मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Saturday, October 28, 2017

बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन-


बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है
सीधी नीली रेखा नहीं भींगी आँसुओ से
ना काली स्याही ने रंग छोड़ा पन्नो पर
खिड़की पर नही आयी कोई गौरैया
ना ही बारिश के झोंके से परेशान
मैंने बन्द किया खिड़कियों को..
हड्डियों में चुभती बर्फीली हवा
मेज पर रखे किताबों को बेवजह पलट रही है
मुझे इसमें कोई रस नही
ना ही खीज है, ना ही गुदगुदाहट..
जैसे मेरा यह समय
किसी अंधे की आंखों की पुतलियां हो..
देखता हूँ तस्वीर , दराज से निकालकर
रख देता हूँ, स्मृतियों में बिना यात्रा किये
ये दिल ना जाने, कौन से ज़िद पे अड़ा है
बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है..

मैं चाहता हूँ

कोई ठहर गया है इन आँखों मे ऐसे
जैसे ठहरा गया हो ओंस हरे दुभ पर,
जैसे ठहर गया हो शब्द, कलम की नोख पर
और जैसे सदियों इंतेजार के बाद आकर कोई,
ठिठक गया हो दरवाजे के उस जानिब..
मैं चाहता हूँ ..हवा के बहते ही
ओंस गिर पड़े मिट्टी पर
स्याही बह जाये पन्नो पर
शब्दों के साथ या शब्दों के बिना..
और ,जो आकर ठिठक गया है वो लौटें नही..
दरवाजे के खुलते ही,
लिपट जाये इस जिस्म से
और घुल जाये मन में..
मैं चाहता हूँ, जो ठहर गया है इन आँखों मे
हवा के बहते ही , भभक कर गिर जाये गालों पर
ठीक वैसे ही जैसे घाव में एक चीरा लगते ही
फर्श लाल हो गया हो
और घण्टों बाद आंख खुलने पर
दर्द कुछ कम महसूस होता हो...

Tuesday, August 8, 2017

कविता - काका दुःखी है..

 
काका दुःखी है
उनका गाँव शहर हो रहा
बिजली की तारे जब से दौड़ी है आसमान में
लालटेन किसी कमरे में दुबका पड़ा है
रोज शाम को उठते है काका
पेंदी में तेल भरने को
फिर निराश बैठ जाते है अहाते में
भक्क से जलता बल्ब 
कहते है, उनकी आँखें चुभती है
सड़क अब भींगता है
पर बिना खुश्बू के
तारकोल की सड़कें 
जलाते है पैर उनके
चप्पलें बांधती है सांसे उनकी
भागे भागे फिरते है

ठंड में नही जलता घूरा
नही लगता कोई बैठक
सन्नाटा पसरा दुआर पर
काका बीनते है पनिआई आंखों से 
कुछ किस्से जब गाँव सिर्फ गाँव था
दुआर का कुआँ सुना पड़ा है
बाल्टी दूर उल्टी पड़ी है
अब नही लगता औरतों का झुण्ड
नही होती हंसी ठिठोली खींचा तानी
सभ्य हो गये है सब 
और गम्भीर भी
बच्चे नही खेलते आस पास
महँगे खेल कमरे तक रखता है उनको
रिश्तों में लक्ष्मण रेखाएँ खींच आयी है
सब अपने अपने घेरे में सुरक्षित है


रेलगाड़ी से चलकर
आ रहे नये नये
रहन - सहन
नयी - नयी 
बोली - भाषा
काका, उन्हें नही पहचानते
वो काका को नही पहचानते
दोनों चुप्प है और पसरा है सन्नाटा

कल आये थे कुछ शहरी
भूखे आंखों से देख रहे थे खेत को
कहते है धुँआ फेंकता चिमनी लगेगा
आसपास पक्के मकान बनेंगे
पगडंडियों को ईंट से छुपा दिया जायेगा
बड़ी गाड़ियां सरपट दौड़ेंगी
हस्पताल , इस्कूल सब खुलेगा
तस्वीर बदल जाएगी गाँव की

काका दुःखी है
उनका गाँव अब उनका नही रहेगा
गाँव ,शहर हो जायेगा
शहर शहरी लोगों का होगा
काका अकेले रह जाएंगे गाँव मे

यू ही टटोलते समय को
विदा हो लेने के इंतजार में
                                      
                                                

Saturday, August 5, 2017

तुम्हारी यादें

तुम्हारी यादें हरी घास सी है
जो मेरे मन के जमीन पर
बेमौसम उग आया करती है...
तुम्हारी यादें गौरैये का झुंड है
जो हर ढलते शाम में
मेरे नींद के घोंसले में आ आ जाया करती है
तुम्हारी यादें सीधी जाती सड़क पर
उल्टी यात्राएँ है
जो बेवजह है , पर खूबसूरत है
तुम्हारी यादें एक घाटी है
जो दो पहाड़ो को जोड़ती है
जैसे मैं और तुम..
तुम्हारी यादें
हिमाचल के पर्वतो पर उड़ते बादल है
जो बरस जाते है मेरी आँखों से अचानक
तुम्हारी यादें
सेमर की रुई है
जिसे मैं अपने खुले हथेलियों पर रख छोड़ता हूँ
बेपरवाह उड़ने को
तुम्हारी यादें गर्म चाय सी है
जो मेरे मन के प्याले में भरा रहता है हमेशा
तुम्हारी यादें
धूप सी छलांग है
जो तय करती है पलक झपकते मीलो दूरियाँ
तुम्हारी यादें
एक खूबसूरत सफर है
जिसे मंजिल तक पहुंचने की जल्दी नही..


Thursday, July 6, 2017

वक़्त: kavita

कुछ चीजें वक़्त के साथ
खूबसूरत दिखती है
जैसे इस कमरे का सन्नाटा,
सिगरेट की पहली कश
और,तुम्हारी लिखी डायरी
डायरी के चौथे पेज पर
तुम्हारे गिरे आँसु से अक्षर का फ़ैल जाना...
खुरदुरी उँगलियो से
उस बिखरे अक्षर को
महसूस करता हूँ..
एक चेहरा गुजरता है
बंद आँखों के सामने
वही सुर्ख लाल होठ
जिसे मैं पहली दफा चुम कर शरमा गया था..
कोने में पड़ी, काठ की कुर्सी,
टेबल लैंप की पीली लाइट
ये सीलन भरी दिवार...
जिस पर टँगा है खाली फोटो फ्रेम
जिसकी कील हमने मिल कर ठोके थे
आलमारी में धूल फांकती किताबे..
टैगोर का वह गीत,
तुम अक्सर गुनगुनाया करती थी

ओ माँ,
फागुने तोर अमेर बोने
घ्राने पागल कोरे,
मोरी हए, हए रे...
इसे सुनने के लिये रेडियो का मीटर
घण्टो घुमाया करता हूँ..
सोच रहा , इसे गुनगुनाते हुये
दो कप चाय बना लूँ
जानता हूँ,
दूसरा कप भरा रहेगा पूरी रात तक
पर कुछ चीजें खूबसूरत जो दिखती है।
यादों की ढेर से हर कोना भरा हुआ है..
तुम्हारे हथेलियों के निशान
दर्ज है, बिस्तर की सिलवटों में
ऐशट्रे से गिरकर फर्श पर बिखरी राख
तुम्हारे साथ गुजारे हर उस रात की याद है
मैं डरता हूँ..
लंबे समय से बिखरे,
इस कमरे को ठीक करने से
ये मुझे एहसास दिलाती है
तुम्हारी कमी और मैं अस्तव्यस्त हूँ
ठीक इस कमरे की तरह...

