मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, March 23, 2017

मेरी दो प्रेमिका

मेरी दो प्रेमिका
बन गयी है अच्छी दोस्त
छांट - छांट कर मेरी याद
कर लिया है अपने पसन्द का बंटवारा
अपने अपने कुछ  किस्से 
एक दूसरे को उपहार में दे दिए है
मेरे मरने के बाद भी
मेरे पुराने दोस्तों के ईमेल का जबाब
मेरी पहली प्रेमिका देती है
नये मेहमान का स्वागत
मेरी नयी प्रेमिका घर पर करती है
जब भी उनको मेरी याद आती है
दोनों मिल लेती है किसी चाय की दुकान पर
चाय की हर घूँट के साथ
मैं हलक से नीचे उतर जाता हूँ, अक्सर
बंटवारा सिर्फ नही हुआ है
तो मेरी प्रेम कविताओं का
दोनों कविता की हर पंक्ति को
साझेदारी कर सुन लेती है
बुन लेती है, नर्म ख्वाब
और मैं जिन्दा हो उठता हूँ
दोनों के ख्वाबो में पूरा - पूरा
मेरे सपनों को कर रही पूरा
मेरी दो प्रेमिका...

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