मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Tuesday, November 3, 2015

नवम्बर की डायरी

नवम्बर की डायरी से।

#लप्रेक

नवम्बर का महीना शुरू होते ही प्रेमी प्रेमिका की घनिष्टता बढ़ जाती है,वजह ठण्ड से ज्यादा एग्जाम  होता है। सिंगल इंटेलीजेंट छात्र के लिए भी यह महीना लाटरी की तरह होता है।
कई कदम साथ चलते चलते उसने पूछा ,सिगरेट पीते हो?
पूछ रही हो या ऑफर कर रही हो, अगर पूछ रही हो तो ना, अगर ऑफर है तो हां(डॉयलॉग जल्दबाजी में बोल गया, सोचा पसन्द आएगा)
लेकिन कुछ खास असर नही किया, तबतक वह सिगरेट जला कर बढ़ा चुकी थी।
सिगरेट की धुएं के साथ , पढ़ाई धुँऑ धुँआ और प्यार राख़ की तरह निकल कर आने लगा।
रिक्शा वाले ने पटेलचेस्ट से विस्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन  तक की दुरी को ज्यादा कर दिया था। ठण्ड का मौसम, शाम का समय और लोगो का अंदेखापन भरपूर साथ दे रहा था।
रात भर जग जग कर पढ़ना और पढ़ाने का सिलसिला शूरू हो चला था। उसने बेस्ट फ्रेण्ड का दर्जा दे दिया था। मैं भी शब्दों से ज्यादा भाव में बिस्वास की गुंजाइस समझी। नवम्बर की डायरी में कहानी वहा जाकर रुकी जब मैं उसे 4 दिन के प्यार की तरह याद करने लगा और वह मुझे 4 नम्बर वाला।

(सर्द की धुप , चाय, और लप्रेक)

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