#somewriting



“No matter how much suffering you went through, you never wanted to let go of those memories.” 

Wednesday, May 17, 2017

इक दिन मैं मर गया

बिना सब कुछ कहे
इक दिन मैं मर गया
पर बुरा तब हुआ जब,
अपने ही लाश के सामने ठहर गया
मेरी माशूक मेरे सीने से लग रोती रही
जो था सुबह,ढल कर वो शाम होती रही
मैं चाह कर भी उससे लिपट न सका
बहुत कुछ था कहना, पर कुछ कह न सका
दोस्त मुझसे विदा होने लगे
रिश्ते- नाते सब चुटकियों में खोने लगे
मेरी कविताओं को किसी ने फाड़ फेका था
मेरे काले चमड़ीयों को उखाड़ फेंका था
मेरे सिर को जब आग में फोड़ा गया
मेरे हड्डियो को तर बतर तोडा गया
मैं अधूरी कविताओं पर आँसू बहा रहा था
अब भी उनका काफ़िया मिला रहा था
देखा हाथ तो मेरा जल चूका है
कलम ये उँगलियाँ पकड़ ना पाएँगी
ये पन्ने अभागे है,नज्मअब कैसे पूरी हो पाएँगी?
कंठ सुख रहा था, डर कर काँपने लगा
मीलों दौड़ा उस रोज, थक कर हांफने लगा

सोचा माँ की आवाज सुन अब मैं जग जाऊंगा
उससे लिपट कर रोऊंगा,सारा किस्सा सुनाऊंगा
उस रोज आखिरी दफा मुस्कराया था
खुद को खूब बहलाया था

काश ये रात का इक सपना ही हो
दू झटका इस जिस्म को,
फिर सब कुछ अपना ही हो
पर हकीकत तो यही था,और मैं सिहर गया
बिना सब कुछ कहे, इक दिन मैं मर गया।



GOOGLE


कविता -एक पगली लड़की का प्रेम

हर रात उतर चाँद जब,
आँगन रौशन कर जाता है,
हर भोर हया की लाली से,
ख़्वाब सिंदूरी भर जाता है।
आता है कोई चुपके- चुपके
जुगनुओं से छुप- छुप के
बैठ सिरहाने मेरे ,वो हौले से
होठों पर तपते होठ रख जाता है
कितनी शिकायतें की है मैंने
आओ तो रुक भी जाओ
जाने की जल्दी क्यूँ होती है
जब हो रातें छोटी तो
ये आँखे कितनी रोती है..
वो हँस कर मुझसे लिपट जाता है
मिरे भींगे बालों को
हौले से सुलझाता है
मैं नाख़ून से पीठ पर उसके
अपने प्रेम पत्र लिख जाती हूँ
ना बोले फिर भी जब कुछ वो
मैं थोड़ी सी चिढ जाती हूँ...
पलट कर मुँह मैं, बिस्तर पर
इस ओर से उस ओर होती हूँ
होता ना स्पर्श जब उसका
पूरी रात रात मैं रोती हूँ...
कहते है लोग, मैं पगली लड़की हूँ
रेत किनारे जो घर बनाया था
हर कोना खारे पानी से भर गया
मेरा आशिक सदियो पहले
आंसुओं संग पिघल के मर गया
पर हाँ मैं तो पगली लड़की हूँ ना,
मेरे ख्वाब भी मुझसे नासमझ है
हो न हो तुम्हे, पर मुझको खबर है
हसरतों में जिंदा होकर मेरे वो
हर रात दबे पाँव आता है,
रात उतर चाँद जब
आँगन रोशन कर जाता है
डेहरी का दीया बुझा कर
आँखों में मिरे वो,
इक ख्वाब सिंदूरी भर जाता है।



मेरी प्रेमिका

 मेरी प्रेमिका
 मेरी एक मात्र हमसफ़र है
मेरे जीवन की।
मैं चलते - चलते थाम लेता हूँ
उँगलियाँ उसकी
जैसे किसी अनजान सफर पर
थाम लेता था, माँ की ऊँगली
खो जाने के डर से...
पिता के मृत्यु के बाद
मेरी गलतियों को सुधारने
का जिम्मा उसने ले लिया
कभी गुस्सा होकर
तो कभी प्रेम से
मुझे एहसास दिलाती है कि
मुझे सफर जारी रखना है
मेरे घर के हर कोने में
दर्ज है उसकी उपस्थिति
माँ की पुरानी आलमारी से
लेकर पिता के काठ की कुर्सी तक
उसके स्पर्श को पहचानते है
नल की टपटप
बर्तन की खन खन
पर्दे के हटते ही ,झांकती सुबह की धुप
सब उसका ही गुणगान करते है।
मेरे बगीचे के फूल भी खिलने से
मना कर देते है
जिस दिन वह उदास
कमरे में ख़ामोशी से आँसू बहाती है
उसकी खिलखिलाहट सुन
गिलहरी की दौड़ शुरू हो जाती है।
वह मेरे जीवन के
हर रिक्त स्थान को
अपने मौजूदगी से भर देती है
बिना एहसास दिलाये की
वो ऐसा कर रही है...#gaurowgupta




Monday, April 24, 2017

कविता - कैसे लिखूं मैं प्रेम गीत? (Gaurow gupta)

कैसे लिखूं मैं प्रेम गीत?
.................................
इस गर्मी की तपती धरती पर
बैठे नँगे बदन
जब अन्नदाता ही मांगे रोटी 
तो बोलो ,प्रिये
कैसे लिखू मैं बसन्त के प्रेम गीत।
लिखता रहा जो प्रेम पत्र
इस सर्द, अलाव के काम आये,
सड़कों पर सोये अध् नँगे लोगो के।
जिन शब्दो ने कल तक मुझे जिन्दा रखा था
जलकर उसकी तपिश ने
जिंदा रखा उन्हें,
जिनकी गूंगी आवाज
लँगड़ी सड़कों से होकर,
बहरी संसद तक कभी नही पहुँची।
इस बारिश में बहती झोपड़ियाँ
जिसमें बह गये गाढ़े सपने
सड़क पर तंबू ताने जब वो
बना रहे है उम्मीद के चूल्हे पर
सरकारी सान्त्वना की भात
तो बोलो, प्रिये
कैसे लिखूं मैं बसंत के प्रेम गीत।
जंगलों में ,बड़े मशीनों के धुँआ को
काले हाथो से छाठते
ढूंढ रहे है अपने घरों को
और पाते है
एक रिक्त स्थान,
जहाँ हुआ करती थी
उनकी अपनी भाषा, संस्कृति और समाज
अधमरे से लेट गये है, जो इस धरती पर
गुजरता हूँ बीनने कुछ प्रेम फूल इन जंगलों में
तलवे पर चिपकते उनके लाल रक्त
जकड़ ले रहे है, मेरे आत्मा को
घिर जा रहा अवसाद से
तो बोलो प्रिय
इस उदास मौसम में
कैसे लिखू मैं बसन्त के प्रेम गीत।

✍ गौरव

Thursday, April 13, 2017

Ayman jamal (हिंदी, उर्दू को संजीदगी से सजाने वाली कवियत्री) पढ़िए कुछ रचनाये

Ayman jamal हिंदी, उर्दू को संजीदगी से सजाने वाली कवियत्री है। इनकी रचनाये आपको your quote mobile पर आसानी से मिल जायेगा। ayman ,अपने लिखने की रूचि को आधुनिक संसाधनों के माध्यम से मूर्त रूप देती है।किसी भी रचनाकार का परिचय उसके रचना से बेहतर कुछ और नही होता। अपने बेहतरीन शब्दो से पन्नो को रंगने वाली ayman की रचना पढ़िये।


