मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, September 24, 2015

जलता है सिगरेट, उठती है धुँआ

जलता है सिगरेट
उठती है धुँआ
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुँह से बाहर
ठीक वैसे ही
जैसे निगलता है कोई यथार्थ को
सब कुछ निगल जाने वाला
और सब कुछ बोल देने वाला
हाशिये पर
खड़ा पाता है खुद को
इसलिए बुद्ध का माध्यम मार्ग
सबको आसान लगता है
सब कुछ पा भी लो
बिना कुछ खोये हुए
क्योकि ना तो सबकुछ निगलना होता है
ना ही सब कुछ घोटना
बिलकुल सिगरेट की तरह
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुंहँ के बाहर।
~गौरव

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