मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Wednesday, May 17, 2017

मेरी प्रेमिका

 मेरी प्रेमिका
 मेरी एक मात्र हमसफ़र है
मेरे जीवन की।
मैं चलते - चलते थाम लेता हूँ
उँगलियाँ उसकी
जैसे किसी अनजान सफर पर
थाम लेता था, माँ की ऊँगली
खो जाने के डर से...
पिता के मृत्यु के बाद
मेरी गलतियों को सुधारने
का जिम्मा उसने ले लिया
कभी गुस्सा होकर
तो कभी प्रेम से
मुझे एहसास दिलाती है कि
मुझे सफर जारी रखना है
मेरे घर के हर कोने में
दर्ज है उसकी उपस्थिति
माँ की पुरानी आलमारी से
लेकर पिता के काठ की कुर्सी तक
उसके स्पर्श को पहचानते है
नल की टपटप
बर्तन की खन खन
पर्दे के हटते ही ,झांकती सुबह की धुप
सब उसका ही गुणगान करते है।
मेरे बगीचे के फूल भी खिलने से
मना कर देते है
जिस दिन वह उदास
कमरे में ख़ामोशी से आँसू बहाती है
उसकी खिलखिलाहट सुन
गिलहरी की दौड़ शुरू हो जाती है।
वह मेरे जीवन के
हर रिक्त स्थान को
अपने मौजूदगी से भर देती है
बिना एहसास दिलाये की
वो ऐसा कर रही है...#gaurowgupta




No comments:

Post a Comment

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

mai kaun hu?

mai kaun hu?
Gaurow gupta