"अब तो दिल के कई टुकड़ो ने दिल लगाया है,
किस किस हिस्से को क्या क्या समझाये"

- ayman jamal




















"इस कदर जान लिया तुमको
के अब अजनबी हो गये हम"

- ayman jamal




हर विषय को शब्दों में ढालने की कोशिश करती ayman की कुछ अन्य   रचनाये पढ़िए।












दिल्ली में आयोजित open mic session में अपनी रचना " आईना" को अपना आवाज देकर श्रोताओं का मन मोह लिया। सुनिये youtube link के जरिये ayman की रचना " आईना"

















एक कवियत्री के साथ साथ, ayman एक नई कोशिश G.E.N.D.E.R network से जुडी है। यह स्त्री और प्रकृति दोनों के बीच रिश्तों को बखूबी से बयाँ करता है। आइये इस वीडियो के माध्यम से जानते है, क्या है G.E.N.D.E.R network  उन्ही के शब्दों में..


लप्रेक - केंद्र और परिधि

लप्रेक
-----------
केंद्र, तुम इतना उदास क्यूँ रहने लगे हो?
मैं, मैं उदास कहाँ रहता हूँ, परिधि। तुम कुछ भी कहती हो।
ओह्ह तो, केंद्र ..तुमहे लगता है, इस मुस्कराहट के साथ सच छुपा लोगे।
कोशिश तो कर ही सकता हूँ , ना।
ओह्ह केंद्र, तुम मुझसे कह दो जो कहना चाहते हो, हल्का महसुस करोगे।
कहा था एक दफा, परिधि.. तब से और भारी हो गया है बोझ।
ओह्ह प्लीज़, केंद्र। फिर वही पूरानी बात। तुम्हे पता है , मेरे जीवन में प्रेम की जगह नही।
परिधि , यह झूठ इतनी आसानी से कैसे कह देती हो।
जितनी आसानी से तुम सच छुपा लेते हो केंद्र।
क्या हम शब्दो में उलझे रहेंगे , परिधि।
तुम्हे शब्दो से ही तो प्रेम है, केंद्र। नही तो मेरा तुमसे रोज मिलना, इस समुन्द्र किनारे रोज बैठना, तुम्हारे दुःख को उतना ही महसुस करना , जितना तुम्हारे सुख जीती हूँ, तुम्हे समझ नही आता।
समझ गया।
क्या?
मैं केंद्र हूँ, और तुम परिधि। दोनों एक दूसरे के बिना सम्भव नही हो सकते।
चलो चले, शाम हो गयी है। वरना ये समुन्दर की लहरें हमे किनारे से खुद में सिमटा कर ले जाएँगी।
इसी बहाने हम मिल तो जायेंगे, परिधि।
नही केंद्र, हमारा होना जरूरी है, मिट जाने के बाद इन समुन्द्र के किनारों पर मिलना कहाँ होगा। फिर ना तुम केंद्र होंगे और ना मै
परिधि।

Thursday, April 6, 2017

मैं गौ रक्षक हूँ ......


मुझे नही आता तरस, मेरी सम्वेदनाएँ नही फूटी जब खिंच कर गाड़ी से सड़कों पर लिटाया गया उसे। मैं पॉपकॉर्न खा रहा था और फेसबुक पोस्ट करने की सोच रहा था जब गौरक्षक के लात घूंसे उसके जबड़े तोड़ते रहे, हड्डियां मसलते रहे । यह सांस्कृतिक भीड़ अंतड़ियों को फाड़ कर गौभक्ति भर देना चाहती है। वो दिन रात टहलते है सड़कों पर, गाड़ियों से गाय की रक्षा में, हिन्दुओ की गाय की रक्षा में। जब कोई मुसलमान, दलित दीखता है गाय के आसपास वो बिना सवाल के उन्हें गाय हत्यारा घोषित करते है, इससे पहले की गाय की हत्या साबित हो, वो इंसान की हत्या कर देते है, और खुश करते है अपने मन को,
एक विराट शांति, ये चमकता ओज उनके चेहरे पर दौड़ता है। आज उनकी गौभक्ति का एक तमगा लग गया सीने पर, हाँ आज उन्होंने सच्ची गो भक्ति कर ली। स्वर्ग में एक सीट बुक हुआ।
मैंने देखा भुजाओं में बल युवाओं के, ये रौद्र रूप कुछ कर गुजरने का, देश की संस्कृति बचाने का , सारे बौद्धिक विचारों पर तमाचा जड़ने का, हां मैंने देखा उनके कोमल जज्बातों को जब कोई छूता है, चाहे वो गाय के नाम पर, या भगवान के नाम पर तो वो लहु बहाने के लिये तैयार रहते है, अपना नही किसी और का। इसे सहिष्णुता से जबड़न न जोड़े। अहिंसक देश हिंसा कर सकता है, जब बात गाय की हो। आपलोग अपनी माँ को माँ मानिये , वो लोग गाय को माँ मानेंगे।
घर में अपनी माँ पर हो रहे अत्याचार पर कभी आवाज नही उठाये भले, पर वो गाय को जब मुसलमानों, दलितों के हाथ में देखकर ऐसे अपवित्तर काम से चुप नही रहेंगे। वो जान ले लेंगे। यह आजादी हमे शास्त्र देता है, संविधान का पता नही।
इस कौम को ऐसे ही युवाओं की तो जरूरत है, ये चौड़ी छाती, ये विराट ललाट, हाथ में डंडा , सिर पर साफा, नाम के आगे या पीछे गौरक्षक।
सड़क पर बिछी अपनी लाश , आँखे ताक रही हो खुद को, शरीर का अंग बिखड़ा पड़ा हो, उंगलियां गिन रहा हो , कितने टुकड़े किये गये। तब शरीर से अलग हुआ यह मन यही कह रहा होगा, हाय रे अभागा मैं।

Wednesday, March 29, 2017

लव इन दि टाइम ऑफ़ आधार कार्ड-रवीश कुमार


रवीश कुमार की कलम से.
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सुनो, तुम तुम्हीं हो न । कोई और तो नहीं न ।
मैं नहीं तो और कौन होगा। मैं ही हूँ। जो कल था, आज भी वही हूँ।
क्या पता। इतने पहचान पत्र हो गए हैं कि भरोसा मुश्किल है। क्या गारंटी कि तुम वही हो।
भरोसा ! तुम पागल हो रही हो। अच्छा सा मौसम है। चुनाव नहीं है कि तुम पहचान पत्र की बात करने लगी।
नहीं। मैं डुप्लिकेशन रोकना चाहती हूँ। तुम तो हो सकते हो मगर कोई तुम्हारा दूसरा निकल गया तो । प्रेम अब सच्चा होगा। किसी एक से होगा।
अरे भाई । ये सब क्या है। अब आई कार्ड दिखाकर मिलना होगा क्या ।
आई कार्ड नहीं । आधार कार्ड दिखाना होगा।
आधार कार्ड ? आर यू सीरीयस
हाँ, प्रेम । हमारा प्यार आधार लिंक होगा। आधार बिना संसार मिथ्या है।
आधार लिंक !
हाँ । आजकल के प्रेमियों का भरोसा नहीं। आधार नंबर रहेगा तो तुमने किस किस से प्रेम किया है सब पता चलेगा।
प्रेरणा जी, हम प्यार करते हैं। हमारा प्यार आयकर का रिटर्न नहीं है कि आधार लिंक कर दे ।
प्रेम, मैंने भी कोई बैंक का खाता नहीं खोला है कि एक नाम से दो दो जगह दिल लगा बैठे कोई।
प्रेरणा जी, आपका प्यार अब प्यार नहीं लगता। सब्सिडी बचाने की योजना लगती है।
प्रेम । लोग सब्सिडी छोड़ रहे हैं।
तो ?
या तो आधार से जोड़ दो या तुम प्यार छोड़ दो !

