मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Wednesday, March 9, 2016

प्रिय श्रुति............

प्रिय श्रुति
कल सरस्वती पूजा के पंडाल में देखा। कई साल बाद तुम्हे देख रहा था, बिलकुल नही बदली हो, हां थोड़ी मोटी जरूर हो गयी हो, और मैं तुम्हारी याद में सुख के छुहारा। तुम हरी ड्रेस में बहुत खूबसूरत लग रही थी, बिलकुल माधुरी दीक्षित। ऐसे लग रहा था मानो सरसों खेत में तुम पिला फूल बन लहलहा रही हो। तुम्हारी याद में आज सुबह से कुमार सानु का गाना सुन रहा
...मेरा दिल भी कितना पागल है...
आज वैलेंटाइन डे है, घर के काम से फुरसत मिले तो छत पर आना, और आज के दिन मेहँदी मत लगाना, पिछली बार दिल्ली में कोई लड़की नही लगायी थी। आज दिन भर हम छत पर कुर्सी लगा आसन जमा के बैठे रहेंगे, तुमको एक बार देख लेते है तो ठण्ड में बिलकुल च्यवनप्राश जैसा काम करता है।
छठ में ख़रीदा हुआ कुर्ता आज पहने है जो तुमको हमेशा पसन्द आता था। तुम भी वही हरा ड्रेस पहन निकलना। देखो कहि हम बेहोश न हो जाये...
इस बार भी अपने हाथ का बना पराठा और आलू का कड़क भुजिया बना कर भेज देना..
आज शाम आऊंगा साइकिल मांगने , गेट खोलने जरूर आना। जब तुम पूछती हो "कैसे हो" "कब आये?" तो भूल जाता हु खुद को, भूल जाता हु कैसा हु। बस जी करता है गले लगा कर फफक कर रो पडू। पर तुम कौन सा कंधे पर सर रखकर चुप कराओगी, सॉरी ताने नही मार रहा। दिल्ली की CCTV और यहाँ तुम्हारे बापू दोनों एक ही काम करते है।
लिखते लिखते कुमार सानु का दूसरा गाना भी चालू हो गया..
...धीरे धीरे से मेरी जिंदगी में आना.....

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