मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Friday, November 4, 2016

लोकतंत्र, सवाल और पत्रकार रवीश

Ndtv इंडिया पर बैन लगा है।फेसबुक खचाखच स्टैंड विथ ndtv के साथ ट्रेंड करने लगा है। यह वो लोग है जो सवाल को अहमियत देते है, और जिससे सरकार डरती है। क्योकि यह जिन्दा लोग है।

रवीश ने जबाब में प्राइम टाइम में अनोखा प्रयोग किया है, और हर बार करते है। सवाल करने के नए ढंग पर बखूबी से अपनी बात लोगो तक पहुचायी। "सवाल का सवाल है" नाम से 4 नवम्बर की primetime में सवाल किया कि सवाल कैसे करे, और सवाल करे तो जबाब अथॉरिटी देगा या ट्रोल। आर्ट ऑफ एक्सप्रेशन के माध्यम से मौजूदा हालात पर चुटकी लेते हुये रवीश ने पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़ी।

http://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/prime-time-when-we-will-not-ask-the-questions-so-what-would-we-do-437481

(इस लिंक पर वीडियो उपलब्ध है)

रामनाथ गोयनका पुरस्कार " जॉर्नलिस्ट ऑफ़ द ईयर " से सम्मानित रविश डिबेट को हो हुल्लड़ न बनाकर एक महत्वपूर्ण जानकारी देने का प्रयास करते है ताकि दर्शको को कुछ सकारात्मक जानकारी मिल सके। रवीश सवाल को अहमियत देते है, और एक पत्रकार का उसूल भी यही कहता है।

दृग कालिमा में डूबकर
तैयार होकर सर्वथा
हाँ लेखनी हृतपत्र पर
लिखनी तुझे है वह कथा
जग जाये तेरी नोख से
सोये हुए वो भाव जो

          (मैथिलि शरण गुप्त)

लोकतंत्र में सवाल क्यों महत्वपूर्ण है ?

जो सवाल नही करते वो जीते जी मरे हुये होते है, और जो सवाल करते है, मरकर भी उनका सवाल जिंदा रहता है।

थोडी देर सोचिये, क्या पता अगले दो सेकंड में आप सोचना भी बंद कर दे। इसलिये जल्दी ही सोचिये की अगर " आपके दिमाग में सवाल आना बंद हो जाये" तो क्या होगा। मैंने सोच कर देखा है- जी बिलकुल मैं डर गया था। मेरे हाथ पैर काँपने लगे थे। क्या, क्यों,कब्, कैसे ये प्रश्नवाचक शब्द मुझसे दूर जा रहे थे। ऐसा लगा समय यही रुक जाएगा।

जी बिलकुल जिसदिन आपके दिमाग में सवाल नही आएंगे, आप एक मशीन हो जायेंगे या जीते जी निष्प्राण हो जायेंगे।  आपकी आत्मा जिंदा है, वह इस बात का सबूत है जब तक आप सवाल कर्  रहे है।

सवाल आपको जिन्दा रखी हुई है, सवाल आपमें गति बनायी हुयी है। हम विकास तभी कर् रहे जब हम सवाल कर रहे।

अगर न्यूटन ने सेब को गिरता हुआ देख यह न पूछा होता की - सेब "कैसे "गिरा तो आज गुरुत्वाकर्षण का नियम हम नही जान पाते।
खोज हमारे अंदर उपजे सवाल का ही फल है।

आज सवाल न हो तो हम जीते जी मर जाते है। हम आत्माहीन प्राणी हो जाते है। आप सवाल करे सरकार से, समाज से, परिवार से । अगर आप चुप है तो सवाल करे खुद से की आप सवाल क्यों नही कर रहे।

सोच जिन्दा है,तो सवाल जिन्दा है, और सवाल जिन्दा है तो आप जिन्दा है। वरना सन्नाटा तो मरघटों पर पसरा ही है।

मौजूदा परिस्तिथी आपके सवाल को खत्म कर रही, मतलब आपको खत्म कर रही। आप चलते फिरते लाश है फिर, या यु कहे मशीन है।

भीड़ सवाल नही करती, दंगा करती है। हमेशा सवाल आखिर में खड़ा, भीड़ से अलग  एक शख्श करता है। तय करे आप की गूंगी भीड़ में शामिल होना चाहते है आप या एक अकेला सवाली बनना चाहते है। जो सवाल करता है, सरकार उस पर बवाल करती है।

वो जनता जिन्हें सरकार से सवाल करना पसंद नही है,( अंध भक्त) वो रवीश की प्राइम टाइम कैसे देखे, ताकि वो कुछ अपने लिए सकारात्मक जानकारी निकाल सके।

1- भूल जाये की स्टूडियो में बैठा शख्स रवीश कुमार है। यह भी भूल जाये की वह ndtv इण्डिया देख रहे है। ( कोशिश कीजिये थोड़ा मुश्किल है कुछ पूर्वाग्रहों से निकलना)

2- भूल जाइये की जो आलोचना हो रही है, वह बीजेपी सरकार की है। यूँ सोचिये यह किसी और देश की किसी और सरकार की बात कर रहे। ( यहाँ फूलों में बहार है)

3- जब भी कही मोदी सरकार की अच्छाई बताये। आप यूट्यूब या आर्काइव में जाकर बार बार देखिये।

मैं इसलिय यह सुझाव दे रहा क्योकि मौजूदा समय में जहाँ सोच और सवाल दोनों को खत्म किया जा रहा, आपको एक नागरिक होने के नाते अपने कुंद मानसिकता को खोलने की जरूरत है। आज अगर आपका पडोसी सवाल करने पर बुरा हश्र झेल रहा तो कल आप होंगे। सरकारे बदलेंगी पर कारनामे वही रहेंगी, फिर जब आप उनके चपेट में आएंगे, तब मत करना याद उस पत्रकार को" जिसने सवाल करना सिखाया।