Tuesday, March 28, 2017

२१वी सदी में स्त्री



अब तक के जीवन का सारा निर्माण पुरुष के आसपास हुआ है, स्त्री के आसपास नही। अबतक की सारी सभ्यता , सारी संस्कृति, सारी शिक्षा पुरुष ने निर्मित की है, पुरुष के ढंग से निर्मित हुई है, स्त्री के ढंग से नही।
ओशो कहते है- पुरुष के मन में प्रेम बहुत गहराई पर नही है, महत्वाकांक्षा है। और जहाँ महत्वाकां है, वहाँ इर्ष्या होगी। जहाँ महत्वकांन्छा है, वहाँ घृणा होगी। जहाँ म्हत्वकांछा है ,वहाँ युद्ध होगा।
पुरुष ने जो समाज की संरचना की है, वह अपने ढंग से की है, उसमे युद्ध प्रमुख है, उसमे तलवार प्रमुख है।
यहाँ तक की अगर कोई स्त्री भी तलवार लेकर खड़ी हो जाती है,तो पुरुष उसे बहुत आदर देता है। उदाहरण स्वरूप जोन ऑफ़ आर्क, झाँसी की रानी को पुरुष बहुत आदर देता है। इसलिय क्योकि वह पुरुष जैसी स्त्रियां थी। ठीक उसी प्रकार अगर कोई पुरुष में स्त्रैण गुण हो तो ,उसका अनादर किया जाता है। उसे कमजोर समझा जाता है। इसलिय समाज लड़के को रोने के लिये मना करता है, उसे खिलौने में बन्दुक लाकर दी जाती है।
वर्तमान समय में नारीवादी आंदोलन ने समाज की संरचना बदलने में काफी जोर लगायी। नारी को चारदीवारी से निकाला गया, नयी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था में आगे किया गया, ताकि जो रूढ़िवादी नियम थे, तोड़े जा सके। लेकिन जो भूल हमारे समाज ने स्त्रियों को अशिक्षित रख कर किया था, अब एक और दूसरी भूल समाज यह कर रहा है कि स्त्रियों को पुरुषों जैसा शिक्षा दी जा रही। स्त्रियां सम्पूर्ण रूप से पुरुष बनने की होड़ में लग गयी है। वह पुरुष जैसा दिखना चाहती है, उनकी तरह बोलना, चलना , सोचना चाह रही। इससे समाज स्त्री के आसपास खड़ा नही हो रहा, बल्कि समाज समाज आज भी पुरुष के आसपास ही खड़ा है। स्त्रियां पुरुष की डुप्लीकेट कॉपी बनना चाह रही।
ओशो कहते है- स्त्री  और पुरुष समान आदर के पात्र है, लेकिन समान बिलकुल नही है। स्त्री स्त्री है, पुरुष पुरुष है। और इन दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। हम भिन्नता को समझ नही रहे है। इस फर्क को ध्यान न रखा जाये तो जो भी शिक्षा होगी वह स्त्री के लिए बहुत आत्मघाती होगी। पुरुष् ने पहले से ही विक्षिप्त सभ्यता को जन्म दिया है, और जो सभ्यता अब बनेगी उसमे स्त्री की जरूरत है, लेकिन उस स्त्री की जो पुरुष न बनकर स्त्री होने को श्रेष्ठकर मान रही है।
इतिहास से लड़कर , स्त्री पुरुष की छाया से ज्यादा अस्तित्व नही जुटा पायी है।
नयी सदी के नारीवाद ने , स्त्री को नही बचाया है, बल्कि उसपर पुरुषत्व का लेप चढ़ाया है। वह प्रेम ,करुणा, आदर की प्रकृति को तुच्छ और घृणा, हिंसा को श्रेष्ठकर मान रही।
आवश्यकता है, नारी को पुरुष से पृथक व्यक्तित्व उपलब्ध करना। न उसे पुरुष का गुलाम रहना ही, न ही उसका अनुशरण करना है। नारी को अपने व्यक्तित्व की खोज करनी है।
उन्हें अपनी पहचान "स्त्री" होने से घबराना नही है, उन्हें यह स्पष्ट रूप से घोषणा करनी है कि वह स्त्री है, स्त्री ही रहेंगी और स्त्री ही होना चाहेंगे। जिस स्त्रैण गुण को कमजोर समझकर स्त्री खुद भाग रही है, वो इस बात से अनजान है कि स्त्रैण वह गुण है वह बहुमूल्य है, वो संरचनात्मक है। कहा जाता है हाउस और होम में इस बात का फर्क है कि होम में स्त्री की उपस्तिथि है और हॉउस महज ईंट की दिवार है, खालीपन है।
स्त्रैण होना कीमती है। स्त्री भाग्यशाली है कि प्रेम, करुणा  उनकी प्रकृति है। जब एक पुरुष स्त्रैण गुण को उपलब्ध होता है, तो वह बुद्ध, महावीर, कृष्ण बनता है।
नारीवाद ने जिस अस्तित्व की लड़ाई शुरू की थी, वह स्त्री की अस्तित्व बचाने के बजाए पुरुष के अस्तित्व को अपने ऊपर मढ़ने में ज्यादा जोर देने लगी। वह समाज में पुरुष को नकारने लगी।
इस लेख पर यह सवाल उठना लाजमी है कि मैंने नारीवाद को गलत समझा। तर्क यह आएगा की नारीवाद विकल्प और अवसर की समानता की बात करता है। नारीवाद ने कभी समाज के नियमो या नारी के उत्तरदायित्व से स्वन्त्रता की मांग नही करता बल्कि निर्णय लेने में स्वतंत्रता की बात करता है।
पर यह लेख इस ओर इशारा करता है, की कैसे नारीवाद अतिवाद की ओर उन्मुख हुआ है।  स्त्रियां पुरुष से अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में पुरुष बनती जा रही है। जो उनके पहले से श्रेष्ठ है उसे भूलकर पुरुष द्वारा बनाये गए श्रेष्ठता के आधार पर खड़े होने की कोशिश में लगी है। वह स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को न बना कर पुरुष की डुप्लीकेट कॉपी बन रही। 

कविता(व्यंग) - व्यापम , मौत ,और मौन की बात |

    

व्यापम , मौत ,और मौन की बात


कल रात मोदी जी सपने में आये।
थोड़े  उदास, थोड़े परेशान
थोड़े अचंभित,थोड़े हैरान 
परंतु, ह्रदय में वही "मौन" ,वही शान्ति
चेहरे पर दमक..वही शौर्य कांति।
मैंने हाथ जोर किया नमस्कार
बोले- सेल्फ़ी खिंच.. बेटा
पुराना हुआ ये व्यवहार।
बोले,
करना चाहता हु तुझसे "मन की बात"
मुहर्त शुभ है आज की रात..
मै अकचकाया,
आँखों को मिचमिचाया
घबराकर बोला-
रेडियो वालो को बुला दू क्या?
कैमरे आसपास लगवा दू क्या?
वो बोले,इससे बचकर तो रोज विदेश भागता हूँ।
"मौन मुख" "बोलते मन" से परेशान..
रोज रात जागता हूँ।।
‪‎व्यापम‬ के व्यापक होने पर ‎मौन‬ हूँ कब से..
घुट घुट कर जी रहा..
"‪‎शिव‬"का दिया विष पी रहा..
बोलू भी तो किससे -किसके विरुद्ध..
निपट मुर्ख जनता तो समझ जाएगी..
इसलिए अपने घर में नही चाहता छेरु कोई युद्ध..

