देते है, everything is fine| कोई मौत नही हुई, किसी ने नही मांगी थी अपने जान की भीख, कोई नही गिड़गिड़ाया था,किसी ने हाथ नही जोड़ा था अपने इज़्ज़त को बचाने को, कोई नही लड़खड़ाया था, कोई घसीटा नही गया था, किसी ने नही तोडा था दम,सड़क पर।
सब अफवाह है,सब झूठ है। बस सच इतना है, की वो मांस का टुकड़ा ही था।

~गौरव

Thursday, September 24, 2015

जलता है सिगरेट, उठती है धुँआ

जलता है सिगरेट
उठती है धुँआ
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुँह से बाहर
ठीक वैसे ही
जैसे निगलता है कोई यथार्थ को
सब कुछ निगल जाने वाला
और सब कुछ बोल देने वाला
हाशिये पर
खड़ा पाता है खुद को
इसलिए बुद्ध का माध्यम मार्ग
सबको आसान लगता है
सब कुछ पा भी लो
बिना कुछ खोये हुए
क्योकि ना तो सबकुछ निगलना होता है
ना ही सब कुछ घोटना
बिलकुल सिगरेट की तरह
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुंहँ के बाहर।
~गौरव

Sunday, September 13, 2015

चलो पल भर दे दो साथ मेरा

  चलो पल भर दे दो साथ मेरा
चलो दो पल ही थामो हाथ मेरा
कल तक अजनबी थे
कल भी अजनबी हो जाओगे
कल तक तस्वीरों में थे
कल यादो में बस जाओगे

अनजान थे जिन रहो से
गुजर कर देखो कभी
पुराने वीरान जिंदगी में
उभरे प्रेम के उस मोड़ पर मुझे पाओगे

पूनम की चांदनी में आज तुम आये हो
मेरे सूखे होठो पर जो प्यास जगाये हो
सर्द सुबह में जो  ओस के बूंद  लाये हो
सदियों से दूर ,
आज  जो करीब आये हो

चलो पल भर दे दो साथ मेरा
चलो दो पल ही थामो हाथ मेरा

           -गौरव


(लिखे जा रहे उपन्यास की आंशिक झलकी)

प्रेम चयन करने की चीज नहीं है।प्रेम सास्वत और स्वाभाविक है।प्रेम चर्चा का विषय नही है। यह एक स्वानुभूति है। एक जीवन का रस है, जो मीठा है। प्रेम में संवेदनशीलता है। रोम रोम कम्पित करने वाली अनुभूति है जो सर्द में एहसास हुए उस मीठे दोपहरी के धुप की तरह है, जब कई दिनों के बाद निकले धुप की चासनी में आप नंगे बदन को डुबो रहे होते है। यह वैसा ही है जब आप आँख बन्द किये नील आसमान में उड़ रहे होते है ,और धरती की और आँख खोल देखना तक नही चाहते क्योकि वास्विकता के दीवार पर होने वाले चोट से हम और आप डरते है।
(लिखे जा रहे उपन्यास की आंशिक झलकी)
गौरव

Thursday, September 10, 2015

25 जून के फसबुकिया वाल से


मैं पंथविरोधी हूँ।मैं धर्म विरोधी हूँ।मैं विचारधाराओ के मकरजाल का सख्त विरोधी हु जो आज हर एक युवाओ को गुलाम बना रहा।क्योकि मुझे स्वतंत्रता प्यारी है,स्वछंदता प्यारी है.मैं उस दौड़ का घोड़ा कतई नहीं बनना चाहता जिसमे मेरे आखो के दोनों बगल में पट्टी बन्धी हो ।मैं विचारो की स्वतंत्रता पर जोर देता हु ना की विचारधाराओ और वाद(ism) के गुलामी पर।आँख बन्द कर बोला गया लाल सलाम भी उतना ही खतरनाक है जितना भगवाधारी नारेबाज।मैं भीड़ का हिस्सा कतई नही बनना चाहता जहा स्वार्थ साधन अंतःकरण में बसा हो।

