अब तक के जीवन का सारा निर्माण पुरुष के आसपास हुआ है, स्त्री के आसपास नही। अबतक की सारी सभ्यता , सारी संस्कृति, सारी शिक्षा पुरुष ने निर्मित की है, पुरुष के ढंग से निर्मित हुई है, स्त्री के ढंग से नही।
ओशो कहते है- पुरुष के मन में प्रेम बहुत गहराई पर नही है, महत्वाकांक्षा है। और जहाँ महत्वाकां है, वहाँ इर्ष्या होगी। जहाँ महत्वकांन्छा है, वहाँ घृणा होगी। जहाँ म्हत्वकांछा है ,वहाँ युद्ध होगा।
पुरुष ने जो समाज की संरचना की है, वह अपने ढंग से की है, उसमे युद्ध प्रमुख है, उसमे तलवार प्रमुख है।
पुरुष ने जो समाज की संरचना की है, वह अपने ढंग से की है, उसमे युद्ध प्रमुख है, उसमे तलवार प्रमुख है।
यहाँ तक की अगर कोई स्त्री भी तलवार लेकर खड़ी हो जाती है,तो पुरुष उसे बहुत आदर देता है। उदाहरण स्वरूप जोन ऑफ़ आर्क, झाँसी की रानी को पुरुष बहुत आदर देता है। इसलिय क्योकि वह पुरुष जैसी स्त्रियां थी। ठीक उसी प्रकार अगर कोई पुरुष में स्त्रैण गुण हो तो ,उसका अनादर किया जाता है। उसे कमजोर समझा जाता है। इसलिय समाज लड़के को रोने के लिये मना करता है, उसे खिलौने में बन्दुक लाकर दी जाती है।
वर्तमान समय में नारीवादी आंदोलन ने समाज की संरचना बदलने में काफी जोर लगायी। नारी को चारदीवारी से निकाला गया, नयी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था में आगे किया गया, ताकि जो रूढ़िवादी नियम थे, तोड़े जा सके। लेकिन जो भूल हमारे समाज ने स्त्रियों को अशिक्षित रख कर किया था, अब एक और दूसरी भूल समाज यह कर रहा है कि स्त्रियों को पुरुषों जैसा शिक्षा दी जा रही। स्त्रियां सम्पूर्ण रूप से पुरुष बनने की होड़ में लग गयी है। वह पुरुष जैसा दिखना चाहती है, उनकी तरह बोलना, चलना , सोचना चाह रही। इससे समाज स्त्री के आसपास खड़ा नही हो रहा, बल्कि समाज समाज आज भी पुरुष के आसपास ही खड़ा है। स्त्रियां पुरुष की डुप्लीकेट कॉपी बनना चाह रही।
ओशो कहते है- स्त्री और पुरुष समान आदर के पात्र है, लेकिन समान बिलकुल नही है। स्त्री स्त्री है, पुरुष पुरुष है। और इन दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। हम भिन्नता को समझ नही रहे है। इस फर्क को ध्यान न रखा जाये तो जो भी शिक्षा होगी वह स्त्री के लिए बहुत आत्मघाती होगी। पुरुष् ने पहले से ही विक्षिप्त सभ्यता को जन्म दिया है, और जो सभ्यता अब बनेगी उसमे स्त्री की जरूरत है, लेकिन उस स्त्री की जो पुरुष न बनकर स्त्री होने को श्रेष्ठकर मान रही है।
इतिहास से लड़कर , स्त्री पुरुष की छाया से ज्यादा अस्तित्व नही जुटा पायी है।
नयी सदी के नारीवाद ने , स्त्री को नही बचाया है, बल्कि उसपर पुरुषत्व का लेप चढ़ाया है। वह प्रेम ,करुणा, आदर की प्रकृति को तुच्छ और घृणा, हिंसा को श्रेष्ठकर मान रही।
नयी सदी के नारीवाद ने , स्त्री को नही बचाया है, बल्कि उसपर पुरुषत्व का लेप चढ़ाया है। वह प्रेम ,करुणा, आदर की प्रकृति को तुच्छ और घृणा, हिंसा को श्रेष्ठकर मान रही।
आवश्यकता है, नारी को पुरुष से पृथक व्यक्तित्व उपलब्ध करना। न उसे पुरुष का गुलाम रहना ही, न ही उसका अनुशरण करना है। नारी को अपने व्यक्तित्व की खोज करनी है।
उन्हें अपनी पहचान "स्त्री" होने से घबराना नही है, उन्हें यह स्पष्ट रूप से घोषणा करनी है कि वह स्त्री है, स्त्री ही रहेंगी और स्त्री ही होना चाहेंगे। जिस स्त्रैण गुण को कमजोर समझकर स्त्री खुद भाग रही है, वो इस बात से अनजान है कि स्त्रैण वह गुण है वह बहुमूल्य है, वो संरचनात्मक है। कहा जाता है हाउस और होम में इस बात का फर्क है कि होम में स्त्री की उपस्तिथि है और हॉउस महज ईंट की दिवार है, खालीपन है।
उन्हें अपनी पहचान "स्त्री" होने से घबराना नही है, उन्हें यह स्पष्ट रूप से घोषणा करनी है कि वह स्त्री है, स्त्री ही रहेंगी और स्त्री ही होना चाहेंगे। जिस स्त्रैण गुण को कमजोर समझकर स्त्री खुद भाग रही है, वो इस बात से अनजान है कि स्त्रैण वह गुण है वह बहुमूल्य है, वो संरचनात्मक है। कहा जाता है हाउस और होम में इस बात का फर्क है कि होम में स्त्री की उपस्तिथि है और हॉउस महज ईंट की दिवार है, खालीपन है।
स्त्रैण होना कीमती है। स्त्री भाग्यशाली है कि प्रेम, करुणा उनकी प्रकृति है। जब एक पुरुष स्त्रैण गुण को उपलब्ध होता है, तो वह बुद्ध, महावीर, कृष्ण बनता है।
नारीवाद ने जिस अस्तित्व की लड़ाई शुरू की थी, वह स्त्री की अस्तित्व बचाने के बजाए पुरुष के अस्तित्व को अपने ऊपर मढ़ने में ज्यादा जोर देने लगी। वह समाज में पुरुष को नकारने लगी।
इस लेख पर यह सवाल उठना लाजमी है कि मैंने नारीवाद को गलत समझा। तर्क यह आएगा की नारीवाद विकल्प और अवसर की समानता की बात करता है। नारीवाद ने कभी समाज के नियमो या नारी के उत्तरदायित्व से स्वन्त्रता की मांग नही करता बल्कि निर्णय लेने में स्वतंत्रता की बात करता है।
पर यह लेख इस ओर इशारा करता है, की कैसे नारीवाद अतिवाद की ओर उन्मुख हुआ है। स्त्रियां पुरुष से अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में पुरुष बनती जा रही है। जो उनके पहले से श्रेष्ठ है उसे भूलकर पुरुष द्वारा बनाये गए श्रेष्ठता के आधार पर खड़े होने की कोशिश में लगी है। वह स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को न बना कर पुरुष की डुप्लीकेट कॉपी बन रही।

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