मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Monday, November 16, 2015

शिक्षा और चाटुकारिता

एक छोटे शहर से  जब एक छात्र आता है तो खुद के सपनो के साथ घरवालो की उम्मीदों का बोझ भी ढो रहा होता है, जल्दी नौकरी की उपापोह में आपने आपको हर वक़्त पाता है। यह यथार्थ है, आपको भाउक करने की उम्मीद से लिखे जाने का कारन नही । उच्च शिक्षा और छोटे शहर  का तालमेल बहुत कम देखने को मिलता है।छोटे शहरो के छात्रो के साथ समस्या यह होती है की वह उच्च शिक्षा को महत्व बहुत कम देते है, क्योकि घर की जरूरत उन्हें जल्दीसे जल्दी नौकरी लेने को बाध्य करती रहती है। अगर कोई छात्र उच्च शिक्षा की और अपना कदम बढ़ाता  है तो उनकी उनके विषय के पीछे की रूचि होती है। अपने विषय में कुछ अच्छा , कुछ नया करने की उम्मीद। पर हमारी खोखली शिक्षा प्रणाली क्या उनके सपनो और उम्मीदों को पंख दे पाती है। उनकी मेहनत , उनके सपने क्या चाटुकारी व्यवस्था के पैरो तले कुचले हुए  नही पाये जाते है।
इस ब्लॉग को लिखने के पीछे का मकसद यही रहा की बिख्यात विश्वविधालय में पढ़ रहे छात्र की मनोदशा से वाकिफ कराउ आपको।

