बिना सब कुछ कहे
इक दिन मैं मर गया
पर बुरा तब हुआ जब,
अपने ही लाश के सामने ठहर गया
मेरी माशूक मेरे सीने से लग रोती रही
जो था सुबह,ढल कर वो शाम होती रही
मैं चाह कर भी उससे लिपट न सका
बहुत कुछ था कहना, पर कुछ कह न सका
दोस्त मुझसे विदा होने लगे
रिश्ते- नाते सब चुटकियों में खोने लगे
मेरी कविताओं को किसी ने फाड़ फेका था
मेरे काले चमड़ीयों को उखाड़ फेंका था
मेरे सिर को जब आग में फोड़ा गया
मेरे हड्डियो को तर बतर तोडा गया
मैं अधूरी कविताओं पर आँसू बहा रहा था
अब भी उनका काफ़िया मिला रहा था
देखा हाथ तो मेरा जल चूका है
कलम ये उँगलियाँ पकड़ ना पाएँगी
ये पन्ने अभागे है,नज्मअब कैसे पूरी हो पाएँगी?
कंठ सुख रहा था, डर कर काँपने लगा
मीलों दौड़ा उस रोज, थक कर हांफने लगा
सोचा माँ की आवाज सुन अब मैं जग जाऊंगा
उससे लिपट कर रोऊंगा,सारा किस्सा सुनाऊंगा
उस रोज आखिरी दफा मुस्कराया था
खुद को खूब बहलाया था
काश ये रात का इक सपना ही हो
दू झटका इस जिस्म को,
फिर सब कुछ अपना ही हो
पर हकीकत तो यही था,और मैं सिहर गया
बिना सब कुछ कहे, इक दिन मैं मर गया।
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