मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Tuesday, September 8, 2015

उड़ रहा था मैं ख्वाबो में 
सोया था माँ की बाँहो में
ममता भरी माँ की लोरी थी
दूर चंदा मामा थे
पास दूध कटोरी थी
रंग बिरंगे सपने थे
कल तक सब मेरे अपने थे
एक पानी का सैलाब था
माँ के थपेड़े जैसा ही ख्वाब था
कुछ टूटे थे तारे,कुछ छूटे थे प्यारे
क्या माँ ने मुझे जगाया था
क्या माँ ने मुझे बुलाया था
पर मैं अब भी क्यों ख्वाबो में था
क्यों बदहवास पानी के सैलाबो में था
उठना चाहा था,खोली कई बार आँखें
देख सकु दूर किनारे अपनों को
देख सकु सारे छुटते सपनो को
एक पुकार दो माँ अब मुझे
जाग सकु बेबस नींद से।
फिर खिलखिला सकु मैं तुम संग
कुछ टूटे फूटे लफ्जो में

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