कविता:हां वो डरते है।
हाँ वो डरते है।
सच और इन्साफ से डरते है
हमारे सोच और संवाद से डरते है
हाँ वो डरते है।
सच और इन्साफ से डरते है
हमारे सोच और संवाद से डरते है
हाँ वो डरते है।
जब बेबस हाथो में अंगारा
होता है
जब एक गरीब भूखे पेट सोता है
चीखता है ,चिल्लाता है
खुद को उनके सामने जब बेबस पाता है,
तब हर एक आवाज उठता है
उनके आलीसान महलो के सामने,
जब एक हुजूम रुकता है
तब,वो डरते है।
जब एक गरीब भूखे पेट सोता है
चीखता है ,चिल्लाता है
खुद को उनके सामने जब बेबस पाता है,
तब हर एक आवाज उठता है
उनके आलीसान महलो के सामने,
जब एक हुजूम रुकता है
तब,वो डरते है।
हाँ वो डरते है।
अपने सपनो में पीसते गरीब की पुकार से डरते है
अपने इन्साफ की मांग करते एक गरीब की हुंकार से डरते है।।
हां वो डरते है।।
अंधे न्याय के सामने गरीब जब चुप हो जाता है,
अपनी हक़ को मांगने पर जिन्दा जलाया जाता है,
तो दूर गांव में उठे तूफ़ान से डरते है,
तख़्त को झकझोरता हर एक गरीब,बूढ़े बच्चे जवान से डरते है,
हाँ। वो डरते है।।

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