१-
सीमा कुछ खा ले ।
मुझे भूख नही।
सीमा , माँ के कई बार खाने के आग्रह को ठुकरा दी थी। वह सुबह से बुखार में थी। दवाईयाँ भी ली, पर कोई सुधार नही।
दोपहर का समय था, पिता जी अभी तक बैंक से पैसे लेकर नही लौटे थे। बैंक के कुछ बदले नियम के कारण पैसे मिलने में असुविधा हो रही थी, और सीमा के शादी का दिन नजदीक आता जा रहा था। इधर माँ घर के बुलाये जाने वाले रिश्तेदारों के सुविधाओं का ध्यान रखने में व्यस्त थी। उनके पास इतना वक़्त भी नही था कि सीमा के नजदीक बैठ कर पूछ सके, सीमा परेशान क्यूँ है?
सीमा घर की सबसे बड़ी बेटी थी। एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। बहुत ही गम्भीर, समझदार और काम के प्रति उतनी ही ईमानदार थी। स्कूल के बाकि शिक्षिकाओं के साथ गप्प करने से दूर वह किसी न किसी क्लास में बच्चों को पढ़ाते दिख जाती थी। बच्चे भी उससे बेहद प्यार करते थे।
अगले सप्ताह सीमा की शादी थी। शादी से पहले हर लड़की नर्वस हो जाती है, पर उसकी परेशानी का वजह था ,विनीत का अचानक कॉन्फरेंस के लिये दिल्ली जाना।
------------------------------------------------------------
२-
विनीत वही लड़का था ,जिससे उसकी शादी होने वाली थी। विनीत उसके पसन्द का लड़का था, जिसे उसने अपने कॉलेज के दिनों से पसन्द किया था। सीमा और विनीत, अलग- अलग क्लास में होने के बावजूद एक ही कॉलेज में थे। कॉलेज के स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट के चुनाव के दौरान उसकी मुलाकात विनीत से हुयी थी।
विनीत भी इस चुनाव में प्रेसिडेंट पोस्ट का उम्मीदवार था चुनावी प्रचार के दौरान ,उम्मीदवार को हर क्लास में जाकर भाषण देने होता था, बच्चो को समझाना होता था, की अगर वह चुनाव जीतता है तो कॉलेज में किस तरह का बदलाव लायेगा।
विनीत के क्रांतिकारी बातो ने सीमा का मन मोह लिया था। वह भी अपने कुछ दोस्तों के साथ ,विनीत के चुनावी प्रचार में शामिल हो गयी थी। विनीत की सबसे अच्छी बात थी की वह लड़कियों की इज़्ज़त करता था और सच के लिये खड़ा होने की उसकी आदत हर किसी को प्रभावित करती थी। वह एक अच्छा वक्ता होने के साथ साथ एक अच्छा, लेखक और कवि भी था।
विनीत का सुबह से शाम चुनावी प्रचार में भाषण देते देते गला बैठने लगता , तो सीमा ही कैंटीन से पानी और जूस की बॉटल लेकर उसके साथ चलती।
दोनों उसी दौरान एक दूसरे के करीब आ गए थे , परन्तु राजनीती की गहमा गहमी उन्हें अपने इस भावना को समझने में देर कर दिया।
जब दोस्तों के हँसी मजाक में सीमा का जिक्र आने लगा तब विनीत को एहसास हुआ की वह सीमा से प्यार करने लगा है। पर दोनों कई महीने तक एक दूसरे को बिना बताये एक दूसरे का ख्याल रखने लगे थे।
दोस्तों के कई बार कहने पर विनीत ने मन बनाया की वह सीमा को अपनी दिल की बात कह दे, लेकिन मन ही मन वह डरता था कि सीमा उसे गलत न समझने लगे और उन दोनों की अच्छी दोस्ती टूट जाये। पर डरते डरते विनीत ने सीमा को चाय की चुस्कियों के साथ कह दिया- सीमा मेरा झुकाव तुम्हारी तरफ बढ़ रहा।
सीमा इस नये तरह के इजहार से बिलकुल अनजान थी। कोई भी प्रेमी प्रेमिका जबतक I love you साफ -साफ, सही शब्दो में ना कहे, तबतक उसपर प्यार का मुहर नही लगता।
सीमा ने मुस्कुराते हुए पूछा था- कब से ?
