मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......
पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....
Monday, March 27, 2017
इश्क और चाय (laprek)
इश्क और चाय
---------------------शहर की गली,तुम्हारे मकां की बन्द खिड़की।भरी दोपहर में , चाय सुड़क लिया करता था। बस इस इंतजार में की खिड़कियों पर कभी तो हरकत होगी।रूठी हो, मान जाओगी। खिड़की पर न सही छत पर तो किसी रोज आओगी।पुरे महीने बीत गए, और जब चाय वाले ने हिसाब किया तो कुल 6 रुपये के हिसाब 180 रू का बिल पकड़ाया, और साथ में एक पर्ची जिसपर लिखा था। एक महीने पहले वह घर छोड़ दूसरे शहर चली गयी है। अगली बार से चाय 5 रु दूँगा, आते रहियेगा।मैं भी ठहरा ढीठ, आने का सिलसिला तोडा नही। चाय अब भी पीने आने लगा, लेकिन खिड़कियो के खुलने के इंतजार में नही, चाय 5 रु जो मिलने लगा था।
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