चलो एक रात भूल जाओ की तुम हिन्दू हो या मुस्लमान ,चलो भूल जाओ की ऐसे कोई सब्द होते भी है समाज में। नींद , इन सब को भूलने का जरिया है जहाँ हमे याद नही रहता की हम हिन्दू है मुस्लमान। भूल जाते है की कल जान लेने किस का दरवाजा खट खटाना है। शायद कल हमे इन बातो पर गौर करना पड़ेगा ज़िस दिन हमने अपने आप को ऐसी व्यवस्था में ढाल लिया तो शायद बेखौफ नींद आने लगेगी। इसी कल्पना में आज अपने बेचैन मन को शांत करने की कोशिश कर रहा।
Friday, October 30, 2015
चलो एक रात भूल जाओ की तुम हिन्दू हो या मुस्लमान ,चलो भूल जाओ की ऐसे कोई सब्द होते भी है समाज में। नींद , इन सब को भूलने का जरिया है जहाँ हमे याद नही रहता की हम हिन्दू है मुस्लमान। भूल जाते है की कल जान लेने किस का दरवाजा खट खटाना है। शायद कल हमे इन बातो पर गौर करना पड़ेगा ज़िस दिन हमने अपने आप को ऐसी व्यवस्था में ढाल लिया तो शायद बेखौफ नींद आने लगेगी। इसी कल्पना में आज अपने बेचैन मन को शांत करने की कोशिश कर रहा।
Wednesday, October 28, 2015
कविता: महंगाई में दाल
डाल डाल, दाल दाल
अरहर, मुंग मसूर दाल
राजनीती में झोल झाल
जनता सारी हाल बेहाल
दिल्ली दिल्ली दाल दाल
महंगाई की मकड़ जाल
नेता पकड़े नब्ज नाल
मरती जनता बदहाल
डाल डाल दाल दाल
किसान मरते सालो साल
कोई नही है देख पाल
सब पूछते एक सवाल
कब आएंगे अच्छे काल
डाल डाल दाल दाल
कम दाल तो पानी डाल
जेसे तैसे पेट पाल
कोई चारा नही अब पांच साल
बस चिल्लाओ अब भइया
दाल दाल दाल दाल
अरहर मोठ मसूर दाल
~गौरव
Monday, October 26, 2015
कशमकश
कभी मौन रह कर भी बाते किया करो
ओह्ह प्लीज़ तुम और तुम्हारी पोएट्री , इतना प्यार करोगे पोएट्री से तो मेरी जरुरत नही रहेगी
मै जरुरत के लिए थोरे ही प्यार किया तुमसे
तो फिर किसलिए किया
क्यों इन सवालो में वक़्त जाया करती हो प्यार को प्यार ही रहने दो , इसे वकील और मुवक्किल की बहश क्यों बनाती हो
तुम मुझसे प्यार करते हो या अपनी पोएट्री से,आखिरी सवाल करती हुँ ।
पोएट्री से , क्योकि मेरी पोएट्री में तुम ही तो होती हो ।
बाते बनाना कोई तुमसे सीखे,
और प्यार का चीड़ फाड़ कोई तुमसे ।
Sunday, October 25, 2015
बालकनी का प्यार
रोज सुबह 10 बजे उठने वाला आज 6 बजे की अलार्म पर उठ गया था। क्योकि रोज इसी समय वह सामने वाली बालकनी में आकर चाय पिया करती थी।उसने अपना समय नही बदला, तो लगा भविष्य देखा जा सकता है। रोज रात पिता जी भविष्य की याद दिलाते तो 6 बजे चाय की कप पकडे वह दिलो दिमाग में खटकने लगती।
दिल्ली दिल वालो का होता है इसी चक्कर में किस्मत आजमा रहा था वो। इस बार घर से एक्स्ट्रा पैसे भी मंगवाया था , नया जैकेट और जीन्स लेना था। घर से जो पिता जी ने खरीद कर भेजा था वह सोते वक़्त पहन कर पिता के प्रेम का कर्ज चूका रहा था। आज भी 6 बजे उठा जैकेट पहना और अंग्रेजी का अखवार लिए सोचा दिल्ली और बिहार का रिश्ता जोर ही लेगा।
वह मुस्कराई थी। पर दिमाग में अचानक दोस्तों की बाते याद आई, की मुस्कुरा कर देखी थी या देख कर मुस्कुराई थी। कुछ भी हो, मुस्कराहट थी इस बात का संतोष था इसे।