सीमा की इस मुश्कुराहत से विनीत की हिम्मत बढ़ गयी।
विनीत को इस सवाल का जबाब नही पता था, और " जब से हमलोग एक दूसरे से मिले है" जैसे जबाब नही देना चाहता था। इसलिये उसने अपनी रचनात्मकता का प्रयोग करते हुए थोड़ा फेर बदल किया- जब से हम एक दूसरे को और बेहतर तरीके से जानने लगे है।
सीमा, विनीत के साथ रहते रहते काव्यात्मक भाषा, दार्शनिक शब्द, उलझी- उलझी बातो को समझने लगी थी। इसलिय विनीत की बेचैनी को कम करते हुये, सीधे- सीधे साफ़ शब्दो में कह दिया- I love you too vineet
विनीत, सीमा की आँखों में देखता रह गया था। दोनों उसदिन घण्टो पार्क का चक्कर लगाते रह गये थे। दोनों सर झुकाये एक दूसरे से बाते करते रहे। कभी कभी विनीत के हाथों का उसके हाथों पर स्पर्श अच्छा लग रहा था। उस दिन दोनों ने एक दूसरे को और जाना। धीरे- धीरे समय बीतता गया, दोनों प्यार में और डूबने लगे थे। विनीत अपनी रचनात्मकता का प्रयोग कर सीमा को खुश करने की हर प्रयास करता। दोनों सुखद प्रेम के तीन साल कॉलेज में गुजार दिए थे, अब समय आ गया था, कॉलेज के आखिरी दिन का।
"दोनों उस मोड़ पर खड़े थे, जहाँ रास्ते अलग हो रहे थे, पर मंजिल पर मिलने का वादा दोनों ने एक दूसरे से किया।"
सीमा की नौकरी ,घर के पास के ही सरकारी स्कूल में लग गयी थी, इर विनीत अपने आगे के शोध के लिए दिल्ली चला गया था। दोनों के प्रेम संवाद का एकमात्र माध्यम था- फोन, जिसपर दोनों की निगाह अक्सर टिकी रहती। विनीत जब वापस छुट्टियो में घर लौटता, तो सीमा से, उसके स्कूल पर जाकर मुलाकात कर देता। दोनों कुछ घण्टो के लिये पुराने मीठी यादो में खो जाते, क्योकि अब भविष्य की अनिश्चितता, उनदोनो को डराने लगती।
सीमा के स्कूल के पास गुपचुप वालो का एक ठेला लगता था, जिसकी प्रसिद्धि की चर्चा, सीमा अक्सर विनीत को फ़ोन पर किया करता। विनीत कभी कभी मज़ाक में कह देता, इतना प्यार गुपचुप वाले पर, किसी दिन भाग ना जाना। सीमा गुस्से से फोन काट देती, फिर विनीत के बहुत मिन्नतों और सॉरी कहने के बाद बातें शुरू करती। विनीत भी कॉलेज की कहानियां सुनाता, अपने शोध की बाते बताता, कभी कभी सीमा को परेशान करने के लिये किसी लड़की का भी जिक्र कर देता।
दोनों एक दूसरे से मीलो दूर होते हुए भी विश्वास के डोर से अपने प्रेम को बांधे हुए थे।
पटना कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी लगते ही, पहला कॉल उसने सीमा को किया था, और उसने पहला शब्द यही बोला था- सीमा, मुझसे शादी करोगी।
सीमा इस अचानक प्रस्ताव के लिये तैयार नही थी। परन्तु, विनीत के जिद और अपने दिल को सुनते हुये, उसने हाँ- कह दिया था।
विनीत उसदिन बोलता रह गया था- I love you, I love you , I love you.......
