मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Tuesday, March 28, 2017

कविता : "चाय पर इश्क़"

ishq with chai
  
 चाय का क्या दोष, 
जो अक्सर बहस राजनीती का छिड़ जाता है
इश्क़ की बात जैसे
शराब की आधी बोतल खत्म करने पर आता है
चाय को गुस्सा इस बात का
वह कब इश्क़ की बात सुन पायेगा
इश्क़ जो पहुँचा कॉफ़ी तक
चाय पर कब तक आएगा
कब प्रेमी पूछेगा , चाय पर चले
इस सर्द की मौसम और शाम ढले
चाय की घूंट के साथ
होगी इश्क़ की शुरुआत
थोड़ा चीनी का घुलेगा मिठास
थोड़ा इश्क का होगा एहसास
प्रेमी आँखों में डाले आँखे
चाय की घूँट लगायेगा
प्रेमिका के शर्माने पर
थोड़ा वो मुस्कुराएगा
चाय को तब होगी दिली तस्सली
कल से "चाय पर इश्क़" का जिक्र जो आएगा
इश्क़ का जमेगा अड्डा
इश्कबाज आएंगे
किसी में अदरख ज्यादा
किसी में इलायची कम फरमाएंगे
प्रेमिका को खुश करने को
छोटू को 5 का एक्स्ट्रा टीप दे जायेंगे
इस इश्क़ की भरी दुनिया में अब
इश्क़ इश्क़ हो जायेगा
ग्लास वाला कप भी अब
कुल्हड़ संग खिलखियायेगा
चाय की शिकायतें अब दूर हो जाएंगी
प्रेमिका जो प्रेमी से शिकायत चाय पर फ़र्मायेंगी
प्रेमी भी रूठेगा थोड़ा,
चाय के फिर  दो नये कप आएँगे
मुश्कुराकर दोनों चुस्कियां लगायेंगे
कहानियां अब इश्क़ और चाय पर लिखी जायेगी
चाय की सारी शिकायते भी अब दूर हो जाएंगी
वह अब रोज इश्क़ की बात सुन पायेगा
कॉफ़ी तक जो पंहुचा इश्क़,
चाय तक भी पहुँच जाएगा...




गौरव...

credit:google

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