कोई ठहर गया है इन आँखों मे ऐसे
जैसे ठहरा गया हो ओंस हरे दुभ पर,
जैसे ठहर गया हो शब्द, कलम की नोख पर
और जैसे सदियों इंतेजार के बाद आकर कोई,
ठिठक गया हो दरवाजे के उस जानिब..
जैसे ठहरा गया हो ओंस हरे दुभ पर,
जैसे ठहर गया हो शब्द, कलम की नोख पर
और जैसे सदियों इंतेजार के बाद आकर कोई,
ठिठक गया हो दरवाजे के उस जानिब..
मैं चाहता हूँ ..हवा के बहते ही
ओंस गिर पड़े मिट्टी पर
ओंस गिर पड़े मिट्टी पर
स्याही बह जाये पन्नो पर
शब्दों के साथ या शब्दों के बिना..
शब्दों के साथ या शब्दों के बिना..
और ,जो आकर ठिठक गया है वो लौटें नही..
दरवाजे के खुलते ही,
लिपट जाये इस जिस्म से
और घुल जाये मन में..
दरवाजे के खुलते ही,
लिपट जाये इस जिस्म से
और घुल जाये मन में..
मैं चाहता हूँ, जो ठहर गया है इन आँखों मे
हवा के बहते ही , भभक कर गिर जाये गालों पर
ठीक वैसे ही जैसे घाव में एक चीरा लगते ही
फर्श लाल हो गया हो
और घण्टों बाद आंख खुलने पर
दर्द कुछ कम महसूस होता हो...
हवा के बहते ही , भभक कर गिर जाये गालों पर
ठीक वैसे ही जैसे घाव में एक चीरा लगते ही
फर्श लाल हो गया हो
और घण्टों बाद आंख खुलने पर
दर्द कुछ कम महसूस होता हो...
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