मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, December 10, 2015

विद्रोही

कौन मर गया
जरा मैं भी तो सुनु
किसकी अर्थी उठ रही
जरा मैं भी तो देखु

विद्रोही मर गया?
कुछ लोग कह रहे
शायद वो कुछ लोग नही जानते की
विद्रोही मर ही नही सकता
विद्रोहीपन जीवन है
फिर जो जीवन ही है
वह मृत्यु कैसे

विद्रोही का विद्रोही होना
हाड़ मांस का वजह नही था
विद्रोही का विद्रोही होना
उसके आत्मा से था
और आत्मा मरती कहाँ है?

विद्रोही ने शायद कविताये लिखी नही
उसके जेहन में मची उथल पुथल
धधकती आत्मा
उसे श्ब्दों का पुलिंदा बनाने में मदद किया

विद्रोही कविता लिख ही नही सकता
कविता तो फुरसत के पल
बयां होने वाले सब्द होते है
और विद्रोही के दिमाग में इतनी फुरसत कहा
वह तो बम था
जिसके अंदर रासायनिक परिवर्तन हर क्षण हो रहे थे
जिसे कभी भी फट जाना था।
फट जाना मर जाना नही होता
विखर जाना होता है
और विखरना भी ख़त्म हो जाना नही होता।
विखरना , फ़ैल जाना होता है
और विद्रोही का विद्रोही होना
भी कुछ ऐसा ही था

मैं दावे के साथ कह सकता
विद्रोही मरा नही

विद्रोही
विश्विधालय के
चाय की चुस्कियो में है
उचे निचे पगडंडियों में है
हर सुबह खिलते फूलो में है
हर ढलती शाम में है
हर जलती मशाल में है
हर क्रांति स्वर में है

विद्रोही वही था और वही रहेगा।

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