मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Saturday, March 19, 2016

देख बहारें होली की / नज़ीर अकबराबादी


नजीर अकबराबादी  उर्दू कविता और शायरी में नायब पहचान रखते है। 1830  में जन्मे नजीर               "नज्म के पिता " के रूप में जाने जाते है। अपनी रचना "बंजरनामा" से उन्होंने ख्याति प्राप्त की ।

                                                      नजीर अकबराबादी 

देख बहारें होली की / नज़ीर अकबराबादी
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जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की
गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।
और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।
ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।।


नासमझ था जो समझदारी की बात किया करता था,,,,, रंजन कुमार\




  • रंजन कुमार
    एक युवा कवि, जो NIIT ROURKELA के छात्र्  है। कविताये और शायरी लिखने का शौक इन्हे हमेशा से रहा है। विज्ञान की कक्षा के बाहर जब प्रकृति के क़रीब जाते है, तो अपने आप को शब्दो को गढ़ने में बेचैन हो जाते है। पढ़िए उनकी कविता......


नासमझ था जो समझदारी की बात किया करता था,
समझ आ गया खुद को समझा कर;
की नासमझ इतनी नहीं ये दुनिया,
कि खुद को समझ ना सके कोई;
या किसी समझदार की शायद इसे जरुरत नहीं |
यहीं हो रहा है दुनिया में;
कि कोई बेवक़ूफ़ लगता है -
जो किसी और की दामन
बचाने की कोशिश करता है;
वो लूट जाता है हमेशा
जो लुटेरों की शिकायत करता है;
है दौलत उसी की, है शोहरत उसी की,
जो खुद का ईमान बेचता है |
यक़ीन ना हो तो जा के पूछो उनसे -
जो तख़्त चलाते हैं ;
क्या कभी झूठ बोला है उन्होंने?
क्या कभी चोरी की है उन्होंने?
अरे उनका तो हर काम बेपर्दा है,
उनकी कमीज़ से लेकर उनके गलीच तक;
सब जनता जानती है ,सब जनता मानती है |
यक़ीन ना हो तो पूछो उनसे -
जो बाजार चलाते है ,
क्या कोई नकली माल बेचा है ?
क्या किसी को नुकसान हुआ है ?
उनके दुकान से लेकर उनके गोदाम तक;
सब जनता जानती है, सब जनता मानती है |
अरे छोड़ो भी इनकी थाह लेना -
कभी फुरसत मिले तो
खुद से पूछ लेना,
क्या कभी तुमने भी बचपन जिया था?
क्या कभी तुम्हे भी दुनिया साफ़ नजर आती थी ?
क्या कभी तुम भी बड़े होने लगे थे खुद को समझा कर ?
अब तो तुम समझदार हो गए हो,
हाँ मैं ही नासमझ था जो तुम्हें समझा रहा था.....

Wednesday, March 9, 2016

प्रिय श्रुति............

प्रिय श्रुति
कल सरस्वती पूजा के पंडाल में देखा। कई साल बाद तुम्हे देख रहा था, बिलकुल नही बदली हो, हां थोड़ी मोटी जरूर हो गयी हो, और मैं तुम्हारी याद में सुख के छुहारा। तुम हरी ड्रेस में बहुत खूबसूरत लग रही थी, बिलकुल माधुरी दीक्षित। ऐसे लग रहा था मानो सरसों खेत में तुम पिला फूल बन लहलहा रही हो। तुम्हारी याद में आज सुबह से कुमार सानु का गाना सुन रहा
...मेरा दिल भी कितना पागल है...
आज वैलेंटाइन डे है, घर के काम से फुरसत मिले तो छत पर आना, और आज के दिन मेहँदी मत लगाना, पिछली बार दिल्ली में कोई लड़की नही लगायी थी। आज दिन भर हम छत पर कुर्सी लगा आसन जमा के बैठे रहेंगे, तुमको एक बार देख लेते है तो ठण्ड में बिलकुल च्यवनप्राश जैसा काम करता है।
छठ में ख़रीदा हुआ कुर्ता आज पहने है जो तुमको हमेशा पसन्द आता था। तुम भी वही हरा ड्रेस पहन निकलना। देखो कहि हम बेहोश न हो जाये...
इस बार भी अपने हाथ का बना पराठा और आलू का कड़क भुजिया बना कर भेज देना..
आज शाम आऊंगा साइकिल मांगने , गेट खोलने जरूर आना। जब तुम पूछती हो "कैसे हो" "कब आये?" तो भूल जाता हु खुद को, भूल जाता हु कैसा हु। बस जी करता है गले लगा कर फफक कर रो पडू। पर तुम कौन सा कंधे पर सर रखकर चुप कराओगी, सॉरी ताने नही मार रहा। दिल्ली की CCTV और यहाँ तुम्हारे बापू दोनों एक ही काम करते है।
लिखते लिखते कुमार सानु का दूसरा गाना भी चालू हो गया..
...धीरे धीरे से मेरी जिंदगी में आना.....

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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