जितने धीरे से गुड़ मॉर्निंग कहा था उतने ही जोर से दिल भी धड़क रहा था। जबाब का इंतजार करते करते घंटो बिता दिए। और वह चाय ख़त्म कर के कब का जा चुकी थी।
मेहनती था, लगन शील भी, थोड़ा उदास मन से अलार्म की घंटी पर उठ गया।आज कुहासा ज्यादा था। साफ साफ दिख नही रहा था। सामने देखा खड़ी है। गुस्सा और सदियो का प्यार जताते हुए इसने कहा, गुड़ मार्निंग का जबाब क्यों नही देती आप।मै देर तक इन्तजार करता रहा। डर भी रहा था इसलिए याद किया हुआ कुछ डायलॉग्स भूल गया था। पर बोल दिया। फिर भी बिना किसी जबाब के वही खड़ा रहा। कुछ गौर से देखा था तो चाय का प्याला हाथ में नही था, और वह थोड़ी अलग भी दिख रही थी। प्यार में इंसान अँधा हो जाता है, उसे तब पता चला जब वह अपने प्यार का हक़ ,उसके बजाए उसकी मम्मी पर जता गया था। अगले सुबह मुनिरका से वह निकल पड़ा था किशनगढ़ को नया कमरा देखने।
Tuesday, October 20, 2015
अन्ना
#लप्रेक
रामलीला मैदान चले उसने बड़ी तेज आवाज में बोला था।
तुम कब से इतनी क्रन्तिकारी हो गयी हो।
जब से अन्ना ने हमे प्यार करने का नया तरीका दिया है।
नारो के बिच में जब तुमने चिल्ला कर आई लव यू बोला था, और मैंने क्रन्तिकारी मुस्कान में हामी भर दी थी। तुम खादी के कुर्ते और गांधी टोपी में स्मार्ट लगते थे|
अन्ना को मै थैंक्स कहती हु, वो न होते तो आज हम दोनों न होते।
अन्ना को ख़त लिखो न राजनीती के बदलते नए मिजाज को लेकर, शायद पुराने दिनों को हम फिर जी सके।
लिखती हु.....
dear anna....
Friday, October 9, 2015
कैंटीन की चार नंबर वाली टेबल
समय को नापा तो देखा हम दोनों दो किनारो पर खड़े है, बीच में शांत , सुन्दर नदी बह रही है, जिसे तुम चुपचाप देख रही और मै अपलक निहार रहा । शायद मौन संवाद घट रहा ।
आज मै कैंटीन के उसी चार नंबर वाले टेबल पर बैठा हु , हलकी सर्द भी है , धुप भी बादलो से छन के आ रहे, चाय के कप को भी दोनों हथेलिओं के बीच में पकड़ रखा है, हर २ सेकंड पर चाय की चुस्की से आत्म तृप्ति कर रहा , बस कमी है तो मुझे इस हालत में देख कर हसने वाली की, जो अक्सर खिल खिला कर कहती थी, गँवार । और मै चाय की चुस्कीओ में फिर अपने आप को व्यस्त कर लेता था। कितना अच्छा होता है न, बीते कल को याद करना , हर पन्ने को उलटना , मुस्कुराना, फिर डूब जाना । समय की खूबसूरती भी यही है , वह रूकती नही है, ठहरती नही है, हर पल गुजरती है , ताकि आप बोर न हो समय से। जब दिल चाहे ,पुराने पन्ने पलटे , और एक उदासी भरी चेहरों पर मुस्कराहट की हल्की रेखा खींच डालें ।
आज तुम नही हो तो उसी टेबल पर बैठा बैठा ३ कप चाय भी पी गया , तुम होती तो डोसा जरूर मंगा ळेटा। हां कैंटीन में इसके अलावा पसंद भी क्या था तुम्हे, और मुझे पसंद आता था , साथ मिलने वाला बादाम की चटनी ।आज सोचा चटनी ही माँगा लू , पर मन नही हुआ क्योकि तुम भी तो नही थी जिसे देखकर बादाम की चटनी खाना और भी अच्छा लगता था । भीड़ बढ़ने लगी है, बच्चे हुड़दंग करके कैंटीन में मेरी तरह चाय की चुस्की लेने आ रहे । तुम्हे तो पता है मुझे भीड़ से उतनी ही नफरत है जितना तुम्हे मेरे इस गंवारपन से प्यार । सर्द की धुप , चाय की चुस्की और तुम्हारी याद को अपने डायरी में समेटे इस चार नंबर की कैंटीन की टेबल को छोर जा रहा । आगे की कहानी वही लिखूंगा जहाँ तुम और मै अक्सर चुपचाप बाते किया करते थे, निशब्द हो कर, बिलकुल मौन।
