मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Friday, October 30, 2015

आज पूरी रात जागता रहा,मन बेचैन था , नींद ने आँखों से गुस्ताखी कर रखी थी । तरह तरह के उटपटांग सवालो जबाबो में मन उलझ रहा था । कई  बार सोचा लिखू , कलम को पकड़ा ,छोड़ा। कुछ लिखा फिर पन्नो को फाड़कर डस्टबिन में दाल दिया । उलझने परेशान कर रही थी । उठते विचारो को शब्द देने के अलावा और कोई चारा नही बचा तो लैपटॉप के कीपैड पर उंगलिया घूमने लगा । हिन्दू  मुस्लमान यही दो सब्द है न। काश यह शब्द भर होते। नाम खींचता है एक लकीर , अलग करता है  मुझको तुमको समाज मे. मै अलग पहचाना जाता हु ,तुम अलग पहचाने जाते हो। क्या तुममे मुझमे बुनियादी  फर्क है , हां है तो मेरा रंग अलग है तुमसे, मेरी  शक्ल अलग है तुमसे , मेरी आवाज अलग है तुमसे , मेरे रहने, चलने, बोलने का ढंग अलग है तुमसे। यही फर्क है न। लेकिन जब भीड़ किसी का क़त्ल करती है तो क्या वह इस भिन्नता पर क़त्ल करती है। क्या वह मेरे कपड़ो के रंग को अलग मान कर मुझे या तुम्हे घसीटती है।  नही न , फिर क्या है अलग जो मुझे या तुम्हे मरने पर विवश करती है। चुप्प्प एक घोर सन्नाटा है।  मै  कई  बार सोचता हु शब्दों का होना गुनाह है. किसी का नाम होना गुनाह है. कल्पना करो मेरा नाम अख्लाख़ होता तो क्या मुझसे मिलने वाला मेरा नाम सुनकर यह सोचता की मै हिन्दू हो सकता हु , कल्पना करो अगर तुम्हारा नाम गौरव होता तो क्या तुम मारे जाते । नाम नाम नाम , उफ्फ्फ्फ्फ़ कमबख्त शब्द भी अलग अलग धर्म के हो जाते है। कल्पना करो एक परिवार में पिता हिन्दू ,माँ मुस्लिम , भाई सिख , बहन ईसाई , बेटा जैन ,पत्नी बौद्ध , फिर क्या उस परिवार का कोई सदस्य किसी हिन्दू के भड़काऊ भासण पर माँ की हत्या करने जायेगा , क्या कोई मौलवी के कहने पर पिता का सर कलम करने जाएगा। तुम कहते हो यह सब आदर्श वादी बाते है , तो मई बस इतना कहता हु तुम्हारी यथार्थवादी दमघोटू विचार से कहि बेहतर है। कम से कम पागलो की जमात तो नही पैदा होगी जिसे बस लाल खून की प्यास होगी।
चलो एक रात भूल जाओ की तुम हिन्दू हो या मुस्लमान ,चलो भूल जाओ की ऐसे कोई सब्द होते भी है समाज में।  नींद , इन सब को भूलने का जरिया है जहाँ  हमे याद नही रहता की हम हिन्दू है मुस्लमान। भूल जाते है की कल जान लेने किस का दरवाजा खट  खटाना है। शायद कल हमे इन बातो पर गौर करना पड़ेगा ज़िस दिन हमने अपने आप को ऐसी व्यवस्था में ढाल लिया तो शायद बेखौफ नींद आने लगेगी। इसी कल्पना में आज अपने बेचैन मन को शांत करने की कोशिश कर रहा। 

No comments:

Post a Comment

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

mai kaun hu?

mai kaun hu?
Gaurow gupta