सिगरेट के कश को फेफड़ो में भर लेता हूँ, क्योकि इस खालीपन को भरने का एक मात्र जरिया है, जिसे मेरे इस हालात में पसन्द है मुझे। बन्द अँधेरे कमरे में एक शुकून मिल रहा मुझे। अब खिड़की के छोटे छेद से आती रौशनी शरीर को भेदती हुई मालूम पड़ रही।
मैं खुद से दूर भाग रहा, और जब मैं खुद से दूर भाग रहा होऊ तो वहाँ तुम्हारा ठहरना भी ठीक नही।
ये क्या , अपनी उंगलियों को मेरे शरीर पर मत फेरो। नही इसका वजन मैं नही सह पा रहा। हटा लो। कुछ दूर चली जाओ....
इस कमरे से बाहर... हाँ मैंने कहा इस कमरे से बाहर...
इस कमरे में तुम्हारी उपस्तिथि से उभरे प्रेम में मुझे एक गंध महसूस हो रहा, जो मेरा गला घोंट रहा है।
मेरे कविताओं के पन्नो की ओर नजर मत दौड़ाओ... इस वक़्त न मैं कविता लिखना चाहता हूँ, न पढ़ना..और न सोचना, क्योकि इस हालात में मैं कविताओं का गला नही घोटना चाहता, ना पढ़ कर ना लिख कर। हाँ मैं अजीब हो गया हूँ, बहुत अजीब...
मैं तुमसे ही नही, खुद की कैद से भी आजाद हो जाना चाहता हूँ। क्योकि तुम्हारी अपेक्षाओं की तरह मेरा वजूद मुझसे अपेक्षाये करने लगा है।
मैं , मैं तो हूँ ही नही कही... बस एक हाड़ मांस का इंसान जो बचपन से अब तक दुनिया की अपेक्षाये पूरा कर रहा। वह प्रेम करते करते , जिम्मेवारी को भी अपने सिर पर ओढ़ ले रहा...
हाँ, मैं भाग रहा- खुद से, तुमसे, इस बोझिल समाज से, और तब तक भागूँगा जब तक मैं थककर चूर चूर न हो जाऊ, जब तक सारी अपेक्षाये खुद अपना दम न घोंट ले.. और एक दिन रुई के फाहे की तरह उड़ जाऊ हवाओँ के साथ..
गौरव...
मैं खुद से दूर भाग रहा, और जब मैं खुद से दूर भाग रहा होऊ तो वहाँ तुम्हारा ठहरना भी ठीक नही।
ये क्या , अपनी उंगलियों को मेरे शरीर पर मत फेरो। नही इसका वजन मैं नही सह पा रहा। हटा लो। कुछ दूर चली जाओ....
इस कमरे से बाहर... हाँ मैंने कहा इस कमरे से बाहर...
इस कमरे में तुम्हारी उपस्तिथि से उभरे प्रेम में मुझे एक गंध महसूस हो रहा, जो मेरा गला घोंट रहा है।
मेरे कविताओं के पन्नो की ओर नजर मत दौड़ाओ... इस वक़्त न मैं कविता लिखना चाहता हूँ, न पढ़ना..और न सोचना, क्योकि इस हालात में मैं कविताओं का गला नही घोटना चाहता, ना पढ़ कर ना लिख कर। हाँ मैं अजीब हो गया हूँ, बहुत अजीब...
मैं तुमसे ही नही, खुद की कैद से भी आजाद हो जाना चाहता हूँ। क्योकि तुम्हारी अपेक्षाओं की तरह मेरा वजूद मुझसे अपेक्षाये करने लगा है।
मैं , मैं तो हूँ ही नही कही... बस एक हाड़ मांस का इंसान जो बचपन से अब तक दुनिया की अपेक्षाये पूरा कर रहा। वह प्रेम करते करते , जिम्मेवारी को भी अपने सिर पर ओढ़ ले रहा...
हाँ, मैं भाग रहा- खुद से, तुमसे, इस बोझिल समाज से, और तब तक भागूँगा जब तक मैं थककर चूर चूर न हो जाऊ, जब तक सारी अपेक्षाये खुद अपना दम न घोंट ले.. और एक दिन रुई के फाहे की तरह उड़ जाऊ हवाओँ के साथ..
गौरव...

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