मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, October 1, 2015

वो मांस का टुकड़ा ही था।

देश विकलांगता के दौर से गुजर रहा। जहाँ हम और आप अंधेपन, और गुँगेपन के बीमारी से ग्रसित होते चले जा रहे। अंधे होकर ही भीड़ का हिस्सा बनते है, क़त्ल करते है, हिंसक होते है, और फिर अंधे होकर घटना से अनजान होते है। हिंसा से पहले मूक रहते है, हिंसा के बाद भी गूंगा रहना ही पसंद करते है। श्री मान डर लगता है, की कब हम और आप इस भीड़ का शिकार हो| कब हम और आप कुचले जाये उस भीड़ से, ईंटो से अपने सर को कुचलते हुए पाये, गर्दन से खून का फवारा जमींन पर फ़ैल रहा हो, और रक्त पान कर रहा हो हजारो की संख्या में आया कोई दरिंदा। मेरी आँखे पड़ी हो दूर ,देख रहा हो हाथो को कटते हुए,लादो को फटते हुए। डरिये,डरना चाहिए। कब तक लाउडस्पीकर की  आवाज और व्हाट्सऐप पर खड़ी होती रहेगी भीड़【】कब तक दिए जाते रहेंगे मंदिरो और मस्जिदों से आदेश?सवाल खुद से पूछे एक बार।
कब तक धर्म बनाता रहेगा हमे अँधा। एक मांस के टुकड़े के लिए हम जीवित शरीर को मांस का टुकड़ा बना देते है। हाय रे विडंबना, हम कल भी मौन थे और आज भी मौन हो जाते है, और उसी मौन से साबित कर देते है, everything is fine| कोई मौत नही हुई, किसी ने नही मांगी थी अपने जान की भीख, कोई नही गिड़गिड़ाया था,किसी ने हाथ नही जोड़ा था अपने इज़्ज़त को बचाने को, कोई नही लड़खड़ाया था, कोई घसीटा नही गया था, किसी ने नही तोडा था दम,सड़क पर।
सब अफवाह है,सब झूठ है। बस सच इतना है, की वो मांस का टुकड़ा ही था।

~गौरव

No comments:

Post a Comment

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

mai kaun hu?

mai kaun hu?
Gaurow gupta