बाकि जो है सो हइये है।

Wednesday, October 26, 2016

नवम्बर का महीना

नवम्बर का महीना, सर्द भरी हवा, एक मोटे किताब को सीने से चिपकाये, हल्के हरे ओवरकोट में तुम सीढ़ियों से उतर रही थी। इधर उधर नजर दौड़ायी, पर जब कोई नही दिखा तो मज़बूरी वश तुमने पूछा था-कॉफी पीने चले। तुम्हे इतना पता था की मैं तुम्हारे क्लास का हूँ, और मुझे पता था कि तुम्हारा नाम सोनाली रॉय है। बंगाल के एक जाने माने लॉयर अनिरुद्ध रॉय की इकलौती बेटी हो। लाल रंग की स्कूटी से कॉलेज आती हो और क्लास के अमीरजादे भी उतने ही मरते है, जितना हम जैसे मिडिल क्लास लड़के। जिन्हें सिगरेट , शराब , लड़की, और पार्टी से दूर रहने की नसीहत हर महीने दी जाती है। जिनका एक मात्र सपना होता है, माँ - बाप के सपनो को पूरा करना। और ये तुम जैसी लड़कियो से बात करने से इसलिय हिचकते है क्योकि हाय हैलो के बाद की अंग्रेजी बोलना इन्हें भारी पड़ता है।

तुम रास्ते भर बोलती रही थी और मैं सुनता रहा, क्योकि तुमने मौका नही दिया और मुझे सुनन अच्छा लग रहा था। तुमने मिश्रा सर, नसरीन मैम की बकबक, वीणा मैम की समाचार पढ़ने जैसा लेक्चर और न जाने कितनी कहानियाँ तेजी से सुना गयी थी। और मैं बस मुस्कुराते हुए तुम्हारे चेहरे पर उठते हर भाव को पढ़ रहा था। तुम्हारे होठ के ऊपर  काला तील था, जिसपर मैं कुछ कवितायेँ सोच रहा था, तबतक तुम्हारी कॉफी आ गयी और मेरी चाय।

तुमने पूछा था- तुम कॉफी क्यों नही पीते ?

मैंने मुस्कुराते हुए बोला- चाय की आदत कभी छुटी नही।

तुम यह सुनकर काफी जोर से हँसी थी,
शायरी भी करते हो।

मैं झेप गया।

तुम इतने समय से कुछ भूल रही थी, मेरा नाम पूछना, क्योकि मैं तुम्हारी आवाज में अपने नाम को सुनना चाह रहा था, तुमने तब भी नहीं पूछा था।

हम दोनों उठ कर चल दिये थे, कैंपस से विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन की ओर...

बात करते करते तुमने कहा था, सज्जाद पता है, मैं अक्सर सपना देखती थी की मैं फोटोग्राफर बनूँगी ।पुरे विश्व् का चक्कर लगाऊ, और सारे खूबसूरत नजारे को अपने कैमरे में कैद कर लू। लेकिन आज मैं मील, मार्क्स और लेनिन की किताबो में उलझी हुई हूँ। कभी जी करता है तो ब्रेख्त को पढ़ लेती हूँ, तो कभी कामू को.. 

हम अक्सर जो चाहते है, वैसा नही होता है और शायद अनिश्चितता ही जीवन को खूबसूरत बनाती है, अक्सर सबकुछ पहले से तय हो तो जिंदगी से रोमांच खत्म हो जायेगा। हम उम्र से पहले बूढ़े हो जायेंगे, जो बस यही सोचते है, अब मरना ही एकमात्र लक्ष्य है।

सज्जाद ,तुम क्या पॉलिटिकल साइंस अपनी मर्जी से चुना ,तुमने पूछा था।
हाँ,मैंने कहा ।
नही कहने का कोई मतलब नही था उससमय।

मैं खुद को बताने  से ज्यादा,तुम्हे जानना चाह रहा था।

और हा, मेरा नाम सज्जाद नही , आदित्य है, आदित्य यादव- मैंने जोर देते हुये कहा।

ओ तो तुम लालू यादव के परिवार से तो नही ?

बिलकुल नही, पता नही क्यों बिहार का हर यादव , लालू यादव का रिश्तेदार लगता है लोगो को।

कुछ पल दोनों चुप हो , कई कदम चल चुके थे। मैंने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा था-वैसे ये सज्जाद कौन है?

कोई नही, बस गलती से बोल गयी थी।

तुम्हारे चेहरे के भाव बदल गए थे।
कहाँ रहते हो तुम?

हम बात करते करते मानसरोवर हॉस्टल आ गए थे, मैंने इशारा किया-यही!

मेट्रो स्टेशन पास में ही था, तुम विदा लेने को हाथ बढ़ाई। हाथ पर कई निशान थे।

मैंने पूछा था- ये निशान कैसा?

अरे वो कल कुक नही आयी थी, तो खुद रोटी बनाते वक़्त जल गया । कभी आदत नही है ना।
मैंने हाथ मिलाया, ओवरकोट की गर्मी अब भी तुम्हारे हाथो में थी।

इस खूबसूरत एहसास के साथ मै सो नही पाया था,  सुबह जल्दी तुमसे ढेर सारी बाते करनी थी, क्योकि मैं अक्सर पहली मुलाकात में चुप रह जाता हूँ।

मैं कॉलेज गया था अगले दिन, मेरा चेहरा खुद ब खुद मुस्कुरा रहा था। कॉलेज में इस बात की चर्चा जरूर होने वाली थी, क्योकि हम दोनों को साथ घूमते हुए, क्लास के कई लड़के लड़कियो ने देख लिया था।

एक खूबसूरत इलीट लड़की के साथ अगर मिडिल क्लास लड़का साथ दिख जाये तो लड़के की खुश्किस्मती की चर्चा पुरे क्लास में होती है।

