मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Tuesday, August 8, 2017

कविता - काका दुःखी है..

 
काका दुःखी है
उनका गाँव शहर हो रहा
बिजली की तारे जब से दौड़ी है आसमान में
लालटेन किसी कमरे में दुबका पड़ा है
रोज शाम को उठते है काका
पेंदी में तेल भरने को
फिर निराश बैठ जाते है अहाते में
भक्क से जलता बल्ब 
कहते है, उनकी आँखें चुभती है
सड़क अब भींगता है
पर बिना खुश्बू के
तारकोल की सड़कें 
जलाते है पैर उनके
चप्पलें बांधती है सांसे उनकी
भागे भागे फिरते है

ठंड में नही जलता घूरा
नही लगता कोई बैठक
सन्नाटा पसरा दुआर पर
काका बीनते है पनिआई आंखों से 
कुछ किस्से जब गाँव सिर्फ गाँव था
दुआर का कुआँ सुना पड़ा है
बाल्टी दूर उल्टी पड़ी है
अब नही लगता औरतों का झुण्ड
नही होती हंसी ठिठोली खींचा तानी
सभ्य हो गये है सब 
और गम्भीर भी
बच्चे नही खेलते आस पास
महँगे खेल कमरे तक रखता है उनको
रिश्तों में लक्ष्मण रेखाएँ खींच आयी है
सब अपने अपने घेरे में सुरक्षित है


रेलगाड़ी से चलकर
आ रहे नये नये
रहन - सहन
नयी - नयी 
बोली - भाषा
काका, उन्हें नही पहचानते
वो काका को नही पहचानते
दोनों चुप्प है और पसरा है सन्नाटा

कल आये थे कुछ शहरी
भूखे आंखों से देख रहे थे खेत को
कहते है धुँआ फेंकता चिमनी लगेगा
आसपास पक्के मकान बनेंगे
पगडंडियों को ईंट से छुपा दिया जायेगा
बड़ी गाड़ियां सरपट दौड़ेंगी
हस्पताल , इस्कूल सब खुलेगा
तस्वीर बदल जाएगी गाँव की

काका दुःखी है
उनका गाँव अब उनका नही रहेगा
गाँव ,शहर हो जायेगा
शहर शहरी लोगों का होगा
काका अकेले रह जाएंगे गाँव मे

यू ही टटोलते समय को
विदा हो लेने के इंतजार में
                                      
                                                

Saturday, August 5, 2017

तुम्हारी यादें

तुम्हारी यादें हरी घास सी है
जो मेरे मन के जमीन पर
बेमौसम उग आया करती है...
तुम्हारी यादें गौरैये का झुंड है
जो हर ढलते शाम में
मेरे नींद के घोंसले में आ आ जाया करती है
तुम्हारी यादें सीधी जाती सड़क पर
उल्टी यात्राएँ है
जो बेवजह है , पर खूबसूरत है
तुम्हारी यादें एक घाटी है
जो दो पहाड़ो को जोड़ती है
जैसे मैं और तुम..
तुम्हारी यादें
हिमाचल के पर्वतो पर उड़ते बादल है
जो बरस जाते है मेरी आँखों से अचानक
तुम्हारी यादें
सेमर की रुई है
जिसे मैं अपने खुले हथेलियों पर रख छोड़ता हूँ
बेपरवाह उड़ने को
तुम्हारी यादें गर्म चाय सी है
जो मेरे मन के प्याले में भरा रहता है हमेशा
तुम्हारी यादें
धूप सी छलांग है
जो तय करती है पलक झपकते मीलो दूरियाँ
तुम्हारी यादें
एक खूबसूरत सफर है
जिसे मंजिल तक पहुंचने की जल्दी नही..


नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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