द्वन्द

जब इस चित्र को द्रष्टा भाव से देखता हु तो बस दीखता है सौंदर्य। जिंदगी की रस्सी पर संतुलन बनाये हुए हम और आप। लाठी के दो किनारो पर खुशिया और गम दोनों टीके है,जो खुबसुरत जिंदगी को संतुलित कर रही।पर जब टूटती है तन्द्रा तो क्षण भर में पाता हु की कुछ गमगीन गाने कानो में सुनाई दे रहे,और सौंदर्य से रोमांचित चेहरे पर दुःख का एहसास होता है,जब देखता हु मासूमियत,जरुरत,और मज़बूरी इस बच्ची के चेहरे पर। निचे भाई करतब दिखता है,माँ हौसला बुलंद करती है, कही दूर खड़ा बाप पैसे का इंतजार कर रहा।बगल से तेजी से  सरसराती कार गुजरती है।अंदर बैठे प्रेमी जोड़े को कुछ नयी चीज  दिखती है ।  आज जब वो एक दूसरे के आगोश में बैठेंगे,प्रेम के धुन में डूबेंगे  और प्रेमिका पूछेगी,जान कितने प्यारे बच्चे करतब दिखा रहे थे।प्रेमी इन सब बातो को अनदेखा कर प्रेमिका के बालो से खेलता हुआ शाम होने का इंतजार कर रहा होगा,क्योकि प्रेमिका को उसके हॉस्टल छोड़ घर भी जाना होगा। खैर  आप जब संवेदनशील होते है तो अक्सर द्वन्द में होते है।और जब मुझ जैसा राजनीती शास्त्र का छात्र जो साहित्य दर्शन में रूचि रखता है,तो आप द्वन्द,और उलझन की परिकल्पना भी नही कर सकते।

Tuesday, September 8, 2015

उड़ रहा था मैं ख्वाबो में 
सोया था माँ की बाँहो में
ममता भरी माँ की लोरी थी
दूर चंदा मामा थे
पास दूध कटोरी थी
रंग बिरंगे सपने थे
कल तक सब मेरे अपने थे
एक पानी का सैलाब था
माँ के थपेड़े जैसा ही ख्वाब था
कुछ टूटे थे तारे,कुछ छूटे थे प्यारे
क्या माँ ने मुझे जगाया था
क्या माँ ने मुझे बुलाया था
पर मैं अब भी क्यों ख्वाबो में था
क्यों बदहवास पानी के सैलाबो में था
उठना चाहा था,खोली कई बार आँखें
देख सकु दूर किनारे अपनों को
देख सकु सारे छुटते सपनो को
एक पुकार दो माँ अब मुझे
जाग सकु बेबस नींद से।
फिर खिलखिला सकु मैं तुम संग
कुछ टूटे फूटे लफ्जो में

कविता:हां वो डरते है।


कविता:हां वो डरते है।
हाँ वो डरते है।
सच और इन्साफ से डरते है
हमारे सोच और संवाद से डरते है
हाँ वो डरते है।

जब बेबस हाथो में अंगारा होता है
जब एक गरीब भूखे पेट सोता है
चीखता है ,चिल्लाता है
खुद को उनके सामने जब बेबस पाता है,
तब हर एक आवाज उठता है
उनके आलीसान महलो के सामने,
जब एक हुजूम रुकता है
तब,वो डरते है।

हाँ वो डरते है।
अपने सपनो में पीसते गरीब की पुकार से डरते है
अपने इन्साफ की मांग करते एक गरीब की हुंकार से डरते है।।
हां वो डरते है।।
अंधे न्याय के सामने गरीब जब चुप हो जाता है,
अपनी हक़ को मांगने पर जिन्दा जलाया जाता है,
तो दूर गांव में उठे तूफ़ान से डरते है,
तख़्त को झकझोरता हर एक गरीब,बूढ़े बच्चे जवान से डरते है,
हाँ। वो डरते है।।
कविता -नया और पुराना
कुछ गीत पुराने है,
कुछ लफ्ज पुराने है,
कुछ यादे पुरानी है,
कुछ नग्मे पुराने है,
फिर भी नया सा लगता है,
हर सुबह की सूरज,
रात की मिठी चाँदनी,
हवा का गुनगुनाना,
पेड़ो का सरसराना,
तुमसे मुलकात पुरानी है,
पर मिलन नया है,
झाकता हु जब भी कल की यादो मे,
वक्त का समुन्द्र सिमट सा जाता है,
किस्से पुराने होते है,
पर दिलो से लिपट सा जाता है,
उसी पुराने मोड़ पर अक्सर आता हु,
क्योकी नये की चाहत मे,
वही पुराना अक्सर नया सा लगता है.


नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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