एक छोटे शहर से जब एक छात्र आता है तो खुद के सपनो के साथ घरवालो की उम्मीदों का बोझ भी ढो रहा होता है, जल्दी नौकरी की उपापोह में आपने आपको हर वक़्त पाता है। यह यथार्थ है, आपको भाउक करने की उम्मीद से लिखे जाने का कारन नही । उच्च शिक्षा और छोटे शहर का तालमेल बहुत कम देखने को मिलता है।छोटे शहरो के छात्रो के साथ समस्या यह होती है की वह उच्च शिक्षा को महत्व बहुत कम देते है, क्योकि घर की जरूरत उन्हें जल्दीसे जल्दी नौकरी लेने को बाध्य करती रहती है। अगर कोई छात्र उच्च शिक्षा की और अपना कदम बढ़ाता है तो उनकी उनके विषय के पीछे की रूचि होती है। अपने विषय में कुछ अच्छा , कुछ नया करने की उम्मीद। पर हमारी खोखली शिक्षा प्रणाली क्या उनके सपनो और उम्मीदों को पंख दे पाती है। उनकी मेहनत , उनके सपने क्या चाटुकारी व्यवस्था के पैरो तले कुचले हुए नही पाये जाते है।
इस ब्लॉग को लिखने के पीछे का मकसद यही रहा की बिख्यात विश्वविधालय में पढ़ रहे छात्र की मनोदशा से वाकिफ कराउ आपको।
जब मैं देखता हु दिल्ली विश्वविद्यालय ,राजनीतिशास्त्र के मास्टर्स में नामांकित 600 बच्चों का अंधकारमय भविस्य।हर साल यहाँ तकरीबन 600 बच्चे नामंकित होते है मास्टर्स में। जिसमे मास्टर्स कम्प्लीट करते करते तकरीबन 400 बचते है,200 बच्चे फेल होते है हर साल। अब बचे हुए छात्र अपनी आगे की किस्मत कहा देखते है,जब इसपर गौर करे तो हम पाते है। 400 में से तकरीबन 20 छात्र बिभाग के एमफिल की पढ़ाई में चयनित होते है।बाकि के 380 छात्रो को नौकरी दिलवाने में बिभाग असक्षम है, अब यह छात्र आई ए इस, ssc , या अलग प्रतियोगी परीक्षाओ में किश्मत आजमाते है जिसमे अनुमानत: 50 बच्चे नोकरी पाते है बचे तकरीबन 330 बच्चों का भविस्य एक विषय के मास्टर्स होने पर भी क्या होता है, किसी को पता नही। उनका एक विषय में मास्टर्स होना कितना सफल और कितना सहायक होता है, यह सिर्फ वही जानते है।हमारी शिक्षा की इस व्यवस्था का एक पहलु आपने पढ़ा। दूसरा पहलु शायद एक शिक्षाव्यवस्था, हमारे तथाकथित विद्वानों के मुह पर तमाचा है। समस्या छात्र सिर्फ इन्ही लेवल पर नही झेलता। छात्र अपने पढाई पर मेहनत से ज्यादा वह प्रोफेसर के केबिन के चक्कर लगाने में ज्यादा मेहनत करता हुआ पाया जाता है। अच्छे अंक का पैमाना आपकी मेहनत, आपके द्वारा लिखे गए उत्तर निर्धारित नही कर रहे होते है, यह निर्धारण आपके और प्रोफेसर के बिच के व्यक्तिगत सम्बन्ध निर्धारित करते है।चाटुकारिता के लिए आप अपने आप को किट फिट मानते है उस हिसाब से आप अंक लेने के लिए तैयार रहे। आपकी मेहनत को देखने के लिए प्रोफेसर के पास समय नही है। वो बस आपके चाटुकारिता का लेवल सिर्फ जानना चाहते है। क्लासरूम की परफॉरमेंस से ज्यादा जरुरी होता है आपका उनके केबिन में जाकर हाजिरी का परफॉरमेंस।छात्र कई बार सवाल का उत्तर ढूंढने में मेहनत नही करता है, जितना वह सवाल बनाने में मेहनत करता है ताकि वह प्रोफेसर से इस सवाल के जरिये अपने सम्बन्ध की शुरुवात कर सके। आप प्रोफेसर के पसंदीदा छात्र इसलिये कतई नही है की आप एक मेहनती, जरूरतमंद, मेधावी है, आप इसलिए उनके चहेते है, क्योकि आप कुछ विशिष्ट गुण लेकर पैदा हुए है, जेसे की आप उनके स्वजाति के है, जिससे आप चाचा , ताऊ के रिश्ते बहुत ही आसानी से बना सके, आप उनके विचारधारा से जुड़े हुए है,या उनके पार्टी विचारधारा (बीजेपी, कांग्रेस, लेफ्ट)के लिए काम करते है, यानी आप झंडा ढोने में बिश्वाश रखते है, आप बहुत ही अच्छे चाटुकार है, केबिन में हर दिन की आप उपस्थित होने के लिए तैयार है। यह सब विशिष्ट लक्षण आपको अच्छे अंक ही दिलाने में नही सहायक है, वरन् आपको आगे की पढ़ाई और नौकरी दिलवाने में भी सहायक हो सकती है। एक छात्र जो एक उम्मीद, एक अच्छे भविस्य की सोच के साथ अपना कदम उच्च शिक्षा की ओर बढ़ाता है क्या वह यह करने के लिए मजबूर नही होता। क्या वह खुद की बुद्धिमता को गिरवी नही रखता, क्या जो इस चाटुकारिता की जाल से दूर रहता है, क्या वह अपने सपनो का गला नही घोट रहा होता है। बार बार जेहन में यह सवाल आता है, की पढाई जरुरी है या चाटुकारिता। अगर सफल होना है तो किसका कितना प्रतिशत लेकर आगे बढ़े, ज्यादा पढ़े या ज्यादा चाटुकारिता करे। कुछ कहते है दोनों को साथ लेकर चलना ही यथार्थ है। तब हँसी आती है और जबाब यही निकलता है की आप अपने आप को कितना फिट मानते है इन सब चीजो में इस यथार्थ के साथ कदम बढ़ाये।
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