उस दिन तुम नही आयी थी। उस दिन समय का हर सेकण्ड बोझिल लग रहा था। तुमने कॉलेज छोर दिया था।

दो साल बाद दिखी थी, उसी नवम्बर महीने में कनॉट प्लेस के इंडियन कॉफी हाउस के सीढ़ियों से उतरते हुये।

मेरा मन जब भी उदास होता है , मैं निकल पड़ता था, इंडियन कॉफी हाउस। दिल्ली की शोर भरी जगहों में एकमात्र यही जगह थी जहाँ मैं शुकुन से उलझनों को जी सकता था। यहाँ मैं उजले कप में कॉफी और चीनी को चम्मच से घूमता रहता और कल्पनाओ को नई उड़ान देता।
  मैंने अब वक़्त के साथ कॉफी पीना शुरू कर दिया था, चाय की आदत छुट गयी थी। कभी कभी इस नयी बदलाव की वजह तुमको मानता हूँ।

हल्की मुस्कुराहट के साथ तुम मिली थी उस दिन, कोई तुम्हारे साथ था। तुम पहले जैसी चहक नही रही थी। एक चुप्पी थी चेहरे पर- जैसे पुराने कुँए के पानी में होता है, जहां अब औरते पानी लेने नही जाती, अब आसपास चुहलबाजी नही होती, अब वहा बच्चे नही नहाते, अब तो वहा बाल्टी भी नही है।
तुम्हारा इस तरह मिलना मुझे परेशान कर रहा था। इस तरह तुम्हारी मुलाकात मुझे परेशान कर रहा था। तुम बस उदास मुस्कुराहट के साथ मिलोगी और बिना कुछ बात किये सीढ़ियों से उतर जाओगी , ऐसा होना मुझे अंदर तक कचोट रहा था। इसी उधेड़बुन में सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते गिरा पर्स मिला- खोलकर देखा तो किसी अंजुमन शेख का था , बुटीक सेंटर , साउथ एक्सटेंशन पता था, दिए हुए नम्बर पर कॉल किया तो स्विच ऑफ था।

तुम्हारे बारे में सोचते सोचते रात के आठ बज गए थे। अचानक याद आया की किसी का पर्स मेरे पास है, जिसमे यही कुछेक बारह सौ रुपये और एक डेबिट कार्ड है । मैंने फिर एक बार कॉल लगाया, इस बार रिंग हो रहा था।

हैलो( एक खूबसूरत आवाज सुनाई दिया)

जी , आपका पर्स इंडियन कॉफी हाउस की सीढ़ियों पर गिरा मिला। आप बताये इसे कहाँ आकर लौटा दूँ।

आदित्य बोल रहे हो( उधर से आवाज आयी)

सोनाली तुम, मैं आश्चर्यचकित था।

कैसी हो तुम और ये अंजुमन शेख का कार्ड? तुम हो कहाँ? तुम  कॉलेज क्यों छोड़ दी थी? मैं सारे सवाल का जबाब जान लेना चाहता था, क्योकि मुझे कल पर भरोसा नही था।

तुमने बस इतना कहा था-कल कॉफी हाउस मिलो 11 बजे।

उस रात फिर नही सो पाया था, कल जल्दी उठकर मिल लेना चाहता था। बहुत से सवाल थे मन में जिसे जल्द से जल्द जान लेना चाहता था। तुमसे बहुत कुछ पूछना था, तुमको बहुत कुछ कहना था।

अगले दिन ,कॉफी हाउस के उजले कप में कॉफी और चीनी को बड़ी तन्मयता से मिला रहा था कि तुम्हे आते हुये देखा..

हल्के हरे रंग की ओवरकोट में, नवम्बर की पहली मुलाकात याद आने लगी। मस्तिष्क हमारी सारी यादो को सहेज कर रखता है। आज पुरानी सारी कड़िया अपने आप जुड़ती चली गयी।

दो साल पहले उस हरे ओवर कोट में सोनाली मिली थी, सपनो के साथ जीने वाली सोनाली, बेरंग जिंदगी में रंग भरने वाली सोनाली। पर दो साल में तुम बदल गयी थी, तुम सोनाली नही थी। तुम एक हताश, उदास, सहमी अंजुमन शेख थी। जिसने दो साल पहले घर छोड़ कर अपने प्रेमी सज्जाद से शादी कर ली थी। वही सज्जाद जिसके बारे में तुमने मुझसे छुपाया था।

आप जिससे प्रेम करो, उसके साथ जिंदगी का हर एक पल जीने को मिले, इससे खूबसूरत और क्या हो सकता है। इस गैरमजहबी प्रेम विवाह में निश्चित ही तूमने बहुत कुछ झेला होगा, पर प्रेम सारे जख्म को भर देता है। पर तुम्हारी इन सब बातो की नही थी, वह थी तुम्हारे और सज्जाद के बिच आये रिश्तों की कड़वाहट की, जो वक़्त के साथ और बद्तर हो रहा था, जहाँ प्रेम एक बस्ते में बन्द हो गया था।

शादी के बाद प्रेम ने बन्धन का रूप ले लिया था। अधिपत्य के बोझ तले रिश्ता बोझिल हो रहे थे।तुम तो विश्व् की चक्कर लगाने वाली लड़की थी, तुम रिश्तों को जीना चाहती थी, ढोना नही। जिसे तुमने प्रेम था, वह घुटन बन गया था, वहा शक ने दरवाजा खट खटा दिया था। 

तुम सब कुछ कहती चली गयी थी और मैं तुम्हारे चेहरे पर उठते हर भाव को वैसे ही पढ़ना चाह रहा था, जैसे पहली दफा पढ़ा था। तुम्हारे आँखों से आँसु टपक रहे थे, जो तुम्हारे होठ के ऊपर बने तील तक पहुँच रहे थे। तुम कुछ हल्का महसूस कर रही थी।

