लप्रेक
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केंद्र, तुम इतना उदास क्यूँ रहने लगे हो?
मैं, मैं उदास कहाँ रहता हूँ, परिधि। तुम कुछ भी कहती हो।
ओह्ह तो, केंद्र ..तुमहे लगता है, इस मुस्कराहट के साथ सच छुपा लोगे।
कोशिश तो कर ही सकता हूँ , ना।
ओह्ह केंद्र, तुम मुझसे कह दो जो कहना चाहते हो, हल्का महसुस करोगे।
कहा था एक दफा, परिधि.. तब से और भारी हो गया है बोझ।
ओह्ह प्लीज़, केंद्र। फिर वही पूरानी बात। तुम्हे पता है , मेरे जीवन में प्रेम की जगह नही।
परिधि , यह झूठ इतनी आसानी से कैसे कह देती हो।
जितनी आसानी से तुम सच छुपा लेते हो केंद्र।
क्या हम शब्दो में उलझे रहेंगे , परिधि।
तुम्हे शब्दो से ही तो प्रेम है, केंद्र। नही तो मेरा तुमसे रोज मिलना, इस समुन्द्र किनारे रोज बैठना, तुम्हारे दुःख को उतना ही महसुस करना , जितना तुम्हारे सुख जीती हूँ, तुम्हे समझ नही आता।
समझ गया।
क्या?
मैं केंद्र हूँ, और तुम परिधि। दोनों एक दूसरे के बिना सम्भव नही हो सकते।
क्या?
मैं केंद्र हूँ, और तुम परिधि। दोनों एक दूसरे के बिना सम्भव नही हो सकते।
चलो चले, शाम हो गयी है। वरना ये समुन्दर की लहरें हमे किनारे से खुद में सिमटा कर ले जाएँगी।
इसी बहाने हम मिल तो जायेंगे, परिधि।
नही केंद्र, हमारा होना जरूरी है, मिट जाने के बाद इन समुन्द्र के किनारों पर मिलना कहाँ होगा। फिर ना तुम केंद्र होंगे और ना मै
परिधि।
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