मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, September 24, 2015

जलता है सिगरेट, उठती है धुँआ

जलता है सिगरेट
उठती है धुँआ
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुँह से बाहर
ठीक वैसे ही
जैसे निगलता है कोई यथार्थ को
सब कुछ निगल जाने वाला
और सब कुछ बोल देने वाला
हाशिये पर
खड़ा पाता है खुद को
इसलिए बुद्ध का माध्यम मार्ग
सबको आसान लगता है
सब कुछ पा भी लो
बिना कुछ खोये हुए
क्योकि ना तो सबकुछ निगलना होता है
ना ही सब कुछ घोटना
बिलकुल सिगरेट की तरह
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुंहँ के बाहर।
~गौरव

Sunday, September 13, 2015

चलो पल भर दे दो साथ मेरा

  चलो पल भर दे दो साथ मेरा
चलो दो पल ही थामो हाथ मेरा
कल तक अजनबी थे
कल भी अजनबी हो जाओगे
कल तक तस्वीरों में थे
कल यादो में बस जाओगे

अनजान थे जिन रहो से
गुजर कर देखो कभी
पुराने वीरान जिंदगी में
उभरे प्रेम के उस मोड़ पर मुझे पाओगे

पूनम की चांदनी में आज तुम आये हो
मेरे सूखे होठो पर जो प्यास जगाये हो
सर्द सुबह में जो  ओस के बूंद  लाये हो
सदियों से दूर ,
आज  जो करीब आये हो

चलो पल भर दे दो साथ मेरा
चलो दो पल ही थामो हाथ मेरा

           -गौरव


(लिखे जा रहे उपन्यास की आंशिक झलकी)

प्रेम चयन करने की चीज नहीं है।प्रेम सास्वत और स्वाभाविक है।प्रेम चर्चा का विषय नही है। यह एक स्वानुभूति है। एक जीवन का रस है, जो मीठा है। प्रेम में संवेदनशीलता है। रोम रोम कम्पित करने वाली अनुभूति है जो सर्द में एहसास हुए उस मीठे दोपहरी के धुप की तरह है, जब कई दिनों के बाद निकले धुप की चासनी में आप नंगे बदन को डुबो रहे होते है। यह वैसा ही है जब आप आँख बन्द किये नील आसमान में उड़ रहे होते है ,और धरती की और आँख खोल देखना तक नही चाहते क्योकि वास्विकता के दीवार पर होने वाले चोट से हम और आप डरते है।
(लिखे जा रहे उपन्यास की आंशिक झलकी)
गौरव

Thursday, September 10, 2015

25 जून के फसबुकिया वाल से


मैं पंथविरोधी हूँ।मैं धर्म विरोधी हूँ।मैं विचारधाराओ के मकरजाल का सख्त विरोधी हु जो आज हर एक युवाओ को गुलाम बना रहा।क्योकि मुझे स्वतंत्रता प्यारी है,स्वछंदता प्यारी है.मैं उस दौड़ का घोड़ा कतई नहीं बनना चाहता जिसमे मेरे आखो के दोनों बगल में पट्टी बन्धी हो ।मैं विचारो की स्वतंत्रता पर जोर देता हु ना की विचारधाराओ और वाद(ism) के गुलामी पर।आँख बन्द कर बोला गया लाल सलाम भी उतना ही खतरनाक है जितना भगवाधारी नारेबाज।मैं भीड़ का हिस्सा कतई नही बनना चाहता जहा स्वार्थ साधन अंतःकरण में बसा हो।

द्वन्द

जब इस चित्र को द्रष्टा भाव से देखता हु तो बस दीखता है सौंदर्य। जिंदगी की रस्सी पर संतुलन बनाये हुए हम और आप। लाठी के दो किनारो पर खुशिया और गम दोनों टीके है,जो खुबसुरत जिंदगी को संतुलित कर रही।पर जब टूटती है तन्द्रा तो क्षण भर में पाता हु की कुछ गमगीन गाने कानो में सुनाई दे रहे,और सौंदर्य से रोमांचित चेहरे पर दुःख का एहसास होता है,जब देखता हु मासूमियत,जरुरत,और मज़बूरी इस बच्ची के चेहरे पर। निचे भाई करतब दिखता है,माँ हौसला बुलंद करती है, कही दूर खड़ा बाप पैसे का इंतजार कर रहा।बगल से तेजी से  सरसराती कार गुजरती है।अंदर बैठे प्रेमी जोड़े को कुछ नयी चीज  दिखती है ।  आज जब वो एक दूसरे के आगोश में बैठेंगे,प्रेम के धुन में डूबेंगे  और प्रेमिका पूछेगी,जान कितने प्यारे बच्चे करतब दिखा रहे थे।प्रेमी इन सब बातो को अनदेखा कर प्रेमिका के बालो से खेलता हुआ शाम होने का इंतजार कर रहा होगा,क्योकि प्रेमिका को उसके हॉस्टल छोड़ घर भी जाना होगा। खैर  आप जब संवेदनशील होते है तो अक्सर द्वन्द में होते है।और जब मुझ जैसा राजनीती शास्त्र का छात्र जो साहित्य दर्शन में रूचि रखता है,तो आप द्वन्द,और उलझन की परिकल्पना भी नही कर सकते।

