मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Friday, January 5, 2018

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट
कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को
बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था
और मेरे ब्याह के समय भी

बहुत जिद के बाद भी
कभी नया कोट नहीं पहना उन्होंने
गहरा नीला रंग मलिन हो गया
पर कोट पर लोहा होता रहा
और कंधे पर चढ़ जाता था
बड़े शान से ये  नीला कोट

कमर झुकने के बाद भी
सिर  सीधा रहता था , और
आँखों में चमक बना रहा
जैसे असंख्य सपने चमक रहे हो
मैं उनके आँखों में दवा डालने के बहाने
निहार लिया करता हूँ उन सपनो को
जिसे पूरा करने की कोशिश चुपके चुपके करता रहा
धीमी चाल उनकी आदत थी
वो कहते थे, 
इससे लड़खड़ा कर  गिरने से बचा जा सकता हैं।



एक रोज उनके मृत्यु के बाद
मैंने वही  नीला कोट पहना
और  महसूस कर रहा था
कंधे पर एक अदृश्य छुअन
जैसे पिता मेरे हर सफलताओ पर
मेर कंधे को मजबूती से थपथपा दिया करते थे। 
सब ने कहा ,
मैं बाबू जी जैसा दिखने लगा हूँ इस नीले  कोट में
और मैं अपनी आँखों मे  वही चमक  महसूस  रहा हूँ














Saturday, October 28, 2017

बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन-


बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है
सीधी नीली रेखा नहीं भींगी आँसुओ से
ना काली स्याही ने रंग छोड़ा पन्नो पर
खिड़की पर नही आयी कोई गौरैया
ना ही बारिश के झोंके से परेशान
मैंने बन्द किया खिड़कियों को..
हड्डियों में चुभती बर्फीली हवा
मेज पर रखे किताबों को बेवजह पलट रही है
मुझे इसमें कोई रस नही
ना ही खीज है, ना ही गुदगुदाहट..
जैसे मेरा यह समय
किसी अंधे की आंखों की पुतलियां हो..
देखता हूँ तस्वीर , दराज से निकालकर
रख देता हूँ, स्मृतियों में बिना यात्रा किये
ये दिल ना जाने, कौन से ज़िद पे अड़ा है
बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है..

मैं चाहता हूँ

कोई ठहर गया है इन आँखों मे ऐसे
जैसे ठहरा गया हो ओंस हरे दुभ पर,
जैसे ठहर गया हो शब्द, कलम की नोख पर
और जैसे सदियों इंतेजार के बाद आकर कोई,
ठिठक गया हो दरवाजे के उस जानिब..
मैं चाहता हूँ ..हवा के बहते ही
ओंस गिर पड़े मिट्टी पर
स्याही बह जाये पन्नो पर
शब्दों के साथ या शब्दों के बिना..
और ,जो आकर ठिठक गया है वो लौटें नही..
दरवाजे के खुलते ही,
लिपट जाये इस जिस्म से
और घुल जाये मन में..
मैं चाहता हूँ, जो ठहर गया है इन आँखों मे
हवा के बहते ही , भभक कर गिर जाये गालों पर
ठीक वैसे ही जैसे घाव में एक चीरा लगते ही
फर्श लाल हो गया हो
और घण्टों बाद आंख खुलने पर
दर्द कुछ कम महसूस होता हो...

Tuesday, August 8, 2017

कविता - काका दुःखी है..

 
काका दुःखी है
उनका गाँव शहर हो रहा
बिजली की तारे जब से दौड़ी है आसमान में
लालटेन किसी कमरे में दुबका पड़ा है
रोज शाम को उठते है काका
पेंदी में तेल भरने को
फिर निराश बैठ जाते है अहाते में
भक्क से जलता बल्ब 
कहते है, उनकी आँखें चुभती है
सड़क अब भींगता है
पर बिना खुश्बू के
तारकोल की सड़कें 
जलाते है पैर उनके
चप्पलें बांधती है सांसे उनकी
भागे भागे फिरते है

ठंड में नही जलता घूरा
नही लगता कोई बैठक
सन्नाटा पसरा दुआर पर
काका बीनते है पनिआई आंखों से 
कुछ किस्से जब गाँव सिर्फ गाँव था
दुआर का कुआँ सुना पड़ा है
बाल्टी दूर उल्टी पड़ी है
अब नही लगता औरतों का झुण्ड
नही होती हंसी ठिठोली खींचा तानी
सभ्य हो गये है सब 
और गम्भीर भी
बच्चे नही खेलते आस पास
महँगे खेल कमरे तक रखता है उनको
रिश्तों में लक्ष्मण रेखाएँ खींच आयी है
सब अपने अपने घेरे में सुरक्षित है


रेलगाड़ी से चलकर
आ रहे नये नये
रहन - सहन
नयी - नयी 
बोली - भाषा
काका, उन्हें नही पहचानते
वो काका को नही पहचानते
दोनों चुप्प है और पसरा है सन्नाटा

कल आये थे कुछ शहरी
भूखे आंखों से देख रहे थे खेत को
कहते है धुँआ फेंकता चिमनी लगेगा
आसपास पक्के मकान बनेंगे
पगडंडियों को ईंट से छुपा दिया जायेगा
बड़ी गाड़ियां सरपट दौड़ेंगी
हस्पताल , इस्कूल सब खुलेगा
तस्वीर बदल जाएगी गाँव की

