मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Tuesday, October 20, 2015

अन्ना

#लप्रेक
रामलीला मैदान चले उसने बड़ी तेज आवाज में बोला था।
तुम कब से इतनी क्रन्तिकारी हो गयी हो।
जब से अन्ना ने हमे प्यार करने का नया तरीका दिया है।
नारो के बिच में जब तुमने चिल्ला कर आई लव यू बोला था, और मैंने क्रन्तिकारी मुस्कान में हामी भर दी थी। तुम खादी के कुर्ते और गांधी टोपी में स्मार्ट लगते थे|
अन्ना को मै थैंक्स कहती हु, वो न होते तो आज हम दोनों न होते।
अन्ना को ख़त लिखो न राजनीती के बदलते नए मिजाज को लेकर, शायद पुराने दिनों को हम फिर जी सके।
लिखती हु.....
dear anna....

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