Tuesday, September 8, 2015

उड़ रहा था मैं ख्वाबो में 
सोया था माँ की बाँहो में
ममता भरी माँ की लोरी थी
दूर चंदा मामा थे
पास दूध कटोरी थी
रंग बिरंगे सपने थे
कल तक सब मेरे अपने थे
एक पानी का सैलाब था
माँ के थपेड़े जैसा ही ख्वाब था
कुछ टूटे थे तारे,कुछ छूटे थे प्यारे
क्या माँ ने मुझे जगाया था
क्या माँ ने मुझे बुलाया था
पर मैं अब भी क्यों ख्वाबो में था
क्यों बदहवास पानी के सैलाबो में था
उठना चाहा था,खोली कई बार आँखें
देख सकु दूर किनारे अपनों को
देख सकु सारे छुटते सपनो को
एक पुकार दो माँ अब मुझे
जाग सकु बेबस नींद से।
फिर खिलखिला सकु मैं तुम संग
कुछ टूटे फूटे लफ्जो में

कविता:हां वो डरते है।


कविता:हां वो डरते है।
हाँ वो डरते है।
सच और इन्साफ से डरते है
हमारे सोच और संवाद से डरते है
हाँ वो डरते है।

जब बेबस हाथो में अंगारा होता है
जब एक गरीब भूखे पेट सोता है
चीखता है ,चिल्लाता है
खुद को उनके सामने जब बेबस पाता है,
तब हर एक आवाज उठता है
उनके आलीसान महलो के सामने,
जब एक हुजूम रुकता है
तब,वो डरते है।

हाँ वो डरते है।
अपने सपनो में पीसते गरीब की पुकार से डरते है
अपने इन्साफ की मांग करते एक गरीब की हुंकार से डरते है।।
हां वो डरते है।।
अंधे न्याय के सामने गरीब जब चुप हो जाता है,
अपनी हक़ को मांगने पर जिन्दा जलाया जाता है,
तो दूर गांव में उठे तूफ़ान से डरते है,
तख़्त को झकझोरता हर एक गरीब,बूढ़े बच्चे जवान से डरते है,
हाँ। वो डरते है।।
कविता -नया और पुराना
कुछ गीत पुराने है,
कुछ लफ्ज पुराने है,
कुछ यादे पुरानी है,
कुछ नग्मे पुराने है,
फिर भी नया सा लगता है,
हर सुबह की सूरज,
रात की मिठी चाँदनी,
हवा का गुनगुनाना,
पेड़ो का सरसराना,
तुमसे मुलकात पुरानी है,
पर मिलन नया है,
झाकता हु जब भी कल की यादो मे,
वक्त का समुन्द्र सिमट सा जाता है,
किस्से पुराने होते है,
पर दिलो से लिपट सा जाता है,
उसी पुराने मोड़ पर अक्सर आता हु,
क्योकी नये की चाहत मे,
वही पुराना अक्सर नया सा लगता है.


लाल साडी


कविता -लाल साडी
खुद मे खोया सा,सोया सा..
याद कर रहा तुम्हारी मुस्कुराहट..
पतझड की रुखी हवाओ से..
ऊउब रहा हु मै आज,
ना जाने क्यु याद आ रही है,
तुम्हारे कदमो की आहट..
वजह -बेवजह हसता हु मै..
वजह-बेवजह रोता हु मै,
होता है जब जब बेचैन मन..
तन्हा तकियो को पकडे सोता हु मै..
आज फिर तुम्हारी याद आयी है..
फिर कुछ किस्से याद दिलाई है..
धूल से जमे सन्दुक मे देखा..
तुम्हारी वही लाल साडी..
जिसमे तुम्हे पहली बार देखा था,
फिर उभर आयी एक तस्वीर,
घुंघट मे छिपे चांद की..
तब छण भर मुस्कुराया था..
खिल्खिलाया भी था,
फिर आंखो मे हर बार की तरह आये थे आसू..
जिससे तुम हर बार चिढती थी..
पल भर मे पोछ लिया आँसू,
कोई देख ना ले मर्द को रोते हुए..
अपने प्रेम के लिये रोते हुए,.
कोई देख ना ले,बिते समय मे खोते हुए..
देखो ना पत्झड़ की उदासी मे,
याद कर रहा तुम्हारी मुस्कुराहट..
खुद मि खोया सा,सोया सा..
याद कर रहा तुम्हारे कदमो की आहट..


aasha

कविता -आशा
कपकपाती ठण्ड
अँधेरी झोपडी
फटी पुरानी कथड़ी में
लेटा हुआ एक बृद्ध
रिश्तों का ठुकराया हुआ
जिसने रिश्तों के लिए अपने
जीने के मायने बदले थे
आज उठता है चारपाई से
और पकड़ता है खुरदुरी लाठी
जिसने कभी थमी थी मुलायम उंगलिया
जलाता है चिराग,अँधेरी झोपडी में,
मद्धम सी रौशनी ,न मिटने वाला अँधेरा
ढूंढता है फटे पुराने थैलो से,
खाने के लिए कुछ
तीव्र होती है,झोपडी में रौशनी
जब जब सुनता है दरवाजे पर
दस्तक की धीमी आवाज,
खोलता है कपकपाते हाथो से दरवाजा
पाता है सनसनाती हवाओ से
बिखरे पत्तो की खरखराहट
ठीक उसके सपनो की तरह
लुढक जाती है,दो बून्द आँखों से
भींग जाती है पलके
फिर जा लेटता है चारपाई पर
कल उनके आने की आशा में
-गौरव                   

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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