मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Saturday, October 28, 2017

बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन-


बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है
सीधी नीली रेखा नहीं भींगी आँसुओ से
ना काली स्याही ने रंग छोड़ा पन्नो पर
खिड़की पर नही आयी कोई गौरैया
ना ही बारिश के झोंके से परेशान
मैंने बन्द किया खिड़कियों को..
हड्डियों में चुभती बर्फीली हवा
मेज पर रखे किताबों को बेवजह पलट रही है
मुझे इसमें कोई रस नही
ना ही खीज है, ना ही गुदगुदाहट..
जैसे मेरा यह समय
किसी अंधे की आंखों की पुतलियां हो..
देखता हूँ तस्वीर , दराज से निकालकर
रख देता हूँ, स्मृतियों में बिना यात्रा किये
ये दिल ना जाने, कौन से ज़िद पे अड़ा है
बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है..

मैं चाहता हूँ

कोई ठहर गया है इन आँखों मे ऐसे
जैसे ठहरा गया हो ओंस हरे दुभ पर,
जैसे ठहर गया हो शब्द, कलम की नोख पर
और जैसे सदियों इंतेजार के बाद आकर कोई,
ठिठक गया हो दरवाजे के उस जानिब..
मैं चाहता हूँ ..हवा के बहते ही
ओंस गिर पड़े मिट्टी पर
स्याही बह जाये पन्नो पर
शब्दों के साथ या शब्दों के बिना..
और ,जो आकर ठिठक गया है वो लौटें नही..
दरवाजे के खुलते ही,
लिपट जाये इस जिस्म से
और घुल जाये मन में..
मैं चाहता हूँ, जो ठहर गया है इन आँखों मे
हवा के बहते ही , भभक कर गिर जाये गालों पर
ठीक वैसे ही जैसे घाव में एक चीरा लगते ही
फर्श लाल हो गया हो
और घण्टों बाद आंख खुलने पर
दर्द कुछ कम महसूस होता हो...

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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