मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Tuesday, September 8, 2015

कविता -नया और पुराना
कुछ गीत पुराने है,
कुछ लफ्ज पुराने है,
कुछ यादे पुरानी है,
कुछ नग्मे पुराने है,
फिर भी नया सा लगता है,
हर सुबह की सूरज,
रात की मिठी चाँदनी,
हवा का गुनगुनाना,
पेड़ो का सरसराना,
तुमसे मुलकात पुरानी है,
पर मिलन नया है,
झाकता हु जब भी कल की यादो मे,
वक्त का समुन्द्र सिमट सा जाता है,
किस्से पुराने होते है,
पर दिलो से लिपट सा जाता है,
उसी पुराने मोड़ पर अक्सर आता हु,
क्योकी नये की चाहत मे,
वही पुराना अक्सर नया सा लगता है.


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