मैं कौन हूँ, इसका जबाब जीवन के हर पर्तो में ढूंढता हूँ। और सवाल और खुद की लुका- छिपी
में जो कुछ भी पाता हूँ, वो पन्नो पर उकेर देता हूँ। कुछ कवितायेँ बन जाती है तो कुछ कहानियॉ तो कुछ यादें.......

पन्नो को शब्दों से रंगना पसन्द है....
खुद को हल्का कर लेता हूँ....

Friday, January 8, 2016

भीड़ में स्पेस की तालाश

‪#‎लप्रेक‬ जनवरी की डायरी से*** अब तुम्हे लेट आने पर ट्रैफिक होने का एक्सक्यूज़ नही देना पड़ेगा। तुम हमेशा इंतजार करने पर ताने क्यों मारती हो, प्यार में इन्तजार नही तो फिर प्यार कैसा। कभी इन्तजार का मजा तूम भी तो ले कर देखो। हमेशा मैं ही क्यों। ऐसे तो बड़ा फेमिनिस्ट बने फिरते हो, लड़कियो को इम्प्रेस करने के लिए। तुम न अब फेमिनिज्म वेमिनिज्म मत घुसेड़ा करो प्यार में। हमेशा पोलिटिकल क्यों हो जाती हो। मैं तो जा रहा सरकार को चिठ्ठी लिखने। वो क्यों। तुम्हे नही लगता रोड की कम भीड़ ने हमे प्यार करने के स्पेस को कम कर दिया है। याद करो गाडियो की आवाज के बिच हम कितनी आसानी से ऑटो ड्राईवर से बच के अपनी बाते कह लिया करते थे। आइटीओ के पास जब घंटो जाम होता था, और हमे और देर साथ रहने का मौका भी मिल जाता था। चलो न फिर कहि किसी भीड़ में खो जाए। कभी कभी भीड़ भी कितना स्पेस दे देती है ना प्यार करने वाले को\

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