‎मैं‬ ध्यान मग्न हो सब सुन रहा था..
हर बार की तरह ‪‎योजना‬ में कुछ गरीब के लिए चुन रहा था..
मौत रोज हो रही..
जनता आपको खोज रही..
इंतजार है,मन की बात का..
अपने देश में सुरक्षित जी सके..
ऐसे खुसनसीब हर रात का।।
वो गंभीर, थोड़े अधीर बोले
digital‬ india..में वो रात देखो कब तक आएगी..
फ़िलहाल मेरी मन की बात..मौन ही रह जाएगी।।
अपने लोग समझ रहे,लोगो को समझा रहे..
थोड़ा तुम उलझो,थोड़ा वो उलझा रहे..
फिर पानी जिस दिन सिर पे आएगा..
ये मोदी उस दिन भी तिरंगा लहराएगा.
अचानक नींद टूटी तो देखा..
कोई सख्श जा रहा था..
एरोप्लेन का पंखा,हवा में लहरा रहा था...
सफ़ेद कुर्ता,छाती वही 56 इंच चौड़ा है..
मै समझ गया..जरूर फिर विदेशी दौरा है..
गूंज रहा था बस उस रात
व्यापम ‪,मौते‬ और मौन की बात।

कविता : "चाय पर इश्क़"

ishq with chai
  
 चाय का क्या दोष, 
जो अक्सर बहस राजनीती का छिड़ जाता है
इश्क़ की बात जैसे
शराब की आधी बोतल खत्म करने पर आता है
चाय को गुस्सा इस बात का
वह कब इश्क़ की बात सुन पायेगा
इश्क़ जो पहुँचा कॉफ़ी तक
चाय पर कब तक आएगा
कब प्रेमी पूछेगा , चाय पर चले
इस सर्द की मौसम और शाम ढले
चाय की घूंट के साथ
होगी इश्क़ की शुरुआत
थोड़ा चीनी का घुलेगा मिठास
थोड़ा इश्क का होगा एहसास
प्रेमी आँखों में डाले आँखे
चाय की घूँट लगायेगा
प्रेमिका के शर्माने पर
थोड़ा वो मुस्कुराएगा
चाय को तब होगी दिली तस्सली
कल से "चाय पर इश्क़" का जिक्र जो आएगा
इश्क़ का जमेगा अड्डा
इश्कबाज आएंगे
किसी में अदरख ज्यादा
किसी में इलायची कम फरमाएंगे
प्रेमिका को खुश करने को
छोटू को 5 का एक्स्ट्रा टीप दे जायेंगे
इस इश्क़ की भरी दुनिया में अब
इश्क़ इश्क़ हो जायेगा
ग्लास वाला कप भी अब
कुल्हड़ संग खिलखियायेगा
चाय की शिकायतें अब दूर हो जाएंगी
प्रेमिका जो प्रेमी से शिकायत चाय पर फ़र्मायेंगी
प्रेमी भी रूठेगा थोड़ा,
चाय के फिर  दो नये कप आएँगे
मुश्कुराकर दोनों चुस्कियां लगायेंगे
कहानियां अब इश्क़ और चाय पर लिखी जायेगी
चाय की सारी शिकायते भी अब दूर हो जाएंगी
वह अब रोज इश्क़ की बात सुन पायेगा
कॉफ़ी तक जो पंहुचा इश्क़,
चाय तक भी पहुँच जाएगा...




गौरव...

credit:google

Monday, March 27, 2017

इश्क और चाय (laprek)

इश्क और चाय

---------------------शहर की गली,तुम्हारे मकां की बन्द खिड़की।भरी दोपहर में , चाय सुड़क लिया करता था। बस इस इंतजार में की खिड़कियों पर कभी तो हरकत होगी।रूठी हो, मान जाओगी। खिड़की पर न सही छत पर तो किसी रोज आओगी।पुरे महीने बीत गए, और जब चाय वाले ने हिसाब किया तो कुल 6 रुपये के हिसाब 180 रू का बिल पकड़ाया, और साथ में एक पर्ची जिसपर लिखा था। एक महीने पहले वह घर छोड़ दूसरे शहर चली गयी है। अगली बार से चाय 5 रु दूँगा, आते रहियेगा।मैं भी ठहरा ढीठ, आने का सिलसिला तोडा नही। चाय अब भी पीने आने लगा, लेकिन खिड़कियो के खुलने के इंतजार में नही, चाय 5 रु जो मिलने लगा था।

