मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Saturday, January 23, 2016

प्रिय दिल्ली की सर्दी

प्रिय दिल्ली की सर्द
   तुम बिलकुल श्रुति की तरह बीहैव करने लगी हो.. उसका मूड भी बिलकुल उल्टा रहता है, जेसे आजकल समय के साथ तुम्हारी ठण्ड। लाख प्यार होते हुए भी मिलने से डर लगता है ,जेसे तुमसे आजकल लग रहा है। .घर से अब तो हिदायत भी मिलने लगी है , तुमसे दूर रहने के लिए  बिलकुल वेसे ही जब बगल वाली  आंटी  ने श्रुति और हमारे बढ़ते प्यार की खबर घर तक पंहुचा आई थी . बड़ी डाट पड़ी थी , पर चोरी छुप्पे मुलाकात के तरकीब तो हर प्रेमी युगल निकाल ही लेता है.  तुम श्रुति की हमेशा याद दिलाती हो, इसलिए श्रुति बार बार कहती भी है की देखो लगता है, तुम मेरे से ज्यादा ठण्ड से प्यार करते हो. वो तुम्हे अपनी सौतन समझती है .,, पर उस बेवकुफ़  को  कौन  समझाए ,कि "ठण्ड और प्यार का डेडली कॉम्बिनेशन" होता है. तुम बिलकुल श्रुति की तरह मुझे मेरे पढाई से दूर करती हो ,तुम्हारी ठण्ड और उसके केयर में मै आलसी हो जाता हु .
बैलेंस बनाना बहुत मुश्किल होता है .देखो तुम्हारी वजह से आज श्रुति को भी ब्लेम कर दिया, पर लाख शिकायतों के बाद भी तुम्हारा इन्तजार भी हर साल वेसे ही करता हु, जिस तरह हर सेकंड श्रुति से मुलाकात का . मेरे और श्रुति के प्यार में तुम कैटेलिस्ट टाइप काम करती हो, इसलिए थैंक्स तो बनता है . 
  तुम्हारा  गौरव 

Friday, January 8, 2016

भीड़ में स्पेस की तालाश

‪#‎लप्रेक‬ जनवरी की डायरी से*** अब तुम्हे लेट आने पर ट्रैफिक होने का एक्सक्यूज़ नही देना पड़ेगा। तुम हमेशा इंतजार करने पर ताने क्यों मारती हो, प्यार में इन्तजार नही तो फिर प्यार कैसा। कभी इन्तजार का मजा तूम भी तो ले कर देखो। हमेशा मैं ही क्यों। ऐसे तो बड़ा फेमिनिस्ट बने फिरते हो, लड़कियो को इम्प्रेस करने के लिए। तुम न अब फेमिनिज्म वेमिनिज्म मत घुसेड़ा करो प्यार में। हमेशा पोलिटिकल क्यों हो जाती हो। मैं तो जा रहा सरकार को चिठ्ठी लिखने। वो क्यों। तुम्हे नही लगता रोड की कम भीड़ ने हमे प्यार करने के स्पेस को कम कर दिया है। याद करो गाडियो की आवाज के बिच हम कितनी आसानी से ऑटो ड्राईवर से बच के अपनी बाते कह लिया करते थे। आइटीओ के पास जब घंटो जाम होता था, और हमे और देर साथ रहने का मौका भी मिल जाता था। चलो न फिर कहि किसी भीड़ में खो जाए। कभी कभी भीड़ भी कितना स्पेस दे देती है ना प्यार करने वाले को\

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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