Sunday, October 4, 2015
पटेलचेस्ट
देखो ना क्लास के सन्नाटे में ए सी की हवा भी ज्यादा शोर कर रही है, लड़का कहता है।
तुम कब तक पूंजीवाद, समाजवाद की लड़ाई लड़ते रहोगे, प्रेम का कोई वाद नही होता, लड़की कहती है।
लड़का मुस्कुराकर कार को जाते हुए देखता रहता है।
Thursday, October 1, 2015
हिन्दू और मुसलमान
मैं , मैं नही हूँ।
तुम , तुम नही हो
मैं बस हिन्दू हूँ, और तुम बस मुस्लमान
क्योकि मैं भगवान को मानता हु
और तुम पैगम्बर को
मैं दीवाली मनाता हु और तुम ईद
मैं मन्दिर जाता हु तुम मस्जिद
मैं भजन करता हु तुम आजान पढ़ते हो
सब झूठ की बाते है जो कहते है
हम सब एक है
मुझे तो नही दिखता
जहाँ तुम ज्यादा हो
वहां मैं काँपता हूँ
जहाँ मैं ज्यादा हु
वहा तुम रात भर नही सोते
मन्दिरो पर फेके जाने वाले मांस
मस्जिदों पर फेके जाने वाले मांस
दोनों ही अलग होते है
इसलिए तो कभी तुम जलते हो
और कभी हम जलाये जाते है
पर एक समानता है
हम दोनों ही है हैवान
(पीछे से आवाज आती है)
नाह फिर भी अलग है
मैं हिन्दू हैवान
तुम मुसलमान हैवान
~गौरव
वो मांस का टुकड़ा ही था।
देश विकलांगता के दौर से गुजर रहा। जहाँ हम और आप अंधेपन, और गुँगेपन के बीमारी से ग्रसित होते चले जा रहे। अंधे होकर ही भीड़ का हिस्सा बनते है, क़त्ल करते है, हिंसक होते है, और फिर अंधे होकर घटना से अनजान होते है। हिंसा से पहले मूक रहते है, हिंसा के बाद भी गूंगा रहना ही पसंद करते है। श्री मान डर लगता है, की कब हम और आप इस भीड़ का शिकार हो| कब हम और आप कुचले जाये उस भीड़ से, ईंटो से अपने सर को कुचलते हुए पाये, गर्दन से खून का फवारा जमींन पर फ़ैल रहा हो, और रक्त पान कर रहा हो हजारो की संख्या में आया कोई दरिंदा। मेरी आँखे पड़ी हो दूर ,देख रहा हो हाथो को कटते हुए,लादो को फटते हुए। डरिये,डरना चाहिए। कब तक लाउडस्पीकर की आवाज और व्हाट्सऐप पर खड़ी होती रहेगी भीड़【】कब तक दिए जाते रहेंगे मंदिरो और मस्जिदों से आदेश?सवाल खुद से पूछे एक बार।
कब तक धर्म बनाता रहेगा हमे अँधा। एक मांस के टुकड़े के लिए हम जीवित शरीर को मांस का टुकड़ा बना देते है। हाय रे विडंबना, हम कल भी मौन थे और आज भी मौन हो जाते है, और उसी मौन से साबित कर देते है, everything is fine| कोई मौत नही हुई, किसी ने नही मांगी थी अपने जान की भीख, कोई नही गिड़गिड़ाया था,किसी ने हाथ नही जोड़ा था अपने इज़्ज़त को बचाने को, कोई नही लड़खड़ाया था, कोई घसीटा नही गया था, किसी ने नही तोडा था दम,सड़क पर।
सब अफवाह है,सब झूठ है। बस सच इतना है, की वो मांस का टुकड़ा ही था।
~गौरव
नीला कोट
खूंटे पर टंगा हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...
mai kaun hu?
Gaurow gupta