Thursday, March 23, 2017

काश ऐसा होता

             
१-
सीमा कुछ खा ले ।
मुझे भूख नही।
सीमा , माँ के कई बार खाने के आग्रह को ठुकरा दी थी। वह सुबह से बुखार में थी। दवाईयाँ भी ली, पर कोई सुधार नही।
दोपहर का समय था, पिता जी अभी तक बैंक से पैसे लेकर नही लौटे थे। बैंक के कुछ बदले नियम के कारण पैसे मिलने में असुविधा हो रही थी, और सीमा के शादी का दिन नजदीक आता जा रहा था। इधर माँ घर के बुलाये जाने वाले रिश्तेदारों के सुविधाओं का ध्यान रखने में व्यस्त थी। उनके पास इतना वक़्त भी नही था कि सीमा के नजदीक बैठ कर पूछ सके, सीमा परेशान क्यूँ है?
सीमा घर की सबसे बड़ी बेटी थी। एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। बहुत ही गम्भीर, समझदार और काम के प्रति उतनी ही ईमानदार थी। स्कूल के बाकि शिक्षिकाओं के साथ गप्प करने से दूर वह किसी न किसी क्लास में बच्चों को पढ़ाते दिख जाती थी। बच्चे भी उससे बेहद प्यार करते थे।
अगले सप्ताह सीमा की शादी थी। शादी से पहले हर लड़की नर्वस हो जाती है, पर उसकी परेशानी का वजह था ,विनीत का अचानक कॉन्फरेंस के लिये दिल्ली जाना।
------------------------------------------------------------
           २-
विनीत वही लड़का था ,जिससे उसकी शादी होने वाली थी। विनीत उसके पसन्द का लड़का था, जिसे उसने अपने कॉलेज के दिनों से पसन्द किया था। सीमा और विनीत, अलग- अलग क्लास में होने के बावजूद एक ही कॉलेज में थे। कॉलेज के स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट के चुनाव के दौरान उसकी मुलाकात विनीत से हुयी थी।
विनीत भी इस चुनाव में प्रेसिडेंट पोस्ट का उम्मीदवार था  चुनावी प्रचार के दौरान ,उम्मीदवार को हर क्लास में जाकर भाषण देने होता था, बच्चो को समझाना होता था, की अगर वह चुनाव जीतता है तो कॉलेज में किस तरह का बदलाव लायेगा।
विनीत के क्रांतिकारी बातो ने सीमा का मन मोह लिया था। वह भी अपने कुछ दोस्तों के साथ ,विनीत के चुनावी प्रचार में शामिल हो गयी थी। विनीत की सबसे अच्छी बात थी की वह लड़कियों की इज़्ज़त करता था और सच के लिये खड़ा होने की उसकी आदत हर किसी को प्रभावित करती थी। वह एक अच्छा वक्ता होने के साथ साथ एक अच्छा, लेखक और कवि भी था।
विनीत का सुबह से शाम चुनावी प्रचार में  भाषण देते देते गला बैठने लगता , तो सीमा ही कैंटीन से पानी और जूस की बॉटल लेकर उसके साथ चलती।
दोनों उसी दौरान एक दूसरे के करीब आ गए थे , परन्तु राजनीती की गहमा गहमी उन्हें अपने इस भावना को समझने में देर कर दिया।
जब दोस्तों के हँसी मजाक में सीमा का जिक्र आने लगा तब विनीत को एहसास हुआ की वह सीमा से प्यार करने लगा है। पर दोनों कई महीने तक एक दूसरे को बिना बताये एक दूसरे का ख्याल रखने लगे थे।
दोस्तों के कई बार कहने पर विनीत ने मन बनाया की वह सीमा को अपनी दिल की बात कह दे, लेकिन मन ही मन वह डरता था कि सीमा उसे गलत न समझने लगे और उन दोनों की अच्छी दोस्ती टूट जाये। पर डरते डरते विनीत ने सीमा को चाय की चुस्कियों के साथ कह दिया- सीमा मेरा झुकाव तुम्हारी तरफ बढ़ रहा।
सीमा इस नये तरह के इजहार से बिलकुल अनजान थी। कोई भी प्रेमी प्रेमिका जबतक I love you साफ -साफ, सही शब्दो में ना कहे, तबतक उसपर प्यार का मुहर नही लगता।
सीमा ने मुस्कुराते हुए पूछा था- कब से ?
सीमा की इस मुश्कुराहत से विनीत की हिम्मत बढ़ गयी।
विनीत को इस सवाल का जबाब नही पता था, और " जब से हमलोग एक दूसरे से मिले है" जैसे जबाब नही देना चाहता था। इसलिये उसने अपनी रचनात्मकता का प्रयोग करते हुए थोड़ा फेर बदल किया- जब से हम एक दूसरे को और बेहतर तरीके से जानने लगे है।
सीमा, विनीत के साथ रहते रहते काव्यात्मक भाषा, दार्शनिक शब्द, उलझी- उलझी बातो को समझने लगी थी। इसलिय विनीत की बेचैनी को कम करते हुये, सीधे- सीधे साफ़ शब्दो में कह दिया- I love you too vineet
विनीत, सीमा की आँखों में देखता रह गया था। दोनों उसदिन घण्टो पार्क का चक्कर लगाते रह गये थे।  दोनों सर झुकाये एक दूसरे से बाते करते रहे। कभी कभी विनीत के हाथों का उसके हाथों पर स्पर्श अच्छा लग रहा था। उस दिन दोनों ने एक दूसरे को और जाना। धीरे- धीरे समय बीतता गया, दोनों प्यार में और डूबने लगे थे। विनीत अपनी रचनात्मकता का प्रयोग कर सीमा को खुश करने की हर प्रयास करता। दोनों सुखद प्रेम के तीन साल कॉलेज में गुजार दिए थे, अब समय आ गया था, कॉलेज के आखिरी दिन का।
"दोनों उस मोड़ पर खड़े थे, जहाँ रास्ते अलग हो रहे थे, पर मंजिल पर मिलने का वादा दोनों ने एक दूसरे से किया।"
सीमा की नौकरी ,घर के पास के ही सरकारी स्कूल में लग गयी थी, इर विनीत अपने आगे के शोध के लिए दिल्ली चला गया था। दोनों के प्रेम संवाद का एकमात्र माध्यम था- फोन, जिसपर दोनों की निगाह अक्सर टिकी रहती। विनीत जब वापस छुट्टियो में घर लौटता, तो सीमा से, उसके स्कूल पर जाकर मुलाकात कर देता। दोनों कुछ घण्टो के लिये पुराने मीठी यादो में खो जाते, क्योकि अब भविष्य की अनिश्चितता, उनदोनो को डराने लगती।
सीमा के स्कूल के पास गुपचुप वालो का एक ठेला लगता था, जिसकी प्रसिद्धि की चर्चा, सीमा अक्सर विनीत को फ़ोन पर किया करता। विनीत कभी कभी मज़ाक में कह देता, इतना प्यार गुपचुप वाले पर, किसी दिन भाग ना जाना। सीमा गुस्से से फोन काट देती, फिर विनीत के बहुत मिन्नतों और सॉरी कहने के बाद बातें शुरू करती। विनीत भी कॉलेज की कहानियां सुनाता, अपने शोध की बाते बताता, कभी कभी सीमा को परेशान करने के लिये किसी लड़की का भी जिक्र कर देता।
दोनों एक दूसरे से मीलो दूर होते हुए भी विश्वास के डोर से अपने प्रेम को बांधे हुए थे।
पटना कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी लगते ही, पहला कॉल उसने सीमा को किया था, और उसने पहला शब्द यही बोला था- सीमा, मुझसे शादी करोगी।
सीमा इस अचानक प्रस्ताव के लिये तैयार नही थी। परन्तु, विनीत के जिद और अपने दिल को सुनते हुये, उसने हाँ- कह दिया था।
विनीत उसदिन बोलता रह गया था- I love you, I love you , I love you.......
कुछ दिन बाद ,विनीत सीमा को बिना बताये उसके घर आ गया था। सीमा समझ नही पायी की वह कैसे रियेक्ट करे। वह अचानक उठने वाले तूफ़ान की भयावता को समझ रही थी। सीमा के घर वालो को विनीत और सीमा के सम्बन्ध का कोई अनुमान नही था।
सीमा के कोई जान- पहचान का है, इस नजर से पिताजी ने हाल-चाल, पढ़ाई, नौकरी, घर- परिवार की पूछताछ कर रहे थे। अभी तक सब कुछ बढ़िया था। सीमा को स्कूल जाना था, परन्तु वह विनीत के जाने का इन्तजार कर् रही थी, क्योकि वह विनीत को पिता जी के पास अकेला नही छोड़ना चाहती थी। पर उसे जिस बात का डर था, वही हुआ। पिताजी ने पूछ दिया, तब यहाँ कैसे आना हुआ? कोई खास वजह?
विनीत ने थोड़ा सहमते हुये कह दिया, शादी का प्रस्ताव रख दिया था। सीमा चुपचाप दरवाजे की ओट में खड़ी सुन रही थी। उसके कानों में जैसे ही यह बात पड़ी, वह बुत्त बनी खड़ी रही।
सीमा के पिताजी ,अपने आप को संयमित करते हुए, विनीत को बिदा किये। उन्होंने बस इतना ही कहा- सीमा से पूछ कर , उसके घर वाले को सूचित करेंगे।