कुछ दिन बाद ,विनीत सीमा को बिना बताये उसके घर आ गया था। सीमा समझ नही पायी की वह कैसे रियेक्ट करे। वह अचानक उठने वाले तूफ़ान की भयावता को समझ रही थी। सीमा के घर वालो को विनीत और सीमा के सम्बन्ध का कोई अनुमान नही था।
सीमा के कोई जान- पहचान का है, इस नजर से पिताजी ने हाल-चाल, पढ़ाई, नौकरी, घर- परिवार की पूछताछ कर रहे थे। अभी तक सब कुछ बढ़िया था। सीमा को स्कूल जाना था, परन्तु वह विनीत के जाने का इन्तजार कर् रही थी, क्योकि वह विनीत को पिता जी के पास अकेला नही छोड़ना चाहती थी। पर उसे जिस बात का डर था, वही हुआ। पिताजी ने पूछ दिया, तब यहाँ कैसे आना हुआ? कोई खास वजह?
विनीत ने थोड़ा सहमते हुये कह दिया, शादी का प्रस्ताव रख दिया था। सीमा चुपचाप दरवाजे की ओट में खड़ी सुन रही थी। उसके कानों में जैसे ही यह बात पड़ी, वह बुत्त बनी खड़ी रही।
सीमा के पिताजी ,अपने आप को संयमित करते हुए, विनीत को बिदा किये। उन्होंने बस इतना ही कहा- सीमा से पूछ कर , उसके घर वाले को सूचित करेंगे।
विनीत के जाते ही, घर में हड़कम्प मच गया। पिता जी बिना खाये हुए अपने काम पर चले गए। इधर माँ दिन भर नये जमाने की पढ़ाई को कोसती रही। सीमा उस दिन स्कूल नही गयी, अपने कमरे में दिनभर रोती रही।
रात को पिता जी घर लौटे। सीमा को बुलाया गया। पिताजी ने बस इतना सा सवाल किया- क्या तुम्हारे तरफ से भी कुछ है ?
सीमा सिर झुकाए,रोती रही। वो न हाँ कह सकी और ना। वह पिताजी के क्रोध से भली - भाँति परिचित थी। वह जानती थी पिता जी अंतर्जातीय विवाह के कितने विरोधी है। उन्होंने पढ़ाई, लिखाई ,खेल- कूद , खाने- पीने, को लेकर हमेशा स्वतंत्रता दी है, पर हमेशा इस बात को भी समझाते रहे की ,जो भी कदम उठाओ उससे हमारे ऊपर समाज की ऊँगली न उठ सके। सीमा परेशान थी की एक तरफ विनीत का प्रेम, दूसरी तरफ पिता जी की अपेक्षाएं। वह बस रोये जा रही थी। बच्चो के आँखों में आँसू, पिता के कठोरता को अक्सर पिघला देते है। उधर पिताजी के आँखों सॅ भी आँसू टपक रहे थे। उनके सामने औलाद की उम्मीद और समाज के नियम सामने थे। बेटी के ब्याह के बाद समाज का सामना तो उन्हें भी करना था। वह पूरी रात सो नही पाये। माँ को भी समझ नही आ रहा था कि वह इस समय क्या करे। सारा घर किसी अनहोनी से आशंकित था।
विनीत, सीमा को फ़ोन किये जा रहा था, और सीमा का फ़ोन स्विचऑफ होने से , और परेशान होने लगा। वह किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत खुद को कोसने लगा। वह भी पूरी रात सो नही पाया।
अगले दिन सीमा के पिताजी सुबह सुबह तैयार होकर निकल पड़े। किसी भी घर वाले को नही पता था, की वह कहाँ जा रहे, और क्यूँ ?
