मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, March 23, 2017

चाय में घुलता प्रेम

 चूल्हे पर चढ़ा पतीला

दूध की छन्न सी आवाज
काली चायपती का रंग छोड़ना
जैसे घुल कर चीनी में
तुम्हारे प्यार का घुलना
चीनी मिटी से बने कप की टकराहट
जैसे याद दिलाती हो
तुम चाय बना रहे हो

जैसे मेरे आने पर ,
मुझे रुकने का कुछ और बहाना
दे देते हो । 

तुम मुझसे मेरा बेशकीमती वक़्त कैसे ले लेते हो?
बड़ी चालाक हो तुम.....
हा, चालाक । 
सुना तुमने ,मैंने चालाक कहा
तुम कब तक चाय बनाओगे
लाते क्यूँ नही,


मैं हर दिन इंतजार करती हूँ
काठ की तुम्हारी कुर्सी बेवजह झूलती है
किताबे धूल से ढक गयी है
तुम्हारा मोटा चश्मा तुम्हारी आँखे तलाश रहा
मैं हर दिन बेवजह आती हूँ
इस इंतजार में
तुम कभी तो दो कप लिए निकलोगे
और मुझे रुकने का बहाना मिलेगा..
गौरव...

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