काका दुःखी है
उनका गाँव अब उनका नही रहेगा
गाँव ,शहर हो जायेगा
शहर शहरी लोगों का होगा
काका अकेले रह जाएंगे गाँव मे

यू ही टटोलते समय को
विदा हो लेने के इंतजार में
                                      
                                                

Saturday, August 5, 2017

तुम्हारी यादें

तुम्हारी यादें हरी घास सी है
जो मेरे मन के जमीन पर
बेमौसम उग आया करती है...
तुम्हारी यादें गौरैये का झुंड है
जो हर ढलते शाम में
मेरे नींद के घोंसले में आ आ जाया करती है
तुम्हारी यादें सीधी जाती सड़क पर
उल्टी यात्राएँ है
जो बेवजह है , पर खूबसूरत है
तुम्हारी यादें एक घाटी है
जो दो पहाड़ो को जोड़ती है
जैसे मैं और तुम..
तुम्हारी यादें
हिमाचल के पर्वतो पर उड़ते बादल है
जो बरस जाते है मेरी आँखों से अचानक
तुम्हारी यादें
सेमर की रुई है
जिसे मैं अपने खुले हथेलियों पर रख छोड़ता हूँ
बेपरवाह उड़ने को
तुम्हारी यादें गर्म चाय सी है
जो मेरे मन के प्याले में भरा रहता है हमेशा
तुम्हारी यादें
धूप सी छलांग है
जो तय करती है पलक झपकते मीलो दूरियाँ
तुम्हारी यादें
एक खूबसूरत सफर है
जिसे मंजिल तक पहुंचने की जल्दी नही..


Thursday, July 6, 2017

वक़्त: kavita

कुछ चीजें वक़्त के साथ
खूबसूरत दिखती है
जैसे इस कमरे का सन्नाटा,
सिगरेट की पहली कश
और,तुम्हारी लिखी डायरी
डायरी के चौथे पेज पर
तुम्हारे गिरे आँसु से अक्षर का फ़ैल जाना...
खुरदुरी उँगलियो से
उस बिखरे अक्षर को
महसूस करता हूँ..
एक चेहरा गुजरता है
बंद आँखों के सामने
वही सुर्ख लाल होठ
जिसे मैं पहली दफा चुम कर शरमा गया था..
कोने में पड़ी, काठ की कुर्सी,
टेबल लैंप की पीली लाइट
ये सीलन भरी दिवार...
जिस पर टँगा है खाली फोटो फ्रेम
जिसकी कील हमने मिल कर ठोके थे
आलमारी में धूल फांकती किताबे..
टैगोर का वह गीत,
तुम अक्सर गुनगुनाया करती थी

ओ माँ,
फागुने तोर अमेर बोने
घ्राने पागल कोरे,
मोरी हए, हए रे...
इसे सुनने के लिये रेडियो का मीटर
घण्टो घुमाया करता हूँ..
सोच रहा , इसे गुनगुनाते हुये
दो कप चाय बना लूँ
जानता हूँ,
दूसरा कप भरा रहेगा पूरी रात तक
पर कुछ चीजें खूबसूरत जो दिखती है।
यादों की ढेर से हर कोना भरा हुआ है..
तुम्हारे हथेलियों के निशान
दर्ज है, बिस्तर की सिलवटों में
ऐशट्रे से गिरकर फर्श पर बिखरी राख
तुम्हारे साथ गुजारे हर उस रात की याद है
मैं डरता हूँ..
लंबे समय से बिखरे,
इस कमरे को ठीक करने से
ये मुझे एहसास दिलाती है
तुम्हारी कमी और मैं अस्तव्यस्त हूँ
ठीक इस कमरे की तरह...

#somewriting



“No matter how much suffering you went through, you never wanted to let go of those memories.” 

Wednesday, May 17, 2017

इक दिन मैं मर गया

बिना सब कुछ कहे
इक दिन मैं मर गया
पर बुरा तब हुआ जब,
अपने ही लाश के सामने ठहर गया
मेरी माशूक मेरे सीने से लग रोती रही
जो था सुबह,ढल कर वो शाम होती रही
मैं चाह कर भी उससे लिपट न सका
बहुत कुछ था कहना, पर कुछ कह न सका
दोस्त मुझसे विदा होने लगे
रिश्ते- नाते सब चुटकियों में खोने लगे
मेरी कविताओं को किसी ने फाड़ फेका था
मेरे काले चमड़ीयों को उखाड़ फेंका था
मेरे सिर को जब आग में फोड़ा गया
मेरे हड्डियो को तर बतर तोडा गया
मैं अधूरी कविताओं पर आँसू बहा रहा था
अब भी उनका काफ़िया मिला रहा था
देखा हाथ तो मेरा जल चूका है
कलम ये उँगलियाँ पकड़ ना पाएँगी
ये पन्ने अभागे है,नज्मअब कैसे पूरी हो पाएँगी?
कंठ सुख रहा था, डर कर काँपने लगा
मीलों दौड़ा उस रोज, थक कर हांफने लगा

सोचा माँ की आवाज सुन अब मैं जग जाऊंगा
उससे लिपट कर रोऊंगा,सारा किस्सा सुनाऊंगा
उस रोज आखिरी दफा मुस्कराया था
खुद को खूब बहलाया था

काश ये रात का इक सपना ही हो
दू झटका इस जिस्म को,
फिर सब कुछ अपना ही हो
पर हकीकत तो यही था,और मैं सिहर गया
बिना सब कुछ कहे, इक दिन मैं मर गया।



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नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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