सर्द की धुप, मीठी चाय और तुम, तीनो अगर एक साथ होते है तो ऐसा लगता है समय को जिंदगी की कैमरे में कैद कर लु । शायद कैद भी करना ठीक नही होगा , हा उस क्षण को पूरी तरह जीना जरूर चाहता हु । इस बार भी सर्द आ रहा है , और तुम्हे पता है, मुझे चाय कितना पसंद है, सीसे के कप में जब मीठी गरम चाय हलक से उतरती है तो कलेजे को ठंडक मिलती है,। अब देखो तुम भी कहोगी कलेजे के ठंडक और गरम चाय की चुस्की का क्या सम्बन्ध है । हां बेमेल है, और मुझमे सायद यही बात तुम्हे अच्छी भी लगती है, और ताने मारना भी नही भूलती , की बाते बनाना कोई तुमसे सीखे । हां सही भी है ,वरना मुझमे चाहने वाला है भी क्या ? सीधा साधा , माध्यम घर का लड़का , जो हर वक़्त अपने सपनो को साथ लिए चलता है। यही तो है, जो हर वक़्त साथ निभाती है, गहरी नींद भी साथ होने का एहसास होता है ।
समय को नापा तो देखा हम दोनों दो किनारो पर खड़े है, बीच में शांत , सुन्दर नदी बह रही है, जिसे तुम चुपचाप देख रही और मै अपलक निहार रहा । शायद मौन संवाद घट रहा ।
आज मै कैंटीन के उसी चार नंबर वाले टेबल पर बैठा हु , हलकी सर्द भी है , धुप भी बादलो से छन के आ रहे, चाय के कप को भी दोनों हथेलिओं के बीच में पकड़ रखा है, हर २ सेकंड पर चाय की चुस्की से आत्म तृप्ति कर रहा , बस कमी है तो मुझे इस हालत में देख कर हसने वाली की, जो अक्सर खिल खिला कर कहती थी, गँवार । और मै चाय की चुस्कीओ में फिर अपने आप को व्यस्त कर लेता था। कितना अच्छा होता है न, बीते कल को याद करना , हर पन्ने को उलटना , मुस्कुराना, फिर डूब जाना । समय की खूबसूरती भी यही है , वह रूकती नही है, ठहरती नही है, हर पल गुजरती है , ताकि आप बोर न हो समय से। जब दिल चाहे ,पुराने पन्ने पलटे , और एक उदासी भरी चेहरों पर मुस्कराहट की हल्की रेखा खींच डालें ।
आज तुम नही हो तो उसी टेबल पर बैठा बैठा ३ कप चाय भी पी गया , तुम होती तो डोसा जरूर मंगा ळेटा। हां कैंटीन में इसके अलावा पसंद भी क्या था तुम्हे, और मुझे पसंद आता था , साथ मिलने वाला बादाम की चटनी ।आज सोचा चटनी ही माँगा लू , पर मन नही हुआ क्योकि तुम भी तो नही थी जिसे देखकर बादाम की चटनी खाना और भी अच्छा लगता था । भीड़ बढ़ने लगी है, बच्चे हुड़दंग करके कैंटीन में मेरी तरह चाय की चुस्की लेने आ रहे । तुम्हे तो पता है मुझे भीड़ से उतनी ही नफरत है जितना तुम्हे मेरे इस गंवारपन से प्यार । सर्द की धुप , चाय की चुस्की और तुम्हारी याद को अपने डायरी में समेटे इस चार नंबर की कैंटीन की टेबल को छोर जा रहा । आगे की कहानी वही लिखूंगा जहाँ तुम और मै अक्सर चुपचाप बाते किया करते थे, निशब्द हो कर, बिलकुल मौन।
समय को नापा तो देखा हम दोनों दो किनारो पर खड़े है, बीच में शांत , सुन्दर नदी बह रही है, जिसे तुम चुपचाप देख रही और मै अपलक निहार रहा । शायद मौन संवाद घट रहा ।
आज मै कैंटीन के उसी चार नंबर वाले टेबल पर बैठा हु , हलकी सर्द भी है , धुप भी बादलो से छन के आ रहे, चाय के कप को भी दोनों हथेलिओं के बीच में पकड़ रखा है, हर २ सेकंड पर चाय की चुस्की से आत्म तृप्ति कर रहा , बस कमी है तो मुझे इस हालत में देख कर हसने वाली की, जो अक्सर खिल खिला कर कहती थी, गँवार । और मै चाय की चुस्कीओ में फिर अपने आप को व्यस्त कर लेता था। कितना अच्छा होता है न, बीते कल को याद करना , हर पन्ने को उलटना , मुस्कुराना, फिर डूब जाना । समय की खूबसूरती भी यही है , वह रूकती नही है, ठहरती नही है, हर पल गुजरती है , ताकि आप बोर न हो समय से। जब दिल चाहे ,पुराने पन्ने पलटे , और एक उदासी भरी चेहरों पर मुस्कराहट की हल्की रेखा खींच डालें ।
आज तुम नही हो तो उसी टेबल पर बैठा बैठा ३ कप चाय भी पी गया , तुम होती तो डोसा जरूर मंगा ळेटा। हां कैंटीन में इसके अलावा पसंद भी क्या था तुम्हे, और मुझे पसंद आता था , साथ मिलने वाला बादाम की चटनी ।आज सोचा चटनी ही माँगा लू , पर मन नही हुआ क्योकि तुम भी तो नही थी जिसे देखकर बादाम की चटनी खाना और भी अच्छा लगता था । भीड़ बढ़ने लगी है, बच्चे हुड़दंग करके कैंटीन में मेरी तरह चाय की चुस्की लेने आ रहे । तुम्हे तो पता है मुझे भीड़ से उतनी ही नफरत है जितना तुम्हे मेरे इस गंवारपन से प्यार । सर्द की धुप , चाय की चुस्की और तुम्हारी याद को अपने डायरी में समेटे इस चार नंबर की कैंटीन की टेबल को छोर जा रहा । आगे की कहानी वही लिखूंगा जहाँ तुम और मै अक्सर चुपचाप बाते किया करते थे, निशब्द हो कर, बिलकुल मौन।


ossum bro....
ReplyDeleteyaade achchi hai.....