जब मैं देखता हु दिल्ली विश्वविद्यालय ,राजनीतिशास्त्र के मास्टर्स में नामांकित 600 बच्चों का अंधकारमय भविस्य।हर साल यहाँ तकरीबन 600 बच्चे नामंकित होते है मास्टर्स में। जिसमे मास्टर्स कम्प्लीट करते करते तकरीबन 400 बचते है,200 बच्चे फेल होते है हर साल। अब बचे हुए छात्र अपनी आगे की किस्मत कहा देखते है,जब इसपर गौर करे तो हम पाते है। 400 में से तकरीबन 20 छात्र बिभाग के एमफिल  की  पढ़ाई में चयनित होते है।बाकि के 380 छात्रो को नौकरी दिलवाने में बिभाग असक्षम है, अब यह छात्र आई ए इस, ssc , या अलग प्रतियोगी परीक्षाओ में किश्मत आजमाते है जिसमे अनुमानत: 50 बच्चे नोकरी पाते है बचे तकरीबन 330 बच्चों का भविस्य एक  विषय के मास्टर्स होने पर भी क्या होता है, किसी को पता नही। उनका एक विषय में मास्टर्स होना कितना सफल और कितना सहायक होता है, यह सिर्फ वही जानते है।हमारी शिक्षा की इस व्यवस्था का एक पहलु आपने पढ़ा। दूसरा पहलु शायद एक शिक्षाव्यवस्था, हमारे तथाकथित विद्वानों के मुह पर तमाचा है। समस्या छात्र सिर्फ इन्ही लेवल पर नही झेलता। छात्र अपने पढाई पर मेहनत से ज्यादा वह प्रोफेसर के केबिन के चक्कर लगाने में ज्यादा मेहनत करता हुआ पाया जाता है। अच्छे अंक का पैमाना आपकी मेहनत, आपके द्वारा लिखे गए उत्तर निर्धारित नही कर रहे होते है, यह निर्धारण आपके और प्रोफेसर के बिच के व्यक्तिगत सम्बन्ध निर्धारित करते है।चाटुकारिता के लिए आप अपने आप को किट फिट मानते है उस हिसाब से आप अंक लेने के लिए तैयार रहे। आपकी मेहनत को देखने के लिए प्रोफेसर के पास समय नही है। वो बस आपके चाटुकारिता का लेवल सिर्फ जानना चाहते है। क्लासरूम की परफॉरमेंस से ज्यादा जरुरी होता है आपका उनके केबिन में जाकर हाजिरी का परफॉरमेंस।छात्र कई बार सवाल का उत्तर ढूंढने में मेहनत नही करता है, जितना वह सवाल बनाने में मेहनत करता है ताकि वह प्रोफेसर से इस सवाल के जरिये अपने सम्बन्ध की शुरुवात कर सके। आप प्रोफेसर के पसंदीदा छात्र इसलिये कतई नही है की आप एक मेहनती, जरूरतमंद, मेधावी है, आप इसलिए उनके चहेते है, क्योकि आप कुछ विशिष्ट गुण लेकर पैदा हुए है, जेसे की आप उनके स्वजाति के है, जिससे आप चाचा , ताऊ के रिश्ते बहुत ही आसानी से बना सके, आप उनके विचारधारा से जुड़े हुए है,या उनके पार्टी विचारधारा (बीजेपी, कांग्रेस, लेफ्ट)के लिए काम करते है, यानी आप झंडा ढोने में बिश्वाश रखते है, आप बहुत ही अच्छे चाटुकार है, केबिन में हर दिन की आप उपस्थित होने के लिए तैयार है। यह सब विशिष्ट लक्षण आपको अच्छे अंक ही दिलाने में नही सहायक है, वरन्  आपको आगे की पढ़ाई और नौकरी दिलवाने में भी सहायक हो सकती है। एक  छात्र जो एक उम्मीद, एक अच्छे भविस्य की सोच के साथ अपना कदम उच्च शिक्षा की ओर बढ़ाता है क्या वह यह करने के लिए मजबूर नही होता। क्या वह खुद की बुद्धिमता को गिरवी नही रखता, क्या जो इस चाटुकारिता की जाल से दूर रहता है, क्या वह अपने सपनो का गला नही घोट रहा होता है।  बार बार जेहन में यह सवाल आता है, की पढाई जरुरी है या चाटुकारिता। अगर सफल होना है तो किसका कितना प्रतिशत लेकर आगे बढ़े, ज्यादा पढ़े या ज्यादा चाटुकारिता करे। कुछ कहते है दोनों को साथ लेकर चलना ही यथार्थ है। तब हँसी आती है और जबाब यही निकलता  है की आप अपने आप को कितना फिट मानते है इन सब चीजो में इस यथार्थ के साथ कदम बढ़ाये।

Thursday, November 5, 2015

नाम क्या है तुम्हारा?

नारेबाजी की बढ़ती आवाज में उसने चिल्ला कर पूछ लिया ,नाम क्या है तुम्हारा?
क्या ?नाम नाम !
मैं नाम बताने जा ही रहा था तबतक पीछे से भीड़ की धक्कामुकि में उसने मेरी पांच उंगलियो के बिच में अपनी उंगलियो को फसा कर नारेबाजी शुरू कर दी।
छात्रो की भीड़ ITO से शास्त्री भवन की ओर बढ़ रही थी। सफ़र लंबा था, भीड़ जितनी धक्का देती उसकी पकड़ मेरी उंगलियो के बिच उतनी ही तेज हो जाती। एक हाथ को हवा में उठा कर चीखती हुई ललकार रही थी, सरकार के बिरुद्ध रौद्र रूप था उसका।पर ऊपर से सख्त उतनी ही अंदर से कोमल सी लगी।
कौन सी पार्टी से हो?
किसी से भी नही!
कौन से यूनिवर्सिटी से हो?
दिल्ली, दिल्ली यूनिवर्सिटी
ह्म्म्म्म्म्म फिर नारेबाजी
मै भी हाथ को पकड़े उसके आवाज में आवाज मिला रहा था।
बिच रास्ते में बैरिकेड था।छात्रो की भीड़  उसे तोड़ने की कोशिश कर रही थी।चन्द पल के लिए मैं अपने आप को हीरो, उसे हीरोइन और पुलिस को उसका पिता समझने लगा।पुलिस की भीड़ छात्रो को पकड़ पकड़ बस में ठूसने लगी।अफरा तफरी मचने लगा। मेरे हाथ से उसका हाथ छुटने चूका था।तबतक भीड़ में गुम हो गयी वो,अपने नाम के साथ।
, पर कुछ छोड़ गयी थी मेरे पास अपनी आवाज।बार बार भीड़ में सुनने की कोशिश करता रहा पर नाकामयाब था। बार बार अफ़सोस सता रहा था की मैं हिम्मत कर क्यों न पूछ पाया, नाम क्या है तुम्हारा? शायद अधूरी शुरुवात को फेसबुक पर तो पूरी करता। हम सरकार से जित चुके थे, पर मैं फिर भी हारे मन से वापस लौट रहा था। बार बार गूंज रहे थे उसके पहले शब्द, नाम क्या है तुम्हारा?

