मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Saturday, August 5, 2017

तुम्हारी यादें

तुम्हारी यादें हरी घास सी है
जो मेरे मन के जमीन पर
बेमौसम उग आया करती है...
तुम्हारी यादें गौरैये का झुंड है
जो हर ढलते शाम में
मेरे नींद के घोंसले में आ आ जाया करती है
तुम्हारी यादें सीधी जाती सड़क पर
उल्टी यात्राएँ है
जो बेवजह है , पर खूबसूरत है
तुम्हारी यादें एक घाटी है
जो दो पहाड़ो को जोड़ती है
जैसे मैं और तुम..
तुम्हारी यादें
हिमाचल के पर्वतो पर उड़ते बादल है
जो बरस जाते है मेरी आँखों से अचानक
तुम्हारी यादें
सेमर की रुई है
जिसे मैं अपने खुले हथेलियों पर रख छोड़ता हूँ
बेपरवाह उड़ने को
तुम्हारी यादें गर्म चाय सी है
जो मेरे मन के प्याले में भरा रहता है हमेशा
तुम्हारी यादें
धूप सी छलांग है
जो तय करती है पलक झपकते मीलो दूरियाँ
तुम्हारी यादें
एक खूबसूरत सफर है
जिसे मंजिल तक पहुंचने की जल्दी नही..


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