घर वाले परेशान, फिर रोना- धोना शुरू हो गया। शाम को 5 बजे दरवाजे की घण्टी बजी। पिताजी लौटे थे, हाथ में कुछ एक सामान और खूबसूरत सी साडी थी।
विनीत के घरवाले की तरफ से सीमा के लिये सगुन का कपड़ा था। सब आश्चर्यचकित रह गए। सीमा दौड़ कर पिता जी से लिपट गयी।
विनीत से पूछताछ में उन्होंने उसके घर का पता जाना था। आज सुबह सुबह विनीत के घर पर जा पहुँचे। विनीत के पिता जी को सीमा और विनीत के बारे में पता था, इसलिये उन्होंने सीमा के पिता जी को समझाते हुए, रिश्ता पक्का कर दिया था। कुछेक रस्म उसी दिन पूरा हो गया था। शादी का मुहूर्त भी तय कर के , वह वापस लौटे थे। विनीत के घर वाले ने बिना दहेज शादी का प्रस्ताव रखा था।
सीमा और विनीत की बाते फिर शुरू हो गयी थी, अब उनके बातो में बीते हुए प्रेम क्षण के यादो के साथ साथ, भविष्य का भी जिक्र होता। दोनों बेडरूम का कलर, घर की डिजाइन, हनीमून डेस्टिनेशन तय कर रहे होते। धीरे धीरे शादी का समय नजदीक आ गया।
-----------------------------------------------------------
३-
कल रात जब वह विनीत से बात कर रही थी, तब विनीत ने बताया कि उसे कल conferrence के लिये दिल्ली जाना होगा, और दो दिनों में लौटेगा। शादी के एक सप्ताह बाकि थे, और विनीत का दिल्ली जाना, सीमा को बिलकुल अच्छा नही लग रहा था। वह विनीत को मना भी नही कर सकती थी, उसे विनीत के प्रोफेसनल काम में दखल देंना पसन्द नही था।
जब विनीत ने कहा, दो दिन उससे बात नही हो पायेगी, कांफ्रेंस खत्म होते ही ,वह खुद कॉल करेगा। सीमा और परेशान हो गयी, और सीमा जब भी मानसिक रूप से परेशान होती, उसे बुखार हो जाया करता था। इसी वजह से उसे खाना खाने की इक्षा भी नही हो रही थी।
विनीत का कॉल आया वह दिल्ली पहुँच चूका था। अब उसका फोन स्विचऑफ होने वाला था, इसलिय उसने सीमा से घण्टो बाते की। सीमा अब कुछ हल्का महसूस कर रही थी। इधर घर में मेहमान आने शुरू हो गए थे। घर में हलचल शुरू हो गया था। इन बातों से बचकर सीमा जब अकेले होती तो विनीत का ख्याल आता।
इधर विनीत का कॉन्फरेंस खत्म हो चूका था, सीमा को कॉल लगाया, घण्टो दोनों की बातें हुयी। सफर की सारी हिदायते सीमा की तरफ से मिलना शुरू हुआ।
रात 8 बजे, ट्रेन अनन्दविहार स्टेशन से खुलने वाली थी। उसने सारा सामान सही ढंग से रख दिया था । वह सीमा के लिये डिज़ाइनर ड्रेस भी ख़रीदा था, जिसे वह सीमा को सर प्राइज देने वाला था।
सीमा को नींद नही आ रही थी वह घड़ी की सुई की ओर टकटकी लगाए देख रही थी। पूरा घर गहरी नींद में सो रहा था। सीमा ने देखा घड़ी में 12.30 बज रहे थे। सीमा ने विनीत को मैसेज किया- " सो गए"
विनीत- नही, तुम्हे याद कर रहा
सीमा- मैं भी- लव यू