तुमने सज्जाद के लिये नाम बदला था, अपनी कल्पनायें बदली। तुमने खुद को बदल दिया था। प्रेम में बदलना सही है या गलत नही मालूम, पर खुद को बदल कर तुमने प्रेम भी तो नही पाया था।

वक़्त हो गया था फिर एक बार तुम्हारे जाने का, सज्जाद घर पहुचने वाला होगा, तुमने कहा था।
तुम पर्स ली, और हाथ आगे बढ़ाकर बाय कह।
मैंने जल्दी से तुम्हारा हाथ थामा, वही दो साल पुरानी ओवरकोट की गर्मी महसूस करने को। तुम्हारे हाथ के पुराने जख्म भर गए थे, पर नए जख्म ने जगह ले ली थी। पहले के जख्म सज्जाद के लिए था, अब नए जख्म सज्जाद का था।

इस बिच हमारी फोन पर बातें होती रही, राजीव चौक, नेहरू प्लेस पर  दो बार मुलाकात हुयी।

सब कुछ सहज हो रहा था, तुम्हारे जिंदगी में और मैं असहज। इस बिच मैं लिखता रहा था, तुम्हे कवितायेँ भी भेजता था, पढ़कर तूम रोती भी थी, कभी हँसती भी थी।

एक दिन तुम्हारा मेसेज आया था, " मुझसे बात नही हो पायेगी अब।"

मैंने तुरत कॉल बैक किया, मेरा नम्बर ब्लॉक हो चूका था, तुम्हारा फेसबुक अकाउंट चेक किया, डिलीट हो चूका था। मैं घबरा गया था, तुम्हारी साउथ एक्स वाली बुटीक पर फोन किया तो पता चला तुम एक सप्ताह से वहा नही गयी हो। इसी बीच मेरी नई उपन्यास " नवम्बर की डायरी" बाजार में छप कर आ चूका था, मैं सभाओ और गोष्टीओ में जाने में व्यस्त हो गया, पर तुम्हारा ख्याल मन में हमेशा बना रहा।

समय हर दिन करवटे ले रहा था, सूरज रोज डूबता था, रोज उगता था। धीरे धीरे एक साल गुजर गए थे।

शाम के सात बज रहे थे। मैं कमरे में अपनी नयी कहानी "सोना" के बारे में सोच रहा था। उसका अंत समझ नही आ रहा था। कई लाइन लिखता फिर उस पन्ने को फाड़कर फ़ेक देता। 
सिगरेट की तलब शुरू हुयी, ड्रावर खोला दो सिगरेट बचे थे। तब तक के लिये काफी था। सिगरेट को जलाया, थोड़ी राहत मिली। फिर लिखने बैठ गया। तब तक दरवाजे की घण्टी बजी, मैंने आखिरी कश को अंदर लिया, फिल्टर को बुझाकर ऐशट्रे में डाल दिया।

दरवाजा खोला तो देखा कोई लड़की मेरी ओर पीठ कर खड़ी है।

मैंने कहा, जी...

वह जैसे ही मुड़ी , मैं आश्चर्यचकित हो गया। वह तुम थी, सोनाली ।

हम दोनों गले से लिपट गये थे। मैंने तुम्हे सीने से लगाये हुए पुछा, तुम्हे मेरा पता कैसे मिला।

तुम्हारी उपन्यास पढ़ी "नवम्बर की डायरी", उसी के पीछे तुम्हारा नम्बर और पता भी था।

आदित्य तुमने सही लिखा है, इस उपन्यास में " जिस रिश्तों में विस्वास की जगह न हो, उसका टूट जाना ही बेहतर है"। मैंने सज्जाद को तलाक दे दिया था। हमारी फ़ेसबुक चैट सज्जाद ने पढ़ लिया था, फिर यही से बचे रिश्ते भी टूटते चले गए थे।

मैंने पूछा, कॉफी बनाऊँ।

नही चाय, कॉफी की आदत छुट गयी अब, तुमने कहा।

मैंने तुम्हारे लिये चाय बनाया और खुद के लिये कॉफी।

तुम कॉफी कब से पीने लगे?
तुम्हारे मुलाकात के बाद से।
तुम हँस दी थी। बदलाव प्रेम में सहज हो तो वही शुभ होता है।

तुम मेरे अस्त व्यस्त घर को देख रही थी, अस्त व्यस्त सिर्फ घर ही नही था, मैं भी था। जिसे तुम्हे सजाना और सवारना था, पता नही तुम इसके लिए तैयार थी या नही।

तभी तुमने कहा, ये किताबे इतनी बिखरी हुयी क्यों है, मैं सजा दूँ। मैं मुस्कुरा दिया।

घडी के नौ बज गए थे, हम दोनों किचेन में डिनर तैयार कर रहे थे। तुमने कहा खिड़की बन्द कर दो, सर्द भरी हवा आ रही।

मैंने महसूस किया, नवम्बर का महीना  आ चुका था।

गौरव गुप्ता  

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Freelance writer

कविता , कहानियाँ लिखने में रूचि।

ब्लॉगर- www.aawajpoetry.blogspot.com

Thursday, September 8, 2016

भोजपुरी का मतलब फूहड़ता नही है। गौरव गुप्ता

क्या भोजपुरी मतलब सिर्फ फूहड़ता है ?

