डाल डाल, दाल दाल
अरहर, मुंग मसूर दाल
राजनीती में झोल झाल
जनता सारी हाल बेहाल
दिल्ली दिल्ली दाल दाल
महंगाई की मकड़ जाल
नेता पकड़े नब्ज नाल
मरती जनता बदहाल
डाल डाल दाल दाल
किसान मरते सालो साल
कोई नही है देख पाल
सब पूछते एक सवाल
कब आएंगे अच्छे काल
डाल डाल दाल दाल
कम दाल तो पानी डाल
जेसे तैसे पेट पाल
कोई चारा नही अब पांच साल
बस चिल्लाओ अब भइया
दाल दाल दाल दाल
अरहर मोठ मसूर दाल
~गौरव
मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......
पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....
Wednesday, October 28, 2015
कविता: महंगाई में दाल
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खूंटे पर टंगा हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...
mai kaun hu?
Gaurow gupta
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