विनीत के जाते ही, घर में हड़कम्प मच गया। पिता जी बिना खाये हुए अपने काम पर चले गए। इधर माँ दिन भर नये जमाने की पढ़ाई को कोसती रही। सीमा उस दिन स्कूल नही गयी, अपने कमरे में दिनभर रोती रही।
रात को पिता जी घर लौटे। सीमा को बुलाया गया। पिताजी ने बस इतना सा सवाल किया- क्या तुम्हारे तरफ से भी कुछ है ?
सीमा सिर झुकाए,रोती रही। वो न हाँ कह सकी और ना। वह पिताजी के क्रोध से भली - भाँति परिचित थी। वह जानती थी पिता जी अंतर्जातीय विवाह के कितने विरोधी है। उन्होंने पढ़ाई, लिखाई ,खेल- कूद , खाने- पीने, को लेकर हमेशा स्वतंत्रता दी है, पर हमेशा इस बात को भी समझाते रहे की ,जो भी कदम उठाओ उससे हमारे ऊपर समाज की ऊँगली न उठ सके। सीमा परेशान थी की एक तरफ विनीत का प्रेम, दूसरी तरफ पिता जी की अपेक्षाएं। वह बस रोये जा रही थी। बच्चो के आँखों में आँसू, पिता के कठोरता को अक्सर पिघला देते है। उधर पिताजी के आँखों सॅ भी आँसू टपक रहे थे। उनके सामने औलाद की उम्मीद और समाज के नियम सामने थे। बेटी के ब्याह के बाद समाज का सामना तो उन्हें भी करना था। वह पूरी रात सो नही पाये। माँ को भी समझ नही आ रहा था कि वह इस समय क्या करे। सारा घर किसी अनहोनी से आशंकित था।
विनीत,  सीमा को फ़ोन किये जा रहा था, और सीमा का फ़ोन स्विचऑफ होने से , और परेशान होने लगा। वह किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत खुद को कोसने लगा। वह भी पूरी रात सो नही पाया।
अगले दिन सीमा के पिताजी सुबह सुबह तैयार होकर निकल पड़े। किसी भी घर वाले को नही पता था, की वह कहाँ जा रहे, और क्यूँ ?
घर वाले परेशान, फिर रोना- धोना शुरू हो गया। शाम को 5 बजे दरवाजे की घण्टी बजी। पिताजी लौटे थे, हाथ में कुछ एक सामान और खूबसूरत सी साडी थी। 
विनीत के घरवाले की तरफ से सीमा के लिये सगुन का कपड़ा था। सब आश्चर्यचकित रह गए। सीमा दौड़ कर पिता जी से लिपट गयी।
विनीत से पूछताछ में उन्होंने उसके घर का पता जाना था। आज सुबह सुबह विनीत के घर पर जा पहुँचे। विनीत के पिता जी को सीमा और विनीत के बारे में पता था, इसलिये उन्होंने सीमा के पिता जी को समझाते हुए, रिश्ता पक्का कर दिया था। कुछेक रस्म उसी दिन पूरा हो गया था। शादी का मुहूर्त भी तय कर के , वह वापस लौटे थे। विनीत के घर वाले ने बिना दहेज शादी का प्रस्ताव रखा था।
सीमा और विनीत की बाते फिर शुरू हो गयी थी, अब उनके बातो में बीते हुए प्रेम क्षण के यादो के साथ साथ, भविष्य का भी जिक्र होता। दोनों बेडरूम का कलर, घर की डिजाइन, हनीमून डेस्टिनेशन तय कर रहे होते। धीरे धीरे शादी का समय नजदीक आ गया।
-----------------------------------------------------------
३-
कल रात जब वह विनीत से बात कर रही थी, तब विनीत ने बताया कि उसे कल conferrence के लिये दिल्ली जाना होगा, और दो दिनों में लौटेगा। शादी के एक सप्ताह बाकि थे, और विनीत का दिल्ली जाना, सीमा को बिलकुल अच्छा नही लग रहा था। वह विनीत को मना भी नही कर सकती थी, उसे विनीत के प्रोफेसनल काम में दखल देंना पसन्द नही था।
जब विनीत ने कहा, दो दिन उससे बात नही हो पायेगी, कांफ्रेंस खत्म होते ही ,वह खुद कॉल करेगा। सीमा और परेशान हो गयी, और सीमा जब भी मानसिक रूप से परेशान होती, उसे बुखार हो जाया करता था। इसी वजह से उसे खाना खाने की इक्षा भी नही हो रही थी।
विनीत का कॉल आया वह दिल्ली पहुँच चूका था। अब उसका फोन स्विचऑफ होने वाला था, इसलिय उसने सीमा से घण्टो बाते की। सीमा अब कुछ हल्का महसूस कर रही थी। इधर घर में मेहमान आने शुरू हो गए थे। घर में हलचल शुरू हो गया था। इन बातों से बचकर सीमा जब अकेले होती तो विनीत का ख्याल आता।
इधर विनीत का कॉन्फरेंस खत्म हो चूका था, सीमा को कॉल लगाया, घण्टो दोनों की बातें हुयी। सफर की सारी हिदायते सीमा की तरफ से मिलना शुरू हुआ।
रात 8 बजे, ट्रेन अनन्दविहार स्टेशन से खुलने वाली थी। उसने सारा सामान सही ढंग से रख दिया था । वह सीमा के लिये डिज़ाइनर ड्रेस भी ख़रीदा था, जिसे वह सीमा को सर प्राइज देने वाला था।
सीमा को नींद नही आ रही थी वह घड़ी की सुई की ओर टकटकी लगाए देख रही थी। पूरा घर गहरी नींद में सो रहा था। सीमा ने देखा घड़ी में 12.30 बज रहे थे। सीमा ने विनीत को मैसेज किया- " सो गए"
विनीत- नही, तुम्हे याद कर रहा
सीमा- मैं भी- लव यू
सीमा , विनीत के "लव यू टू" का इन्तजार कर रही थी, पर कोई मैसेज नही आया।
जरूर मोबाइल स्विच ऑफ हो गया होगा, चार्ज भी नही कर सकता, लापरवाह इंसान। सीमा मन ही मन बड़बड़ा रही थी।
सीमा को,विनीत के बारे में सोंचते सोचते कब नींद आ गयी, पता ही नही चला।  वह चाय पीने लगी, तभी उसकी नजर बगल में रखे अख़बार पर नजर पड़ी। " भयानक ट्रेन हादसा"- हैडलाइन देखते ही कांप गयी। विनीत को फोन लगाया, अभी तक स्विच ऑफ था। वह पेपर उठा कर पढ़ने लगी। " दिल्ली से पटना आ रही, ट्रेन रात एक बजे कानपुर में पटरी से उतर गई"। 6 ऐसी कोच बुरी तरह से क्षतिग्रशत हो गए थे । सैकड़ो यात्री की मृत्यु हो गयी थी। खून से लथपथ लोगो का चित्र अख़बार, न्यूज़ चैनल में तैरने लगा था।
सीमा बेहोश हो गयी थी। घर में अफरातफरी का माहौल हो गया था। विनीत के पिता जी को फोन लगाया गया, उन्हें भी विनीत की अभी तक कोई सुचना नही मिली थी।
दोनों परिवार के कुछ सदस्य कानपूर निकल गए थे, रास्ते भर रेलवे अधिकारी से जानकारी लेते रहे, परन्तु कोई स्पष्ट सुचना नही मिल रही थी। इधर सीमा की हालत नाजुक होते जा रही थी, वह होश में आते ही फिर बेहोश हो जाती।
कानपूर पहुँच कर, दोनों परिवार रेलवे स्टेशन, पुलिस स्टेशन, अस्पताल के चक्कर लगाये जा रहे थे। विनीत का नाम कही दिख नही रहा था। दोनों घटना स्थल पर एक बार फिर जाने का सोंचे। तब तक भीड़ को चीरते हुए, एक लाश को स्ट्रेचर पर लाया जा रहा था। विनीत के पिता ने , स्ट्रेचर पर से नीचे झूलते हाथ को देखकर विनीत को पहचान लिया था। वह विनीत था, खून से लथपथ, बिलकुल शांत पड़ा।
सब सन्न रह गए। किसी तरह सरकारी प्रक्रिया पूरी कर के , विनीत के मृत शरीर को लेकर घर रवाना हुए। सबको हिदायत दी गयी, की सीमा को इस बात का कतई पता नही चलना चाहिये। वह एक ही साथ दो लाशों को नही देखना चाहते।
इधर सीमा के पास इकठ्ठा होकर, सब उसे तस्सली दे रहे थे। सब फोन से खबर लेने को उत्सुक थे। कोई पक्की खबर नही मिलने पर सब परेशान हुए जा रहे थे।
रात को गाड़ी रुकी, सीमा के पिता जी सीढिया चढ़ते ही फुट फुट कर् रोने लगे। सबके आँखों से अश्रुधारा फुट पड़ी।
सीमा,घर के बिस्तर पर शांत पड़ी थी।वह मुस्कुरा रही थी, उसने एक स्वप्न देखा। हल्के नीले रंग के कोट में विनीत गाड़ी से उतर रहा, ठीक वैसे ही जैसे वह स्कूल में पहली बार मिलने आया था।
वह दौड़ कर दरवाजा खोलती है, विनीत सामने बाँहें फैलाये खड़ा है। दोनों एक दूसरे से लिपटने की कोशिश करते है, तबतक एक काली छाया उसे खीँच ले जा रहा होता है। वह जोर से सीमा को देखकर हँसता है- एक आवाज गूंजता है- "काश ऐसा होता।
सीमा नींद से बाहर आना चाहती है, वह इस दुःस्वप्न से दूर भागना चाहती है। पर वह उठ नही पाती है।
समाप्त।
गौरव गुप्ता
8826763532
Gaurow.du@gmail.com