बिते दिनों वीर कुँवर सिंह महाविधालय में भोजपुरी की पढ़ाई बन्द करवा दी गयी। पुरे बिहार में विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। भोजपुर और आरा  में चक्का जाम, और रेल जाम तक किया गया। "अश्लिलता मुक्त भोजपुरी एसोसिएशन" के मेम्बर्स ने भोजपुरी को माँ बताते हुए वीडियो बनाया। इसे " आई डेंग बढ़ाई" के नाम से सोशल मीडिया में शेयर किया गया।

फेसबुक पर भी यह बहस छाया रहा। एन डी टी वी के वरिष्ट पत्रकार  "रविश कुमार "ने अपने ब्लॉग क़स्बा में भोजपुरी के समर्थन में लिखा," भोजपुरी बिहारी अस्मिता की आत्मा है"।
इसके जबाब में जानकीपुल ब्लॉगर और कथाकार "प्रभात रंजन "ने  फेसबुक पर यह कहकर नया बहस छेड़ दिया कि " सबसे अधिक द्विअर्थी गाने भोजपुरी में लिखे गए है, और इस भाषा के लोग भाषाई अस्मिता और संस्कार की बात करते है"।

अजित दुबे ने " इंडिका इंफोमेडिया" से प्रकाशित पुस्तक " तलाश भोजपुरी भाषायी अस्मिता की" में लिखते है की भोजपुरी का इतिहास करीब हजार वर्षो का है और यह दुनिभर में 16 देशो में 20 करोड़ से भी ज्यादा लोगो द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। ऐसे में भोजपुरी के " संस्कार"पर सवाल उठाना हास्यास्पद लगता है।

भोजपुरी साहित्यकार रामनाथ पाण्डेय द्वारा  भोजपुरी भाषा का पहला उपन्यास " बिंदिया" प्रकाशित हुयी ,तो उसकी स्वीकृति एक ऐतिहासिक घटना के रूप में हुयी। महा पण्डित राहुल सांकृत्यायन ने सोल्लास अपने पत्र में लिखा था- भोजपुरी में उपन्यास लिखकर आपने बहुत उपयोगी काम किया है। भाषा की शुद्धता का आपने जितना ख्याल रखा है, वह भी स्तुत्य है। पाण्डेय जी की भोजपुरी के प्रथम उपन्यास बिंदिया पर " जग्गनाथ सिंह पुरस्कार", इमरीतिया काकी के लिये " अभयानंद पुरस्कार" महेंदर मिसिर के लिये" राजमंगल सिंह" के अलावा भास्कर सम्मोपाधि भी प्राप्त हुयी थी।

महादेवी वर्मा ने कहा भी है- " भोजपुरी सशक्त लोकभाषा है, तथा उसमे भारत की धरती की उर्वरता और उसके आकाश की व्यापकता एक साथ मिल जाती है।"

भोजपुरी लोकगीतों में राष्ट्रीय चेतना , जनजीवन की अभिव्यक्ति , नारी चित्रण का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

" अपने देश के करनवा जे कि जूझी गइले ना
  केतने माई के ललनवा हाय, मरि गइले ना"

दलितों के दुःख और करुण को लोकगीतों के माध्यम से बखूब स्वर दिया गया है-

"हमनी के रीति दिन दुखवा भोगत बानी,
हमनी के साहिबे से मिनती सुनाइबि"

वही प्रेम दर्शन भी भोजपुरी लोकगीतों में मधुरता से देखने को मिलता है।

" चिड़िया चली चल बगइचा
देखत सावन की बहार
देखत फूली को बहार
सावन में फुले बेईला चमेली
भादो में कचनार
चिड़िया चली चल बगइचा"

इसमें दो राय नही है की वर्तमान भोजपुरी फ़िल्म फूहड़ता की ओर उन्मुख हुयी है, जैसी की अन्य भाषा की भी हुयी है। अश्लीलता और फूहड़ता को किसी एक भाषा से जोड़ना गलत है। क्योकि फूहड़ता भाषा की नही समाज की उपज है, जो भोजपुरी, बंगाली, मराठी, हरयाणवी, पंजाबी, कन्नड़ किसी भी भाषा में हो सकता है। 
भोजपुरी फिल्में भोजपुरी की दशा और दिशा बनाने में सहायक है, न की वही सबकुछ है। ऐसे भोजपुरी के भाषाई बहस में क्या " भिखारी ठाकुर" की बिदेशिया को भूल जाया जा सकता है?क्या नदिया के पार और गंगा माँ तोहे पियरी चढ़इबो की लोकप्रियता को अनदेखा किया जा सकता है?मालिनी अवस्थी, मनोज तिवारी कई ऐसे भोजपुरी के नाम है जो देश बिदेश में बिहार का सर गर्व से ऊँचा कर रहे। इन सब में " निल नितिन चन्द्रा" की भोजपुरी फ़िल्म " देशवा" को कैसे नाकारा जा सकता है। भोजपुरी बृहद साहित्य को संकीर्णता से समझना हमारी भूल है।
जब जिय हो बिहार के लाला गाना गूंजता है, तो एक अलग अनुभव होता है जो की भोजपुरी भाषा में लिखा गया है, ऐसे में रविश का कहना की " भोजपुरी का सम्मान , इतिहास का सम्मान है, गलत नही है। भोजपुरी भारत के इतिहास का पसीना है, बिल्कुल सही है। भोजपुरी भाषा बिहारी अस्मिता की आत्मा है।


Friday, August 26, 2016

गाँव याद आता है मुझे


दूर कुँए का निर्मल पानी, वो पीपल की छाँव रे
कितना प्यारा है, हमारा गाँव रे...

