मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Wednesday, May 17, 2017

इक दिन मैं मर गया

बिना सब कुछ कहे
इक दिन मैं मर गया
पर बुरा तब हुआ जब,
अपने ही लाश के सामने ठहर गया
मेरी माशूक मेरे सीने से लग रोती रही
जो था सुबह,ढल कर वो शाम होती रही
मैं चाह कर भी उससे लिपट न सका
बहुत कुछ था कहना, पर कुछ कह न सका
दोस्त मुझसे विदा होने लगे
रिश्ते- नाते सब चुटकियों में खोने लगे
मेरी कविताओं को किसी ने फाड़ फेका था
मेरे काले चमड़ीयों को उखाड़ फेंका था
मेरे सिर को जब आग में फोड़ा गया
मेरे हड्डियो को तर बतर तोडा गया
मैं अधूरी कविताओं पर आँसू बहा रहा था
अब भी उनका काफ़िया मिला रहा था
देखा हाथ तो मेरा जल चूका है
कलम ये उँगलियाँ पकड़ ना पाएँगी
ये पन्ने अभागे है,नज्मअब कैसे पूरी हो पाएँगी?
कंठ सुख रहा था, डर कर काँपने लगा
मीलों दौड़ा उस रोज, थक कर हांफने लगा

सोचा माँ की आवाज सुन अब मैं जग जाऊंगा
उससे लिपट कर रोऊंगा,सारा किस्सा सुनाऊंगा
उस रोज आखिरी दफा मुस्कराया था
खुद को खूब बहलाया था

काश ये रात का इक सपना ही हो
दू झटका इस जिस्म को,
फिर सब कुछ अपना ही हो
पर हकीकत तो यही था,और मैं सिहर गया
बिना सब कुछ कहे, इक दिन मैं मर गया।



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कविता -एक पगली लड़की का प्रेम

हर रात उतर चाँद जब,
आँगन रौशन कर जाता है,
हर भोर हया की लाली से,
ख़्वाब सिंदूरी भर जाता है।
आता है कोई चुपके- चुपके
जुगनुओं से छुप- छुप के
बैठ सिरहाने मेरे ,वो हौले से
होठों पर तपते होठ रख जाता है
कितनी शिकायतें की है मैंने
आओ तो रुक भी जाओ
जाने की जल्दी क्यूँ होती है
जब हो रातें छोटी तो
ये आँखे कितनी रोती है..
वो हँस कर मुझसे लिपट जाता है
मिरे भींगे बालों को
हौले से सुलझाता है
मैं नाख़ून से पीठ पर उसके
अपने प्रेम पत्र लिख जाती हूँ
ना बोले फिर भी जब कुछ वो
मैं थोड़ी सी चिढ जाती हूँ...
पलट कर मुँह मैं, बिस्तर पर
इस ओर से उस ओर होती हूँ
होता ना स्पर्श जब उसका
पूरी रात रात मैं रोती हूँ...
कहते है लोग, मैं पगली लड़की हूँ
रेत किनारे जो घर बनाया था
हर कोना खारे पानी से भर गया
मेरा आशिक सदियो पहले
आंसुओं संग पिघल के मर गया
पर हाँ मैं तो पगली लड़की हूँ ना,
मेरे ख्वाब भी मुझसे नासमझ है
हो न हो तुम्हे, पर मुझको खबर है
हसरतों में जिंदा होकर मेरे वो
हर रात दबे पाँव आता है,
रात उतर चाँद जब
आँगन रोशन कर जाता है
डेहरी का दीया बुझा कर
आँखों में मिरे वो,
इक ख्वाब सिंदूरी भर जाता है।



मेरी प्रेमिका

 मेरी प्रेमिका
 मेरी एक मात्र हमसफ़र है
मेरे जीवन की।
मैं चलते - चलते थाम लेता हूँ
उँगलियाँ उसकी
जैसे किसी अनजान सफर पर
थाम लेता था, माँ की ऊँगली
खो जाने के डर से...
पिता के मृत्यु के बाद
मेरी गलतियों को सुधारने
का जिम्मा उसने ले लिया
कभी गुस्सा होकर
तो कभी प्रेम से
मुझे एहसास दिलाती है कि
मुझे सफर जारी रखना है
मेरे घर के हर कोने में
दर्ज है उसकी उपस्थिति
माँ की पुरानी आलमारी से
लेकर पिता के काठ की कुर्सी तक
उसके स्पर्श को पहचानते है
नल की टपटप
बर्तन की खन खन
पर्दे के हटते ही ,झांकती सुबह की धुप
सब उसका ही गुणगान करते है।
मेरे बगीचे के फूल भी खिलने से
मना कर देते है
जिस दिन वह उदास
कमरे में ख़ामोशी से आँसू बहाती है
उसकी खिलखिलाहट सुन
गिलहरी की दौड़ शुरू हो जाती है।
वह मेरे जीवन के
हर रिक्त स्थान को
अपने मौजूदगी से भर देती है
बिना एहसास दिलाये की
वो ऐसा कर रही है...#gaurowgupta




नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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