प्रेम चयन करने की चीज नहीं है।प्रेम सास्वत और स्वाभाविक है।प्रेम चर्चा का विषय नही है। यह एक स्वानुभूति है। एक जीवन का रस है, जो मीठा है। प्रेम में संवेदनशीलता है। रोम रोम कम्पित करने वाली अनुभूति है जो सर्द में एहसास हुए उस मीठे दोपहरी के धुप की तरह है, जब कई दिनों के बाद निकले धुप की चासनी में आप नंगे बदन को डुबो रहे होते है। यह वैसा ही है जब आप आँख बन्द किये नील आसमान में उड़ रहे होते है ,और धरती की और आँख खोल देखना तक नही चाहते क्योकि वास्विकता के दीवार पर होने वाले चोट से हम और आप डरते है।
(लिखे जा रहे उपन्यास की आंशिक झलकी)
(लिखे जा रहे उपन्यास की आंशिक झलकी)
गौरव

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