सीमा , विनीत के "लव यू टू" का इन्तजार कर रही थी, पर कोई मैसेज नही आया।
जरूर मोबाइल स्विच ऑफ हो गया होगा, चार्ज भी नही कर सकता, लापरवाह इंसान। सीमा मन ही मन बड़बड़ा रही थी।
सीमा को,विनीत के बारे में सोंचते सोचते कब नींद आ गयी, पता ही नही चला। वह चाय पीने लगी, तभी उसकी नजर बगल में रखे अख़बार पर नजर पड़ी। " भयानक ट्रेन हादसा"- हैडलाइन देखते ही कांप गयी। विनीत को फोन लगाया, अभी तक स्विच ऑफ था। वह पेपर उठा कर पढ़ने लगी। " दिल्ली से पटना आ रही, ट्रेन रात एक बजे कानपुर में पटरी से उतर गई"। 6 ऐसी कोच बुरी तरह से क्षतिग्रशत हो गए थे । सैकड़ो यात्री की मृत्यु हो गयी थी। खून से लथपथ लोगो का चित्र अख़बार, न्यूज़ चैनल में तैरने लगा था।
सीमा बेहोश हो गयी थी। घर में अफरातफरी का माहौल हो गया था। विनीत के पिता जी को फोन लगाया गया, उन्हें भी विनीत की अभी तक कोई सुचना नही मिली थी।
दोनों परिवार के कुछ सदस्य कानपूर निकल गए थे, रास्ते भर रेलवे अधिकारी से जानकारी लेते रहे, परन्तु कोई स्पष्ट सुचना नही मिल रही थी। इधर सीमा की हालत नाजुक होते जा रही थी, वह होश में आते ही फिर बेहोश हो जाती।
कानपूर पहुँच कर, दोनों परिवार रेलवे स्टेशन, पुलिस स्टेशन, अस्पताल के चक्कर लगाये जा रहे थे। विनीत का नाम कही दिख नही रहा था। दोनों घटना स्थल पर एक बार फिर जाने का सोंचे। तब तक भीड़ को चीरते हुए, एक लाश को स्ट्रेचर पर लाया जा रहा था। विनीत के पिता ने , स्ट्रेचर पर से नीचे झूलते हाथ को देखकर विनीत को पहचान लिया था। वह विनीत था, खून से लथपथ, बिलकुल शांत पड़ा।
सब सन्न रह गए। किसी तरह सरकारी प्रक्रिया पूरी कर के , विनीत के मृत शरीर को लेकर घर रवाना हुए। सबको हिदायत दी गयी, की सीमा को इस बात का कतई पता नही चलना चाहिये। वह एक ही साथ दो लाशों को नही देखना चाहते।
इधर सीमा के पास इकठ्ठा होकर, सब उसे तस्सली दे रहे थे। सब फोन से खबर लेने को उत्सुक थे। कोई पक्की खबर नही मिलने पर सब परेशान हुए जा रहे थे।
रात को गाड़ी रुकी, सीमा के पिता जी सीढिया चढ़ते ही फुट फुट कर् रोने लगे। सबके आँखों से अश्रुधारा फुट पड़ी।
सीमा,घर के बिस्तर पर शांत पड़ी थी।वह मुस्कुरा रही थी, उसने एक स्वप्न देखा। हल्के नीले रंग के कोट में विनीत गाड़ी से उतर रहा, ठीक वैसे ही जैसे वह स्कूल में पहली बार मिलने आया था।
वह दौड़ कर दरवाजा खोलती है, विनीत सामने बाँहें फैलाये खड़ा है। दोनों एक दूसरे से लिपटने की कोशिश करते है, तबतक एक काली छाया उसे खीँच ले जा रहा होता है। वह जोर से सीमा को देखकर हँसता है- एक आवाज गूंजता है- "काश ऐसा होता।
सीमा नींद से बाहर आना चाहती है, वह इस दुःस्वप्न से दूर भागना चाहती है। पर वह उठ नही पाती है।
समाप्त।