नासमझ था जो समझदारी की बात किया करता था,
समझ आ गया खुद को समझा कर;
की नासमझ इतनी नहीं ये दुनिया,
कि खुद को समझ ना सके कोई;
या किसी समझदार की शायद इसे जरुरत नहीं |
समझ आ गया खुद को समझा कर;
की नासमझ इतनी नहीं ये दुनिया,
कि खुद को समझ ना सके कोई;
या किसी समझदार की शायद इसे जरुरत नहीं |
यहीं हो रहा है दुनिया में;
कि कोई बेवक़ूफ़ लगता है -
जो किसी और की दामन
बचाने की कोशिश करता है;
वो लूट जाता है हमेशा
जो लुटेरों की शिकायत करता है;
है दौलत उसी की, है शोहरत उसी की,
जो खुद का ईमान बेचता है |
कि कोई बेवक़ूफ़ लगता है -
जो किसी और की दामन
बचाने की कोशिश करता है;
वो लूट जाता है हमेशा
जो लुटेरों की शिकायत करता है;
है दौलत उसी की, है शोहरत उसी की,
जो खुद का ईमान बेचता है |
यक़ीन ना हो तो जा के पूछो उनसे -
जो तख़्त चलाते हैं ;
क्या कभी झूठ बोला है उन्होंने?
क्या कभी चोरी की है उन्होंने?
अरे उनका तो हर काम बेपर्दा है,
उनकी कमीज़ से लेकर उनके गलीच तक;
सब जनता जानती है ,सब जनता मानती है |
जो तख़्त चलाते हैं ;
क्या कभी झूठ बोला है उन्होंने?
क्या कभी चोरी की है उन्होंने?
अरे उनका तो हर काम बेपर्दा है,
उनकी कमीज़ से लेकर उनके गलीच तक;
सब जनता जानती है ,सब जनता मानती है |
यक़ीन ना हो तो पूछो उनसे -
जो बाजार चलाते है ,
क्या कोई नकली माल बेचा है ?
क्या किसी को नुकसान हुआ है ?
उनके दुकान से लेकर उनके गोदाम तक;
सब जनता जानती है, सब जनता मानती है |
जो बाजार चलाते है ,
क्या कोई नकली माल बेचा है ?
क्या किसी को नुकसान हुआ है ?
उनके दुकान से लेकर उनके गोदाम तक;
सब जनता जानती है, सब जनता मानती है |
अरे छोड़ो भी इनकी थाह लेना -
कभी फुरसत मिले तो
खुद से पूछ लेना,
क्या कभी तुमने भी बचपन जिया था?
क्या कभी तुम्हे भी दुनिया साफ़ नजर आती थी ?
क्या कभी तुम भी बड़े होने लगे थे खुद को समझा कर ?
कभी फुरसत मिले तो
खुद से पूछ लेना,
क्या कभी तुमने भी बचपन जिया था?
क्या कभी तुम्हे भी दुनिया साफ़ नजर आती थी ?
क्या कभी तुम भी बड़े होने लगे थे खुद को समझा कर ?
अब तो तुम समझदार हो गए हो,
हाँ मैं ही नासमझ था जो तुम्हें समझा रहा था.....
हाँ मैं ही नासमझ था जो तुम्हें समझा रहा था.....


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