मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Friday, May 27, 2016

मेरी कविता



                                                   इन दिनों कुछ नया शब्द ढूंढ रहा हु,
                                                    कि गढ़ सकु नए अर्थ इनमे
                                                   अब तक पुराने पर ही पैबन्द लगा कर
                                                       सुनाता था तुम्हे कविताये

                                                    तुम्हे पैबंदो से प्यार होता गया
                                                      और मैं नए अर्थ से दूर हो गया
                                                     अब तुम कुछ दूर चली ही गयी हो
                                                       तो खोजने दो मुझे नए शब्द
                                                        जो दे सके मुझे नए अर्थ
                                                            जब पढ़ना मेरी कविता
                                                             तो मत ढूँढना पैबन्द
                                                        क्योकि फिर एक दुरी हम दोनों के दरमिया आएगी
                                                       मेरी कविता फिर एक बार फिर तुमसे दूर हो जायेगी

Friday, May 13, 2016

स्ट्रेंजर ....

डिअर  स्ट्रेंजर 
ऊँची छत , लटके हुए बड़े फैन जैसे डरा रहे हो। आज बिजली नहीं है , लाइब्रेरी की कुर्सी पर बैठे बैठे पीठ पसीने से तर बतर हो रहा है।  पानी हर दो मिनट पर गट गट गले उतर रहा है।

वह सामने बैठी है। खुले बाल, खुबशुरत आँखे, गुलाबी होठ,.....  वह चुप चाप किताब पर नजर गराए बैठी है। वह शांत है ,ठहरी हुयी सी , इस भाव में उसे घंटो से चोरी छिपे देख रहा।  वह कभी कभी सलीके से मुस्कुराती है,अंग्रेजी उपन्यास पढ़ रही. गर्मी में सूखते होठो को थोड़ी थोड़ी देर पर पानी से तर कर रही।  होठो की गुलाबी रंगत पानी के फुहार से फिर तारो ताजा हो जा रहे।
कुछ देर पर नजरे एक दूसरे से टकराती है , दोनों कितनी तेजी से अपनी नजरे झुक ले इस बात की होड रहती है।  दोनों एक दूसरे को उतनी  अनजां न  निगाहो से देखते है , जितने अंजान हम है  एक दूसरे से। मैं उसे स्ट्रेंजर कहता हु ,पता नहीं वह मुझे क्या कहती होगी, कोई नाम दिया भी होगा या नहीं। वह कई दफा देखती है अपने ागल बगल ,फिर निगाहें किताबो पर। उसके बाल खुले और घुंघराले है बिलकुल बरसात के मौसम में मंडराते काले बादल की तरह।

एक डर है मेरे दिल में , पाने से पहले खो देने का।  उसके ना में मेरे आत्मबिस्वास् की तिलांजलि न चढ़ जाए।  मैं  टूट क्र बिखर  ना जाऊ।  मैं क्यों डर रहा ,क्या मेरे आत्मबिस्वास् का संबंध मेरे कुरुक्षेत्र की लड़ाई के लड़ने से है ? क्या मैं  ही वह अभिमन्यु है जिसे सातो दरवाजे तोड़ने है।? मैं  किन सवालो से डर  रहा।
दिल और दिमाग के अंतर्द्वंद में फसा हुआ हु।  प्यार और भय अक्सर जिंदगी में एक साथ आते है, भय को दिमाग ने पनाह दे रख है , और प्यार दिल को बेचैन किये बैठा है।

शराब की घूंट शायद मेरे डर को शांत करा सकती है , पर क्या मैं इतना कमजोर  हो गया हु , नहीं,...... कभी नहीं।

वह  कान की बाली में उलझे बालों को सुलझा रही , उसके बालों की लट जैसे जैसे सुलझ रही , मैं उतना ही उलझ रहा।

शाम के सात बज गए है , लाइब्रेरी आठ बजे बंद होगी। उसके बाहर निकलने का इन्तजार है , ताकि उससे मिल कर अपने दिल की बात कह सकु,..... कुछ हल्का कर सकु अपने मन को......

आठ बज गए,......
लाइब्रेरी की लाइट बंद होने लगी,.....  वह किताबें समेट  रही,...... ......


क्रमश... 

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

mai kaun hu?

mai kaun hu?
Gaurow gupta