जलता है सिगरेट
उठती है धुँआ
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुँह से बाहर
उठती है धुँआ
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुँह से बाहर
ठीक वैसे ही
जैसे निगलता है कोई यथार्थ को
जैसे निगलता है कोई यथार्थ को
सब कुछ निगल जाने वाला
और सब कुछ बोल देने वाला
हाशिये पर
खड़ा पाता है खुद को
और सब कुछ बोल देने वाला
हाशिये पर
खड़ा पाता है खुद को
इसलिए बुद्ध का माध्यम मार्ग
सबको आसान लगता है
सब कुछ पा भी लो
बिना कुछ खोये हुए
सबको आसान लगता है
सब कुछ पा भी लो
बिना कुछ खोये हुए
क्योकि ना तो सबकुछ निगलना होता है
ना ही सब कुछ घोटना
ना ही सब कुछ घोटना
बिलकुल सिगरेट की तरह
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुंहँ के बाहर।
कुछ छाती के अंदर
कुछ मुंहँ के बाहर।
~गौरव











