मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Saturday, March 19, 2016

नासमझ था जो समझदारी की बात किया करता था,,,,, रंजन कुमार\




  • रंजन कुमार
    एक युवा कवि, जो NIIT ROURKELA के छात्र्  है। कविताये और शायरी लिखने का शौक इन्हे हमेशा से रहा है। विज्ञान की कक्षा के बाहर जब प्रकृति के क़रीब जाते है, तो अपने आप को शब्दो को गढ़ने में बेचैन हो जाते है। पढ़िए उनकी कविता......


नासमझ था जो समझदारी की बात किया करता था,
समझ आ गया खुद को समझा कर;
की नासमझ इतनी नहीं ये दुनिया,
कि खुद को समझ ना सके कोई;
या किसी समझदार की शायद इसे जरुरत नहीं |
यहीं हो रहा है दुनिया में;
कि कोई बेवक़ूफ़ लगता है -
जो किसी और की दामन
बचाने की कोशिश करता है;
वो लूट जाता है हमेशा
जो लुटेरों की शिकायत करता है;
है दौलत उसी की, है शोहरत उसी की,
जो खुद का ईमान बेचता है |
यक़ीन ना हो तो जा के पूछो उनसे -
जो तख़्त चलाते हैं ;
क्या कभी झूठ बोला है उन्होंने?
क्या कभी चोरी की है उन्होंने?
अरे उनका तो हर काम बेपर्दा है,
उनकी कमीज़ से लेकर उनके गलीच तक;
सब जनता जानती है ,सब जनता मानती है |
यक़ीन ना हो तो पूछो उनसे -
जो बाजार चलाते है ,
क्या कोई नकली माल बेचा है ?
क्या किसी को नुकसान हुआ है ?
उनके दुकान से लेकर उनके गोदाम तक;
सब जनता जानती है, सब जनता मानती है |
अरे छोड़ो भी इनकी थाह लेना -
कभी फुरसत मिले तो
खुद से पूछ लेना,
क्या कभी तुमने भी बचपन जिया था?
क्या कभी तुम्हे भी दुनिया साफ़ नजर आती थी ?
क्या कभी तुम भी बड़े होने लगे थे खुद को समझा कर ?
अब तो तुम समझदार हो गए हो,
हाँ मैं ही नासमझ था जो तुम्हें समझा रहा था.....

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