मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Thursday, March 23, 2017

कविता: रात एक तारा टुटा

रात एक तारा टुटा
आ गिरा जमी पर
आँखों को बंद कर
कुछ ख्वाईसे अपने नाम की
वक़्त की शाख पर
सपने हासिल हुए
जो छूट गए उस रोज
उसको मुठ्ठी में इस शाम की
इक किनारे पर बैठे
पत्थर समुन्दर में फेंके होंगे
चुन कर उन्होंने एक दिन  
रख दिया हथेलियों पर
जो थी आपके काम की
यादें पुरानी खुलती है जब
ठहाके खूब लगी होंगी
दो लोग बैठे इस महफ़िल में
टकराए दो ग्लास फिर
खुशियों के जाम की

1 comment:

नीला कोट

खूंटे पर टंगा  हैं पिता का नीला कोट कहते थे इसी कोट में ब्याह लाये थे माँ को बड़ी बहन के ब्याह में भी यही कोट पहना था और मेरे ब्याह के सम...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

mai kaun hu?

mai kaun hu?
Gaurow gupta