दूर कुँए का निर्मल पानी, वो पीपल की छाँव रे
कितना प्यारा है, हमारा गाँव रे...
गाँव की कल्पना कुआँ , पीपल का पेड़, दालान, चबूतरा, आम की खुशबू, दोपहर की सूनी धूल उड़ाती सड़के, शाम को खाट पर बैठे बड़े-बुजुर्गो की महफ़िल, कहकहे, ठहाकों के बिना अधूरी मालुम पड़ती है। गाँव की कल्पना इस रूप में होना स्वाभाविक है, क्योकि जब भी मैंने अपने गाँव को देखा, इसी रूप में देखा।
आज मुझे कृत्रिम बिजली से रौशन बल्ब से भी ना मिटने वाला अँधेरा, शहरो में पसरा दिखता है, तो वही याद आता है गाँव के दुआर पर जल रहे एक लालटेन की,जो पुरे टोला , मोहल्ला को रौशन कर रहा होता था।
जब दिल्ली आया तो देखा, कुकुरमुत्ते की तरह फ़ैलते, बढ़ते मकानों को , जो मुर्गे की दरबे की तरह दीखते है, जहाँ आपका दरवाजा सिर्फ आपके लिए खुलता और बन्द होता है।
मैंने गाँव के कई घरो में दरवाजा नही देखा, शायद उन्हें इसकी जरूरत नही थी, वही छोटे शहरों में लोहे की ग्रिल ने जगह ले ली, जिसे लोग सुन्दर ढांचे में ढालकर अपने आप को उसके अंदर बन्द कर देते है। गाँव के हर घर का अपना दुआर हुआ करता था, जिसका जितना बड़ा दुआर, उसकी गाँव में उतनी शाख।
ठण्ड के दिनों में हर दुआर पर घुरा फुँका जाता था। घुरा फूंकने का मतलब , धान के फसल से निकले पुआल को जलाया जाना होता था। जो जल्द ही जल कर बुझ जाता था, लेकिन लोग उसी राख को फूँक फूँक कर राख में गर्मी बनाये रखते थे। यह "घुरा" बड़े- बुजुर्ग से लेकर युवाओ के लिए बतकही का अड्डा हुआ करता था, जहाँ लोग देश- दुनिया से लेकर टोला- मोहल्ला का सामान्य ज्ञान बांटा करते थे। जब राख की ढेर की गर्मी बिल्कुल ख़त्म होती तो, वह कुत्ते के सोने का विस्तर हुआ करता था।
शहर में कमरे की ठंडक कृत्रिम हीटर से चली तो जाती है, पर वह वैसा आनन्द नही दे पाता, जिसे गाँव के लोग बुझते राख में भी टटोल टटोल कर लेते थे।
गाँव के हर घर के दुआर पर मड़ई हुआ करता था। एक मड़ई पडोस के दुआर के मड़ई से बिल्कुल सटा होता था, जिससे आप अपने मड़ई में सोये सोये बगल वाले पडोसी से बातचीत कर सकते थे। गाँव के कई कहानियो से वाकिफ हो गया था, जब भी पिता जी के साथ सोता था और वो पड़ोस के मोईन चाचा से बात करते।
सुबह जगने के लिए मोबाइल के अलार्म की जरूरत नही होती थी, बैल के गले की घंटी से निकलती टुनटुन , मुर्गे की बांग्, या पडोसी के झुमर, बिरहा के बोल ही जगा दिया करते थे।
आज शहरों की मोटी दीवारो में आवाज सोखने की शक्ति है, फिर भी सड़को पर चीख पुकार मचा रहता है, उसी समय याद आता है, गाँव की दूर तक फैली शांति।
जब गाँव की पगडंडियों को लांघते, लांघते दूर खेतो में निकल जाते तो कोल्हू मशीन से आती आवाज, एक अलग आनन्द से भर देती। ईख के मौसम में, किसी खेत से ईंख उखाड़ा, छिला , चबाया और रस से भरे मुँह लिए निकल पड़ा अगले पड़ाव की ओर।
देखते देखते समय बीता, पलायन एक मज़बूरी बन कर उभरी या यूँ कहे हम कमजोर निकले जो गाँव में रह सकने की हिम्मत नही जुटा पाये।
आज दिल्ली की भागती- दौड़ती जिंदगी रोज देखता हूँ, रोज गालियाँ देता हूँ इस भाग दौड़ की जिंदगी को, फिर आ जाता हूँ मुनिरका की तंग गलियों में, हाँफते हुए तीन मंजिल चढ़ता हूँ, दरवाजा खुलते ही बेतहाशा पड़ जाता हू बिस्तर पर।
हर रात पत्नी को कहता हूँ, चले गाँव की ओर..
पत्नी माथे को चूमती है और कहती है- तुम हिम्मत बाँधो और मैं बैग बाँधती हूँ.. 5 साल का आरव भागा आता है, अपने छोटे से बैग को लेकर और कहता है" पापा अभी चले"...
आज खत आया है, गाँव से... अंत में माँ ने पूछा है- कब आ रहे?
पत्नी टिकट लिये खड़ी है, आरव छोटे से बैग में अपने खिलौने पैक कर रहा..
और मेरी आँखों से आँसू छलक कर भींगो रहे है.. माँ की चिठ्ठी।
जी के गौरव
कवि, ब्लॉगर
Aawajpoetry.blogspot.com
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