मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, July 6, 2017

वक़्त: kavita

कुछ चीजें वक़्त के साथ
खूबसूरत दिखती है
जैसे इस कमरे का सन्नाटा,
सिगरेट की पहली कश
और,तुम्हारी लिखी डायरी
डायरी के चौथे पेज पर
तुम्हारे गिरे आँसु से अक्षर का फ़ैल जाना...
खुरदुरी उँगलियो से
उस बिखरे अक्षर को
महसूस करता हूँ..
एक चेहरा गुजरता है
बंद आँखों के सामने
वही सुर्ख लाल होठ
जिसे मैं पहली दफा चुम कर शरमा गया था..
कोने में पड़ी, काठ की कुर्सी,
टेबल लैंप की पीली लाइट
ये सीलन भरी दिवार...
जिस पर टँगा है खाली फोटो फ्रेम
जिसकी कील हमने मिल कर ठोके थे
आलमारी में धूल फांकती किताबे..
टैगोर का वह गीत,
तुम अक्सर गुनगुनाया करती थी

ओ माँ,
फागुने तोर अमेर बोने
घ्राने पागल कोरे,
मोरी हए, हए रे...
इसे सुनने के लिये रेडियो का मीटर
घण्टो घुमाया करता हूँ..
सोच रहा , इसे गुनगुनाते हुये
दो कप चाय बना लूँ
जानता हूँ,
दूसरा कप भरा रहेगा पूरी रात तक
पर कुछ चीजें खूबसूरत जो दिखती है।
यादों की ढेर से हर कोना भरा हुआ है..
तुम्हारे हथेलियों के निशान
दर्ज है, बिस्तर की सिलवटों में
ऐशट्रे से गिरकर फर्श पर बिखरी राख
तुम्हारे साथ गुजारे हर उस रात की याद है
मैं डरता हूँ..
लंबे समय से बिखरे,
इस कमरे को ठीक करने से
ये मुझे एहसास दिलाती है
तुम्हारी कमी और मैं अस्तव्यस्त हूँ
ठीक इस कमरे की तरह...

#somewriting



“No matter how much suffering you went through, you never wanted to let go of those memories.” 

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