बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है
सीधी नीली रेखा नहीं भींगी आँसुओ से
ना काली स्याही ने रंग छोड़ा पन्नो पर
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है
सीधी नीली रेखा नहीं भींगी आँसुओ से
ना काली स्याही ने रंग छोड़ा पन्नो पर
खिड़की पर नही आयी कोई गौरैया
ना ही बारिश के झोंके से परेशान
मैंने बन्द किया खिड़कियों को..
हड्डियों में चुभती बर्फीली हवा
मेज पर रखे किताबों को बेवजह पलट रही है
मुझे इसमें कोई रस नही
ना ही खीज है, ना ही गुदगुदाहट..
जैसे मेरा यह समय
किसी अंधे की आंखों की पुतलियां हो..
ना ही बारिश के झोंके से परेशान
मैंने बन्द किया खिड़कियों को..
हड्डियों में चुभती बर्फीली हवा
मेज पर रखे किताबों को बेवजह पलट रही है
मुझे इसमें कोई रस नही
ना ही खीज है, ना ही गुदगुदाहट..
जैसे मेरा यह समय
किसी अंधे की आंखों की पुतलियां हो..
देखता हूँ तस्वीर , दराज से निकालकर
रख देता हूँ, स्मृतियों में बिना यात्रा किये
ये दिल ना जाने, कौन से ज़िद पे अड़ा है
रख देता हूँ, स्मृतियों में बिना यात्रा किये
ये दिल ना जाने, कौन से ज़िद पे अड़ा है
बहुत दिनों से बेचैन नही हुआ मन
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है..
डायरी का हर कोना खाली पड़ा है..
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