गाँव की कल्पना कुआँ , पीपल का पेड़, दालान, चबूतरा, आम की खुशबू, दोपहर की सूनी धूल उड़ाती सड़के, शाम को खाट पर बैठे बड़े-बुजुर्गो की महफ़िल, कहकहे, ठहाकों के बिना अधूरी मालुम पड़ती है। गाँव की कल्पना इस रूप में होना स्वाभाविक है, क्योकि जब भी मैंने अपने गाँव को देखा, इसी रूप में देखा।

आज मुझे कृत्रिम बिजली से रौशन बल्ब से भी ना मिटने वाला अँधेरा, शहरो में पसरा दिखता है, तो वही याद आता है गाँव के दुआर पर जल रहे एक लालटेन की,जो पुरे टोला , मोहल्ला को रौशन कर रहा होता था।

जब दिल्ली आया तो देखा, कुकुरमुत्ते की तरह फ़ैलते, बढ़ते मकानों को , जो मुर्गे की दरबे की तरह दीखते है, जहाँ आपका दरवाजा सिर्फ आपके लिए खुलता और बन्द होता है।

मैंने गाँव के कई घरो में दरवाजा नही देखा, शायद उन्हें इसकी जरूरत नही थी, वही छोटे शहरों में लोहे की ग्रिल ने जगह ले ली, जिसे लोग सुन्दर ढांचे में ढालकर अपने आप को उसके अंदर बन्द कर देते है। गाँव के हर घर का अपना दुआर हुआ करता था, जिसका जितना बड़ा दुआर, उसकी गाँव में उतनी शाख।
ठण्ड के दिनों में हर दुआर पर घुरा फुँका जाता था। घुरा फूंकने का मतलब , धान के फसल से निकले पुआल को जलाया जाना होता था। जो जल्द ही जल कर बुझ जाता था, लेकिन लोग उसी राख को फूँक फूँक कर राख में गर्मी बनाये रखते थे। यह "घुरा" बड़े- बुजुर्ग से लेकर युवाओ के लिए बतकही का अड्डा हुआ करता था, जहाँ लोग देश- दुनिया से लेकर टोला- मोहल्ला का सामान्य ज्ञान बांटा करते थे। जब राख की ढेर की गर्मी बिल्कुल ख़त्म होती तो, वह कुत्ते के सोने का विस्तर हुआ करता था।

शहर में कमरे की ठंडक कृत्रिम हीटर से चली तो जाती है, पर वह वैसा आनन्द नही दे पाता, जिसे गाँव के लोग बुझते राख में भी टटोल टटोल कर लेते थे।

गाँव के हर घर के दुआर पर मड़ई हुआ करता था। एक मड़ई पडोस के दुआर के मड़ई से बिल्कुल सटा होता था, जिससे आप अपने मड़ई में सोये सोये बगल वाले पडोसी से बातचीत कर सकते थे। गाँव के कई कहानियो से वाकिफ हो गया था, जब भी पिता जी के साथ सोता था और वो पड़ोस के मोईन चाचा से बात करते।

सुबह जगने के लिए मोबाइल के अलार्म की जरूरत नही होती थी, बैल के गले की घंटी से निकलती टुनटुन , मुर्गे की बांग्, या पडोसी के झुमर, बिरहा के बोल ही जगा दिया करते थे।
आज शहरों की मोटी दीवारो में आवाज सोखने की शक्ति है, फिर भी सड़को पर चीख पुकार मचा रहता है, उसी समय याद आता है, गाँव की दूर तक फैली शांति।

जब गाँव की पगडंडियों को लांघते, लांघते दूर खेतो में निकल जाते तो कोल्हू मशीन से आती आवाज, एक अलग आनन्द से भर देती। ईख के मौसम में, किसी खेत से ईंख उखाड़ा, छिला , चबाया और रस से भरे मुँह लिए निकल पड़ा अगले पड़ाव की ओर।

देखते देखते समय बीता, पलायन एक मज़बूरी बन कर उभरी या यूँ कहे हम कमजोर निकले जो गाँव में रह सकने की हिम्मत नही जुटा पाये।
आज दिल्ली की भागती- दौड़ती जिंदगी रोज देखता हूँ, रोज गालियाँ देता हूँ इस भाग दौड़ की जिंदगी को, फिर आ जाता हूँ मुनिरका की तंग गलियों में, हाँफते हुए तीन मंजिल चढ़ता हूँ, दरवाजा खुलते ही बेतहाशा पड़ जाता हू बिस्तर पर।
हर रात पत्नी को कहता हूँ, चले गाँव की ओर..
पत्नी माथे को चूमती है और कहती है- तुम हिम्मत बाँधो और मैं बैग बाँधती हूँ.. 5 साल का आरव भागा आता है, अपने छोटे से बैग को लेकर और कहता है" पापा अभी चले"...

आज खत आया है, गाँव से... अंत में माँ ने पूछा है- कब आ रहे?

पत्नी टिकट लिये खड़ी है, आरव छोटे से बैग में अपने खिलौने पैक कर रहा..
और मेरी आँखों से आँसू छलक कर भींगो रहे है.. माँ की चिठ्ठी।

जी के गौरव

कवि, ब्लॉगर

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Friday, May 27, 2016

मेरी कविता



                                                   इन दिनों कुछ नया शब्द ढूंढ रहा हु,
                                                    कि गढ़ सकु नए अर्थ इनमे
                                                   अब तक पुराने पर ही पैबन्द लगा कर
                                                       सुनाता था तुम्हे कविताये

                                                    तुम्हे पैबंदो से प्यार होता गया
                                                      और मैं नए अर्थ से दूर हो गया
                                                     अब तुम कुछ दूर चली ही गयी हो
                                                       तो खोजने दो मुझे नए शब्द
                                                        जो दे सके मुझे नए अर्थ
                                                            जब पढ़ना मेरी कविता
                                                             तो मत ढूँढना पैबन्द
                                                        क्योकि फिर एक दुरी हम दोनों के दरमिया आएगी
                                                       मेरी कविता फिर एक बार फिर तुमसे दूर हो जायेगी

Friday, May 13, 2016

स्ट्रेंजर ....