Tuesday, November 3, 2015

नवम्बर की डायरी

नवम्बर की डायरी से।

#लप्रेक

नवम्बर का महीना शुरू होते ही प्रेमी प्रेमिका की घनिष्टता बढ़ जाती है,वजह ठण्ड से ज्यादा एग्जाम  होता है। सिंगल इंटेलीजेंट छात्र के लिए भी यह महीना लाटरी की तरह होता है।
कई कदम साथ चलते चलते उसने पूछा ,सिगरेट पीते हो?
पूछ रही हो या ऑफर कर रही हो, अगर पूछ रही हो तो ना, अगर ऑफर है तो हां(डॉयलॉग जल्दबाजी में बोल गया, सोचा पसन्द आएगा)
लेकिन कुछ खास असर नही किया, तबतक वह सिगरेट जला कर बढ़ा चुकी थी।
सिगरेट की धुएं के साथ , पढ़ाई धुँऑ धुँआ और प्यार राख़ की तरह निकल कर आने लगा।
रिक्शा वाले ने पटेलचेस्ट से विस्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन  तक की दुरी को ज्यादा कर दिया था। ठण्ड का मौसम, शाम का समय और लोगो का अंदेखापन भरपूर साथ दे रहा था।
रात भर जग जग कर पढ़ना और पढ़ाने का सिलसिला शूरू हो चला था। उसने बेस्ट फ्रेण्ड का दर्जा दे दिया था। मैं भी शब्दों से ज्यादा भाव में बिस्वास की गुंजाइस समझी। नवम्बर की डायरी में कहानी वहा जाकर रुकी जब मैं उसे 4 दिन के प्यार की तरह याद करने लगा और वह मुझे 4 नम्बर वाला।

(सर्द की धुप , चाय, और लप्रेक)

Sunday, November 1, 2015

पासवर्ड इन लव

नवम्बर की डायरी से एक और,
जिस फेसबुक के जरिये फ्रेंड रिक्वेस्ट से लेकर लव एक्सेप्ट तक का सफ़र तय किया था, जब रोमिंग में फ़ेसबुक के जरिये ही पास होने का एहसास बरकरार रहता था, तब उसी फेसबुक के एक पासवर्ड मांगने की वजह से रिश्ते सीसे की तरह टूटते नजर आये।
दिल पर पत्थर रख कर कहा था मैंने ,भूल सा गया हु,पर जब उसने कहा,
मुझे भी भूल जाओ और जाने को पलटी तो सिद्धान्तों, जज्बातों से समझौता करना पड़ गया|
फिर उसने अपने आप से समझौता कर ब्लाक का बटन दबा ही दिया था, वह जल्दी निर्णय लेती थी,यही बात पसंद भी आती थी। पर कभी पसंद आती चीज नापसंद भी आ सकती है।
सोचता हु काश प्यार चिट्ठी से शुरू किया होता|
(सर्द, चाय और लप्रेक तीनो का आनंद ले)

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

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