कौन मर गया
जरा मैं भी तो सुनु
किसकी अर्थी उठ रही
जरा मैं भी तो देखु
विद्रोही मर गया?
कुछ लोग कह रहे
शायद वो कुछ लोग नही जानते की
विद्रोही मर ही नही सकता
विद्रोहीपन जीवन है
फिर जो जीवन ही है
वह मृत्यु कैसे
विद्रोही का विद्रोही होना
हाड़ मांस का वजह नही था
विद्रोही का विद्रोही होना
उसके आत्मा से था
और आत्मा मरती कहाँ है?
विद्रोही ने शायद कविताये लिखी नही
उसके जेहन में मची उथल पुथल
धधकती आत्मा
उसे श्ब्दों का पुलिंदा बनाने में मदद किया
विद्रोही कविता लिख ही नही सकता
कविता तो फुरसत के पल
बयां होने वाले सब्द होते है
और विद्रोही के दिमाग में इतनी फुरसत कहा
वह तो बम था
जिसके अंदर रासायनिक परिवर्तन हर क्षण हो रहे थे
जिसे कभी भी फट जाना था।
फट जाना मर जाना नही होता
विखर जाना होता है
और विखरना भी ख़त्म हो जाना नही होता।
विखरना , फ़ैल जाना होता है
और विद्रोही का विद्रोही होना
भी कुछ ऐसा ही था
मैं दावे के साथ कह सकता
विद्रोही मरा नही
विद्रोही
विश्विधालय के
चाय की चुस्कियो में है
उचे निचे पगडंडियों में है
हर सुबह खिलते फूलो में है
हर ढलती शाम में है
हर जलती मशाल में है
हर क्रांति स्वर में है
विद्रोही वही था और वही रहेगा।