डिअर  स्ट्रेंजर 
ऊँची छत , लटके हुए बड़े फैन जैसे डरा रहे हो। आज बिजली नहीं है , लाइब्रेरी की कुर्सी पर बैठे बैठे पीठ पसीने से तर बतर हो रहा है।  पानी हर दो मिनट पर गट गट गले उतर रहा है।

वह सामने बैठी है। खुले बाल, खुबशुरत आँखे, गुलाबी होठ,.....  वह चुप चाप किताब पर नजर गराए बैठी है। वह शांत है ,ठहरी हुयी सी , इस भाव में उसे घंटो से चोरी छिपे देख रहा।  वह कभी कभी सलीके से मुस्कुराती है,अंग्रेजी उपन्यास पढ़ रही. गर्मी में सूखते होठो को थोड़ी थोड़ी देर पर पानी से तर कर रही।  होठो की गुलाबी रंगत पानी के फुहार से फिर तारो ताजा हो जा रहे।
कुछ देर पर नजरे एक दूसरे से टकराती है , दोनों कितनी तेजी से अपनी नजरे झुक ले इस बात की होड रहती है।  दोनों एक दूसरे को उतनी  अनजां न  निगाहो से देखते है , जितने अंजान हम है  एक दूसरे से। मैं उसे स्ट्रेंजर कहता हु ,पता नहीं वह मुझे क्या कहती होगी, कोई नाम दिया भी होगा या नहीं। वह कई दफा देखती है अपने ागल बगल ,फिर निगाहें किताबो पर। उसके बाल खुले और घुंघराले है बिलकुल बरसात के मौसम में मंडराते काले बादल की तरह।

एक डर है मेरे दिल में , पाने से पहले खो देने का।  उसके ना में मेरे आत्मबिस्वास् की तिलांजलि न चढ़ जाए।  मैं  टूट क्र बिखर  ना जाऊ।  मैं क्यों डर रहा ,क्या मेरे आत्मबिस्वास् का संबंध मेरे कुरुक्षेत्र की लड़ाई के लड़ने से है ? क्या मैं  ही वह अभिमन्यु है जिसे सातो दरवाजे तोड़ने है।? मैं  किन सवालो से डर  रहा।
दिल और दिमाग के अंतर्द्वंद में फसा हुआ हु।  प्यार और भय अक्सर जिंदगी में एक साथ आते है, भय को दिमाग ने पनाह दे रख है , और प्यार दिल को बेचैन किये बैठा है।

शराब की घूंट शायद मेरे डर को शांत करा सकती है , पर क्या मैं इतना कमजोर  हो गया हु , नहीं,...... कभी नहीं।

वह  कान की बाली में उलझे बालों को सुलझा रही , उसके बालों की लट जैसे जैसे सुलझ रही , मैं उतना ही उलझ रहा।

शाम के सात बज गए है , लाइब्रेरी आठ बजे बंद होगी। उसके बाहर निकलने का इन्तजार है , ताकि उससे मिल कर अपने दिल की बात कह सकु,..... कुछ हल्का कर सकु अपने मन को......

आठ बज गए,......
लाइब्रेरी की लाइट बंद होने लगी,.....  वह किताबें समेट  रही,...... ......


क्रमश... 

Saturday, April 2, 2016

मैं भूल जाता हु...........

मैं भूल जाता हु
चस्मा ,घडी ,पाजामा , मोज़े
बनियान , घडी , दवाइया
 मैं भूल जाता हु
ठण्ड में ताप ना है अलाव
ओढ़नी है राजाइया

बहु कहने लगी है
मैं मेज पर पड़े फोटो को बार बार
सिढाने रख छोड़ देता हु

कल ग्लास का पानी भी
गिर गया था तकिए पर
ऐसा बेटे ने आज कहा

पुराने सन्दूक को यु ही
बार बार खुला छोड़ देता हु
जिसमे रखी हुई है कुछ पुरानी यादें

पोता  पूछता है , क्यों इस कबाड़ को
मैं हर रोज खोलता हु

मैं  भूल जाता हु
दिन, तारीख , मौसम
टेबल लैंप रात भर जला रहता है
डायरी खुली छूट जाती है
बहु कहती है
मेरी चहलकदमी से उसकी नींद टूट जाती है

मोज़े बदबू दे रही
चाय में चीनी ज्यादा पिने लगा हु
सब्जी में  नमक की परवाह नहीं
अब न कुछ गलत लगता है
न ही कुछ सही

कभी कभी घर तक  आने वाले रास्ते को
भूल जाता हु।
इसलिए अक्सर  बेंच पर घंटो बैठा
रास्ते याद कर रहा होता हु
ऐसा  छोटा बेटा रात के डिनर पर मुझसे पूछता है

शायद तुम्हे ज्यादा याद करने लगा हु
इसलिए भूल जाता हु
ऐसा मैं  आईने में खुद को देख कर
सोच रहा।






Saturday, March 19, 2016

देख बहारें होली की / नज़ीर अकबराबादी


नजीर अकबराबादी  उर्दू कविता और शायरी में नायब पहचान रखते है। 1830  में जन्मे नजीर               "नज्म के पिता " के रूप में जाने जाते है। अपनी रचना "बंजरनामा" से उन्होंने ख्याति प्राप्त की ।

                                                      नजीर अकबराबादी 

देख बहारें होली की / नज़ीर अकबराबादी
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जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की
गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।
और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।
ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।।


नासमझ था जो समझदारी की बात किया करता था,,,,, रंजन कुमार\




  • रंजन कुमार
    एक युवा कवि, जो NIIT ROURKELA के छात्र्  है। कविताये और शायरी लिखने का शौक इन्हे हमेशा से रहा है। विज्ञान की कक्षा के बाहर जब प्रकृति के क़रीब जाते है, तो अपने आप को शब्दो को गढ़ने में बेचैन हो जाते है। पढ़िए उनकी कविता......


