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| डिअर स्ट्रेंजर |
वह सामने बैठी है। खुले बाल, खुबशुरत आँखे, गुलाबी होठ,..... वह चुप चाप किताब पर नजर गराए बैठी है। वह शांत है ,ठहरी हुयी सी , इस भाव में उसे घंटो से चोरी छिपे देख रहा। वह कभी कभी सलीके से मुस्कुराती है,अंग्रेजी उपन्यास पढ़ रही. गर्मी में सूखते होठो को थोड़ी थोड़ी देर पर पानी से तर कर रही। होठो की गुलाबी रंगत पानी के फुहार से फिर तारो ताजा हो जा रहे।
कुछ देर पर नजरे एक दूसरे से टकराती है , दोनों कितनी तेजी से अपनी नजरे झुक ले इस बात की होड रहती है। दोनों एक दूसरे को उतनी अनजां न निगाहो से देखते है , जितने अंजान हम है एक दूसरे से। मैं उसे स्ट्रेंजर कहता हु ,पता नहीं वह मुझे क्या कहती होगी, कोई नाम दिया भी होगा या नहीं। वह कई दफा देखती है अपने ागल बगल ,फिर निगाहें किताबो पर। उसके बाल खुले और घुंघराले है बिलकुल बरसात के मौसम में मंडराते काले बादल की तरह।
एक डर है मेरे दिल में , पाने से पहले खो देने का। उसके ना में मेरे आत्मबिस्वास् की तिलांजलि न चढ़ जाए। मैं टूट क्र बिखर ना जाऊ। मैं क्यों डर रहा ,क्या मेरे आत्मबिस्वास् का संबंध मेरे कुरुक्षेत्र की लड़ाई के लड़ने से है ? क्या मैं ही वह अभिमन्यु है जिसे सातो दरवाजे तोड़ने है।? मैं किन सवालो से डर रहा।
दिल और दिमाग के अंतर्द्वंद में फसा हुआ हु। प्यार और भय अक्सर जिंदगी में एक साथ आते है, भय को दिमाग ने पनाह दे रख है , और प्यार दिल को बेचैन किये बैठा है।
शराब की घूंट शायद मेरे डर को शांत करा सकती है , पर क्या मैं इतना कमजोर हो गया हु , नहीं,...... कभी नहीं।
वह कान की बाली में उलझे बालों को सुलझा रही , उसके बालों की लट जैसे जैसे सुलझ रही , मैं उतना ही उलझ रहा।
शाम के सात बज गए है , लाइब्रेरी आठ बजे बंद होगी। उसके बाहर निकलने का इन्तजार है , ताकि उससे मिल कर अपने दिल की बात कह सकु,..... कुछ हल्का कर सकु अपने मन को......
आठ बज गए,......
लाइब्रेरी की लाइट बंद होने लगी,..... वह किताबें समेट रही,...... ......
क्रमश...

Jabardast chotu
ReplyDeleteJabardast chotu
ReplyDeleteधन्यवाद सर जी
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