मेरी दो प्रेमिका

मेरी दो प्रेमिका
बन गयी है अच्छी दोस्त
छांट - छांट कर मेरी याद
कर लिया है अपने पसन्द का बंटवारा
अपने अपने कुछ  किस्से 
एक दूसरे को उपहार में दे दिए है
मेरे मरने के बाद भी
मेरे पुराने दोस्तों के ईमेल का जबाब
मेरी पहली प्रेमिका देती है
नये मेहमान का स्वागत
मेरी नयी प्रेमिका घर पर करती है
जब भी उनको मेरी याद आती है
दोनों मिल लेती है किसी चाय की दुकान पर
चाय की हर घूँट के साथ
मैं हलक से नीचे उतर जाता हूँ, अक्सर
बंटवारा सिर्फ नही हुआ है
तो मेरी प्रेम कविताओं का
दोनों कविता की हर पंक्ति को
साझेदारी कर सुन लेती है
बुन लेती है, नर्म ख्वाब
और मैं जिन्दा हो उठता हूँ
दोनों के ख्वाबो में पूरा - पूरा
मेरे सपनों को कर रही पूरा
मेरी दो प्रेमिका...

प्रिय एंजल प्रिया ;व्यंग

प्रिय एंजल प्रिया,
स्नेह भरा प्रणाम, प्रेम इसलिय नही क्योकि तुम हो एंजल और हम ठहरे सीधे साधे लौंडे। खत इसलिय लिख रहे की, क्योकि तुमसे बहुत शिकायत है हमको। ये जो Delhi pool group पर भगवान जी का फोटो पोस्ट करती हो, और लोग तुम्हे भक्त समझकर लाइक पर लाइक किये जाते है, हमको साला टेंशन होता है, एक हमारा पोस्ट कितना भी प्रिज़मा, रेट्रीका यूज़ कर ले 11 से 12वा लाइक नहीं आता। कई बार तो दोस्त सब को कहना पड़ता है लाइक करो और शाम को समोसा चाय का पार्टी लो।
ये जो तुम आर्मी जवान का फोटो डालकर देशभक्ति दिखाती हो, मै तो कहता हु ऑफिसर लोग भी फेसबुक किया करे घर बैठकर।
"गरीब की बेटी को कोई लाइक नही करेगा क्या" ऐसे पोस्ट पर मुझे तो दया भी आता है तुम पर, कभी कभी रो भी लेता हु की सचमुच इस गरीब की बेटी को अगर लाइक नही किया तो इसका सपना तो चकना चूर हो जायेगा।  तुम जैसी गरीब की बेटी जिसे रोटी से ज्यादा चिंता फेसबुक लाइक की होती है, कसम से कितने निर्दयी है वो लोग जो लाइक नही करते, खैर उन लाखो का शुक्रगुजार हूँ जो लाइक भी करते है और साथ साथ कमेंट में अपना नम्बर भी लिखते है, ताकि भविष्य में तुम्हे कोई परेशानी हो तो तुम सम्पर्क कर सको। सच में ऐसे समाजसेवियों की इतनी तदाद है देश में , पता  नही था।
ये जो भारतीय ड्रेस और वेस्टर्न स्कर्ट का तुलनात्मक अध्ययन करती हो, की कौन अच्छा लग रहा तो कसम से तुम्हारे इस रिसर्च का हिस्सा मैं भी बन जाना चाहता हूँ। जब देखता हूँ की लोग भारतीय ड्रेस को बेस्ट बताते है और लम्बे लम्बे भाषण दे रहे होते है कमेंट बॉक्स में, और जो चरित्रवान होने का प्रमाण दे रहे होते है, उनका फेसबुक सर्च हिस्ट्री खुद दिल्ली पूल पार्टी में खोजी जा रही बिकनी वाली लड़कियो का होता है।
सामान्यज्ञान, यूजीसी नेट, एसएससी ग्रुप में जब तुम्हारे पोस्ट देखता हु तो लगता है तुम तयारी कर रहे नवजवान छात्रो का कितना ध्यान रखती हो , जो वक़्त बेवक़्त उनका मूड फ्रेश करने के लिए पोस्ट डालती रहती हो। फसेंबूक पर चर्चा तो बस दो की ही होती है, एक तुम्हारी दूसरी मोदी की।
अच्छा ये जो एंजल परिवार है, एंजल सोनिया, एंजल रश्मि, एंजल पिंकी ,ये सब सगी बहने है या चचेरी, ममेरी टाइप?
दादी की परियो की कहानी और तुम टाइप एंजलो में एक समानता है, उनकी वजह से पहले राजा महाराजाओ की कटती थी , अब तुमलोग की वजह से आजकल के लौंडे राजकुमारों की।
भरी दुपहरी में जो रिचार्ज कराने जाते है, इस उम्मीद में की रिचार्ज होते ही तुम्हारी आवाज सुनने को मिलेगी। पता नही आजतक किसी ने तुम एंजलो की आवाज सुनी भी है की नही।
ये तभी सुधरेंगे जब भी तुम्हारे पोस्ट पर कमेंट में नम्बर लिखे तभी मैसज आये
"Your account balance has been deducted by angle Priyअ, thank-you for your comment"
किसी दिन फेसबुक से फुरसत मिले तो आओ मिलो किसी चाय की दुकान पर। वही बैठ कर चाय-मट्ठी का आनंद लिया जाये। और हा अपनी चचेरी, ममेरी एंजलो को लाना मत भूलना। मेरा दोस्त सब गुड्डू, छगन, सुरजितवा इंतजार कर रहा।
तुम्हारा शुभचिंतक
सलीम बाबू( प्रिज़मा डिजिटल स्टूडियो वाले)
साहेबगंज रोड, चकिया , बिहार

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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