काका दुःखी है
उनका गाँव शहर हो रहा
बिजली की तारे जब से दौड़ी है आसमान में
लालटेन किसी कमरे में दुबका पड़ा है
रोज शाम को उठते है काका
पेंदी में तेल भरने को
फिर निराश बैठ जाते है अहाते में
भक्क से जलता बल्ब
कहते है, उनकी आँखें चुभती है
सड़क अब भींगता है
पर बिना खुश्बू के
तारकोल की सड़कें
जलाते है पैर उनके
चप्पलें बांधती है सांसे उनकी
भागे भागे फिरते है
ठंड में नही जलता घूरा
नही लगता कोई बैठक
सन्नाटा पसरा दुआर पर
काका बीनते है पनिआई आंखों से
कुछ किस्से जब गाँव सिर्फ गाँव था
दुआर का कुआँ सुना पड़ा है
बाल्टी दूर उल्टी पड़ी है
अब नही लगता औरतों का झुण्ड
नही होती हंसी ठिठोली खींचा तानी
सभ्य हो गये है सब
और गम्भीर भी
बच्चे नही खेलते आस पास
महँगे खेल कमरे तक रखता है उनको
रिश्तों में लक्ष्मण रेखाएँ खींच आयी है
सब अपने अपने घेरे में सुरक्षित है
रेलगाड़ी से चलकर
आ रहे नये नये
रहन - सहन
नयी - नयी
बोली - भाषा
काका, उन्हें नही पहचानते
वो काका को नही पहचानते
दोनों चुप्प है और पसरा है सन्नाटा
कल आये थे कुछ शहरी
भूखे आंखों से देख रहे थे खेत को
कहते है धुँआ फेंकता चिमनी लगेगा
आसपास पक्के मकान बनेंगे
पगडंडियों को ईंट से छुपा दिया जायेगा
बड़ी गाड़ियां सरपट दौड़ेंगी
हस्पताल , इस्कूल सब खुलेगा
तस्वीर बदल जाएगी गाँव की
काका दुःखी है
उनका गाँव अब उनका नही रहेगा
गाँव ,शहर हो जायेगा
शहर शहरी लोगों का होगा
काका अकेले रह जाएंगे गाँव मे
यू ही टटोलते समय को
विदा हो लेने के इंतजार में
उनका गाँव शहर हो रहा
बिजली की तारे जब से दौड़ी है आसमान में
लालटेन किसी कमरे में दुबका पड़ा है
रोज शाम को उठते है काका
पेंदी में तेल भरने को
फिर निराश बैठ जाते है अहाते में
भक्क से जलता बल्ब
कहते है, उनकी आँखें चुभती है
सड़क अब भींगता है
पर बिना खुश्बू के
तारकोल की सड़कें
जलाते है पैर उनके
चप्पलें बांधती है सांसे उनकी
भागे भागे फिरते है
नही लगता कोई बैठक
सन्नाटा पसरा दुआर पर
काका बीनते है पनिआई आंखों से
कुछ किस्से जब गाँव सिर्फ गाँव था
दुआर का कुआँ सुना पड़ा है
बाल्टी दूर उल्टी पड़ी है
अब नही लगता औरतों का झुण्ड
नही होती हंसी ठिठोली खींचा तानी
सभ्य हो गये है सब
और गम्भीर भी
बच्चे नही खेलते आस पास
महँगे खेल कमरे तक रखता है उनको
रिश्तों में लक्ष्मण रेखाएँ खींच आयी है
सब अपने अपने घेरे में सुरक्षित है
आ रहे नये नये
रहन - सहन
नयी - नयी
बोली - भाषा
काका, उन्हें नही पहचानते
वो काका को नही पहचानते
दोनों चुप्प है और पसरा है सन्नाटा
भूखे आंखों से देख रहे थे खेत को
कहते है धुँआ फेंकता चिमनी लगेगा
आसपास पक्के मकान बनेंगे
पगडंडियों को ईंट से छुपा दिया जायेगा
बड़ी गाड़ियां सरपट दौड़ेंगी
हस्पताल , इस्कूल सब खुलेगा
तस्वीर बदल जाएगी गाँव की
उनका गाँव अब उनका नही रहेगा
गाँव ,शहर हो जायेगा
शहर शहरी लोगों का होगा
काका अकेले रह जाएंगे गाँव मे
विदा हो लेने के इंतजार में