नासमझ था जो समझदारी की बात किया करता था,
समझ आ गया खुद को समझा कर;
की नासमझ इतनी नहीं ये दुनिया,
कि खुद को समझ ना सके कोई;
या किसी समझदार की शायद इसे जरुरत नहीं |
यहीं हो रहा है दुनिया में;
कि कोई बेवक़ूफ़ लगता है -
जो किसी और की दामन
बचाने की कोशिश करता है;
वो लूट जाता है हमेशा
जो लुटेरों की शिकायत करता है;
है दौलत उसी की, है शोहरत उसी की,
जो खुद का ईमान बेचता है |
यक़ीन ना हो तो जा के पूछो उनसे -
जो तख़्त चलाते हैं ;
क्या कभी झूठ बोला है उन्होंने?
क्या कभी चोरी की है उन्होंने?
अरे उनका तो हर काम बेपर्दा है,
उनकी कमीज़ से लेकर उनके गलीच तक;
सब जनता जानती है ,सब जनता मानती है |
यक़ीन ना हो तो पूछो उनसे -
जो बाजार चलाते है ,
क्या कोई नकली माल बेचा है ?
क्या किसी को नुकसान हुआ है ?
उनके दुकान से लेकर उनके गोदाम तक;
सब जनता जानती है, सब जनता मानती है |
अरे छोड़ो भी इनकी थाह लेना -
कभी फुरसत मिले तो
खुद से पूछ लेना,
क्या कभी तुमने भी बचपन जिया था?
क्या कभी तुम्हे भी दुनिया साफ़ नजर आती थी ?
क्या कभी तुम भी बड़े होने लगे थे खुद को समझा कर ?
अब तो तुम समझदार हो गए हो,
हाँ मैं ही नासमझ था जो तुम्हें समझा रहा था.....

Wednesday, March 9, 2016

प्रिय श्रुति............

प्रिय श्रुति
कल सरस्वती पूजा के पंडाल में देखा। कई साल बाद तुम्हे देख रहा था, बिलकुल नही बदली हो, हां थोड़ी मोटी जरूर हो गयी हो, और मैं तुम्हारी याद में सुख के छुहारा। तुम हरी ड्रेस में बहुत खूबसूरत लग रही थी, बिलकुल माधुरी दीक्षित। ऐसे लग रहा था मानो सरसों खेत में तुम पिला फूल बन लहलहा रही हो। तुम्हारी याद में आज सुबह से कुमार सानु का गाना सुन रहा
...मेरा दिल भी कितना पागल है...
आज वैलेंटाइन डे है, घर के काम से फुरसत मिले तो छत पर आना, और आज के दिन मेहँदी मत लगाना, पिछली बार दिल्ली में कोई लड़की नही लगायी थी। आज दिन भर हम छत पर कुर्सी लगा आसन जमा के बैठे रहेंगे, तुमको एक बार देख लेते है तो ठण्ड में बिलकुल च्यवनप्राश जैसा काम करता है।
छठ में ख़रीदा हुआ कुर्ता आज पहने है जो तुमको हमेशा पसन्द आता था। तुम भी वही हरा ड्रेस पहन निकलना। देखो कहि हम बेहोश न हो जाये...
इस बार भी अपने हाथ का बना पराठा और आलू का कड़क भुजिया बना कर भेज देना..
आज शाम आऊंगा साइकिल मांगने , गेट खोलने जरूर आना। जब तुम पूछती हो "कैसे हो" "कब आये?" तो भूल जाता हु खुद को, भूल जाता हु कैसा हु। बस जी करता है गले लगा कर फफक कर रो पडू। पर तुम कौन सा कंधे पर सर रखकर चुप कराओगी, सॉरी ताने नही मार रहा। दिल्ली की CCTV और यहाँ तुम्हारे बापू दोनों एक ही काम करते है।
लिखते लिखते कुमार सानु का दूसरा गाना भी चालू हो गया..
...धीरे धीरे से मेरी जिंदगी में आना.....

Saturday, January 23, 2016

प्रिय दिल्ली की सर्दी

प्रिय दिल्ली की सर्द
   तुम बिलकुल श्रुति की तरह बीहैव करने लगी हो.. उसका मूड भी बिलकुल उल्टा रहता है, जेसे आजकल समय के साथ तुम्हारी ठण्ड। लाख प्यार होते हुए भी मिलने से डर लगता है ,जेसे तुमसे आजकल लग रहा है। .घर से अब तो हिदायत भी मिलने लगी है , तुमसे दूर रहने के लिए  बिलकुल वेसे ही जब बगल वाली  आंटी  ने श्रुति और हमारे बढ़ते प्यार की खबर घर तक पंहुचा आई थी . बड़ी डाट पड़ी थी , पर चोरी छुप्पे मुलाकात के तरकीब तो हर प्रेमी युगल निकाल ही लेता है.  तुम श्रुति की हमेशा याद दिलाती हो, इसलिए श्रुति बार बार कहती भी है की देखो लगता है, तुम मेरे से ज्यादा ठण्ड से प्यार करते हो. वो तुम्हे अपनी सौतन समझती है .,, पर उस बेवकुफ़  को  कौन  समझाए ,कि "ठण्ड और प्यार का डेडली कॉम्बिनेशन" होता है. तुम बिलकुल श्रुति की तरह मुझे मेरे पढाई से दूर करती हो ,तुम्हारी ठण्ड और उसके केयर में मै आलसी हो जाता हु .
बैलेंस बनाना बहुत मुश्किल होता है .देखो तुम्हारी वजह से आज श्रुति को भी ब्लेम कर दिया, पर लाख शिकायतों के बाद भी तुम्हारा इन्तजार भी हर साल वेसे ही करता हु, जिस तरह हर सेकंड श्रुति से मुलाकात का . मेरे और श्रुति के प्यार में तुम कैटेलिस्ट टाइप काम करती हो, इसलिए थैंक्स तो बनता है . 
  तुम्हारा  गौरव 

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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