जब इस चित्र को द्रष्टा भाव से देखता हु तो बस दीखता है सौंदर्य। जिंदगी की रस्सी पर संतुलन बनाये हुए हम और आप। लाठी के दो किनारो पर खुशिया और गम दोनों टीके है,जो खुबसुरत जिंदगी को संतुलित कर रही।पर जब टूटती है तन्द्रा तो क्षण भर में पाता हु की कुछ गमगीन गाने कानो में सुनाई दे रहे,और सौंदर्य से रोमांचित चेहरे पर दुःख का एहसास होता है,जब देखता हु मासूमियत,जरुरत,और मज़बूरी इस बच्ची के चेहरे पर। निचे भाई करतब दिखता है,माँ हौसला बुलंद करती है, कही दूर खड़ा बाप पैसे का इंतजार कर रहा।बगल से तेजी से सरसराती कार गुजरती है।अंदर बैठे प्रेमी जोड़े को कुछ नयी चीज दिखती है । आज जब वो एक दूसरे के आगोश में बैठेंगे,प्रेम के धुन में डूबेंगे और प्रेमिका पूछेगी,जान कितने प्यारे बच्चे करतब दिखा रहे थे।प्रेमी इन सब बातो को अनदेखा कर प्रेमिका के बालो से खेलता हुआ शाम होने का इंतजार कर रहा होगा,क्योकि प्रेमिका को उसके हॉस्टल छोड़ घर भी जाना होगा। खैर आप जब संवेदनशील होते है तो अक्सर द्वन्द में होते है।और जब मुझ जैसा राजनीती शास्त्र का छात्र जो साहित्य दर्शन में रूचि रखता है,तो आप द्वन्द,और उलझन की परिकल्पना भी नही कर सकते।

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